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हीरानगर विधानसभा क्षेत्र के इलाकों को वापस करने और कठुआ नार्थ का नाम बदलने की मांग रखी

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हीरानगर। जम्मू में सोमवार को परिसीमन आयोग से मिलकर विभिन्न राजनीतिक व गैर राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई। प्रतिनिधियों ने हीरानगर विधानसभा क्षेत्र के कुछ इलाकों को कठुआ नार्थ से जोड़ने का विरोध किया और कठुआ नार्थ का नाम बदलने की मांग की। बतादें कि आयोग की मसौदा रिपोर्ट में जिले में पांच सीटों को बढ़ाकर छह विधानसभा सीटें की गई हैं। नई सीट का नाम कठुआ नार्थ तय किया गया है। जिसमें डींगा अंब ब्लॉक और हीरानगर विधानसभा क्षेत्र के कई इलाके शामिल किए गए हैं।
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यूथ कांग्रेस के जिला अध्यक्ष रोमी शर्मा ने बताया कि उन्होंने आयोग के समक्ष हीरानगर विधानसभा क्षेत्र से निकाल कर कठुआ नार्थ से जोड़े गए इलाकों को वापस हीरानगर विधानसभा क्षेत्र में जोड़ने की मांग रखी। हीरानगर विधानसभा क्षेत्र की चंदवा, सहसवां, छन्न अरोड़ियां, हरदो मुट्ठी, हमीरपुर पंचायतों को कठुआ नार्थ से जोड़ने से पहले क्षेत्र के पंचायत प्रतिनिधियों से और न ही आम लोगों से कोई राय ली गई। इन पंचायतों के लोग हीरानगर विधानसभा क्षेत्र में ही रहना चाहते हैं। आम लोगों की मांग आयोग के समक्ष रखी है।
डिंगा अंब ब्लॉक के बीडीसी अध्यक्ष सुदेश शर्मा ने आयोग से दर्ज कराई आपत्ति के बारे में जानकारी देते हुए कहा मसौदा रिपोर्ट में बनाए गए नए विधानसभा क्षेत्र का नाम कठुआ नार्थ रखने के बजाय डींगा अब विधानसभा रखने की मांग की है। उन्होंने कहा कंडी क्षेत्र को अलग विधानसभा क्षेत्र बनाने की मांग के लिए यहां के लोगों ने लंबा संघर्ष किया है। उनकी मांग पूरी हुई, लेकिन इस सीट का नाम आम लोगों को मंजूर नहीं है। डिंगा अंब तहसील, ब्लॉक के नाम से जाना जाता है, इसलिए इसका नाम डिंगा अंब विधानसभा क्षेत्र होना चाहिए। यह यहां के आम लोगों की मांग है।
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कठुआ नार्थ नाम हमारे इस क्षेत्र के इतिहास और पहचान को खत्म करने की साजिश है। सरपंच सुरेंद्र वर्मा ने कहा आयोग के समक्ष उन्होंने कठुआ नार्थ का नाम बदल कर डिंगा अंब विधानसभा क्षेत्र करने की मांग रखी है। अगर नाम नहीं बदला जा सकता तो डिंगा अंब ब्लॉक के जो इलाके कठुआ नार्थ से जोड़े गए हैं, उन्हें हीरानगर विधानसभा क्षेत्र से जोड़ा जाए। उन्होंने कहा आयोग ने मसौदा रिपोर्ट पेश करने से पहले आम लोगों और जनप्रतिनिधियों की राय ली होती तो आज लोगों को परेशान होना नहीं पड़ता व न ही आयोग को इस तरह का कार्यक्रम रखने की जरूरत पड़ती।
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