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कई तटबंध टूटने, परियोजनाओं पर काम न होने से और बढ़ा खतरा

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जिले में बरसात का मौसम कृषि भूमि समेत कई गांव के लिए खतरे की घंटी बजाता है। लेकिन बाढ़ नियंत्रण को लेकर हर साल किए जाने वाले इंतजाम फौरी मदद तक ही सीमित रहते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ है। जिले में बाढ़ से सबसे अधिक नुकसान उज्ज और तरनाह से सटे इलाकों में होता है। हर साल उज्ज दरिया के बरसात में उफान पर रहने से कई गांवों को नुकसान पहुंचने का खतरा मंडराता है। इस बार कई तटबंध टूटने और कई वर्षों से बड़ी परियोजनाओं पर काम न होने से खतरा और भी बढ़ गया है।
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पूर्व में की जाने वाली तैयारियों की बात करें, तो पिछले कई साल से इन इलाकों को नुकसान को बचाने के लिए सरकार को भेजे गए लगभग 300 करोड़ के प्रोजेक्ट सिर्फ फाइलों में धूल फांक रहे हैं। यही नहीं 2014 में भारी बारिश के दौरान आई बाढ़ से हुए नुकसान के बाद बाढ़ नियंत्रण विभाग की ओर से करवाए गए बंदोबस्ती कार्यों की बकायादारी अभी भी कायम है। कैपेक्स बजट के तहत बाढ़ नियंत्रण के लिए उपाय किए जाते हैं, जो ऊंट के मुंह में जीरे का काम करते हैं और खामियाजा उज्ज और तरनाह के किनारे बसी आबादी को झेलना पड़ता है।
विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार कठुआ शहर के एक हिस्से को सहार खड्ड की बाढ़ से बचाने सहित अन्य कई गांव को मंडराने वाले खतरे को टालने के लिए 75 करोड़ का सहार खड्ड बाढ़ नियंत्रण प्रोजेक्ट भेजा गया है। इसी तरह से माही चक में भी सहार खड्ड से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए 75 करोड़ की अतिरिक्त डीपीआर मंजूरी के लिए भेजी गई है।
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बोहड़ा से सैदपुर तक 30 किलोमीटर के दायरे में रिहायशी इलाके और उपजाऊ भूमि को बचाने के लिए यह महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट मंजूरी का इंतजार कर रहा है। इसी तरह चंग घाटी के लिए 14 करोड़, तंगदेवपुरा के साथ लगते सलालपुर, चक छिब्बा व हरियाचक आदि गांव की उपजाऊ भूमि को बचाने के लिए करीब साढ़े 14 करोड़ और इसी तरह कोटपुन्नू के इलाकों को बचाने के लिए 15 करोड़ की योजनाएं मंजूरी का इंतजार कर रही हैं, जिनकी अनुमानित लागत भी साल दर साल बढ़ती जा रही है।
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