वन्यजीव अभयारण्य बनी के छत्रगलां इलाके में सीरो कैमरे में कैद हुआ है। सीरो को गोट एंटीलोप भी कहा जाता है। इसके अलावा दुर्लभ ताहर (पहाड़ी बकरी) को भी देखा गया है।
कठुआ जिले के छत्रगलां इलाके में दुर्लभ प्रजाति का सीरो (हिरण व बकरे की मिश्रित प्रजाति) देखा गया है। इस क्षेत्र में यह वन्य प्राणी पहली बार दिखा है। छत्रगलां के जिस इलाके में सीरो कैमरे में कैद हुआ है वह वन्यजीव अभयारण्य बनी के अधीन आता है।
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सीरो को गोट एंटीलोप भी कहा जाता है। बीते मंगलवार से इलाके में शोध में जुटी वन्यजीव विभाग की टीम ने इसके अलावा दुर्लभ ताहर (पहाड़ी बकरी) को भी देखा है जिसके संरक्षण के लिए इस वन्यजीव क्षेत्र की अधिसूचना की गई है। हिमालयी सीरो कभी-कभार ही देखने को मिलता है। अधिकारियों के मुताबिक इलाके में इस जंगली जानवर का देखा जाना क्षेत्र और जम्मू-कश्मीर के लिए अच्छी बात है। संरक्षण के लिहाज से इन प्रजातियों पर काम करना और भी जरूरी हो जाता है। अधिकारियों के मुताबिक सीरो बेहद शर्मीला जानवर होता है और घने जंगलों में रहता है। सीरो की पहचान उसके पैलेट, आराम करने की जगह और पैरों के निशान से होती है, लेकिन उसे ढूंढ पाना बेहद मुश्किल होता है। छत्रगलां के बर्फ से लदे पहाड़ों की तलहटी और दर्रों में इसकी मौजूदगी से साफ है कि यह क्षेत्र इनके लिए सुरक्षित है।
हिमालयन सीरो भारत में विलुप्त हो चुकी प्रजातियों में से एक है। इस जानवर को पहले विलुप्त हो चुके जानवरों की सूची में शामिल कर दिया गया था। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन फॉर नेचर ने हिमालयन सीरो को विलुप्त वन्य जीव की सूची में शामिल किया था। इतना ही नहीं इस जानवर को संकटग्रस्त प्रजातियों के नजदीक सूची में रखा गया था।
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मुख्य वन्यजीव संरक्षक डॉ. कुमार एमके ने बताया कि हिमालयन सीरो का इलाके में देखा जाना यहां के लोगों और विशेष रूप से जम्मू संभाग के लिए खुशी की बात है। हिमालयन ताहर को भी संरक्षित किया जाना है, जिसे यहां स्पॉट किया गया है। बताया कि बनी वन्यजीव अभयारण्य विभिन्न प्रजाति के जंगली जानवरों और पक्षियों का घराना है। अब तक के शोध में सामने आया है कि यह न सिर्फ जानवरों और पक्षियों बल्कि अपने अंदर लुप्तप्राय और बेहद कीमती जड़ी-बूटियों का खजाना भी समेटे हुए है।
दुर्लभ ताहर, मोनाल संरक्षण के लिए बनाया गया बनी अभयारण्य
दुर्लभ ताहर और उत्तराखंड के राज्य पक्षी मोनाल के संरक्षण के लिए वन्यजीव अभयारण्य तैयार किया गया है। चूंकि इन इलाकों में ये प्रजातियां पाई जाती हैं। ऐसे में इनका संरक्षण बेहद जरूरी है। इसके अलावा कोकलस तीतर, श्वेत क्रेस्टिड खलीज तीतर और हिमालयन स्नो कॉक का भी इस वन्यजीव अभयारण्य में संरक्षण संभव हो पाएगा। 99.76 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस अभयारण्य में आवासीय गतिविधियां बढ़ने, शिकारियों की मौजूदगी और जलवायु परिवर्तन से इन दुर्लभ प्रजातियों पर खतरा मंडरा रहा था।
इन दुर्लभ जानवरों की प्रजातियों का होगा संरक्षण
हिमालयन ताहर (कार्थ), मस्क डियर, ग्रे हिमालयन गोराल (पिज्जर), सेरो (उरेड), बार्किंग डियर, हॉग डियर का भी संरक्षण किया जाएगा। हिमालयन ताहर का नाम नेपाली भाषा के शब्द थार से मिला है। इनकी आयु 15 वर्ष तक होती है और वजन 70 किलोग्राम तक होता है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन और नेचर की लिस्ट में ताहर लुप्त हो रहे जानवरों की प्रजाति में शामिल है।
जम्मू विश्वविद्यालय के भद्रवाह कैंपस से आई डॉ. नीरज शर्मा और उनकी टीम के साथ वन्यजीव संरक्षक व वन्यजीव विभाग की टीम ने मंगलवार से ही इलाके में डेरा डाले हुआ है। इन प्रजातियों का देखा जाना खुशी की बात है। बनी वन्यजीव अभयारण्य को लेकर मामला लगातार प्रशासन के समक्ष उठाया गया है। लोगों के अधिकार सेटलमेंट के बाद मामले राजस्व विभाग की ओर से सरकार को भेजे जाएंगे जिसके बाद इस क्षेत्र पर पूरी तरह से काम शुरू हो सकता है। फिलहाल स्टाफ की कमी भी इसमें रुकावट बन रही है। - विजय कुमार वर्मा, वन्यजीव वार्डन कठुआ।