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परमानंद की प्राप्ति के लिए इंद्रियों को वश में करने का दिया ज्ञान

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कठुआ। शहर से सटे गांव चनग्रां में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में शुक्रवार को कथा व्यास सुभाष शास्त्री ने कहा कि हमारे शास्त्र हमें जीने की कला सिखाते हैं। ताकि हम सुखपूर्वक जीवन जी सकें। इसलिए उस काम का करना हमारे लिए ठीक नहीं, जिसके करने पर बाद में पछताना पड़े और परिणामस्वरूप आंसू बहाना पड़े व कष्ट भोगना पड़े।
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शास्त्री ने कहा कि यदि आप इंद्रियों को वश में नहीं रख सकते, तो आपकी शिक्षा, अनुभव व अन्य योग्यता व्यर्थ है। सभी ज्ञानेंद्रियां कामनाओं की प्रतीक हैं। इंद्रियों का दास होना प्राकृतिक विशिष्टा नहीं है। यदि ऐसा होता तो वेदों का यह बताना जरूरी न था कि क्या योग्य है, और क्या अयोग्य और न किसी सद्गुरु को यह कहने की जरूरत पड़ती कि यह को और यह न करो।
कथा वाचक ने कहा कि हमें इंद्रियों को दमित नहीं करना है, अपितु नियंत्रित ढंग से देश, काल और परिस्थिति की मर्यादा के अनुसार इनका सदुपयोग करना है। क्योंकि काल रूपी सर्प हमारे पीछे लगा हुआ है, और हम इससे बचने के लिए भागे चले जा रहे हैं। इससे बचने के लिए ना-ना प्रकार के उपाय कर रहे हो। कही ऐसी शरण खोज रहे हो जहां यह काल रूपी सर्प हमें डस न पाये। संसार से किसी भी कोने में हम चले जाएं। यह काल सर्प हमें छोड़ने वाला नहीं है।
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