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वैदिक गुरुकुल परंपरा का संरक्षण बहुत दुष्कर

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कार्यक्रम में भाग लेते चूड़ामणि संस्कृत संस्थान बसोहली के बटुक अन्य, संवाद। - फोटो : KATHUA
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बसोहली। चूड़ामणि संस्कृत संस्थान में शनिवार को परिवेश में गुरुकुल परंपरा का स्वरूप विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ। जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में वागीश स्वरूप ब्रह्मचारी मौजूद रहे।
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उन्होंने कहा कि आज के परिवेश में वैदिक गुरुकुल परंपरा का संरक्षण बहुत ही दुष्कर कार्य है। आज यही समृद्ध परंपरा जम्मू कश्मीर के बसोहली नगर में कुशल आचार्यों की तपस्या से संचालित हो रही है। यह हर्ष का विषय है। गुरुकुल के विद्यार्थी अन्य से श्रेष्ठ और तीक्ष्ण बुद्धि वाले होते हैं। ये बाल्यकाल से ही माता-पिता से दूर गुरुकुल में रहकर समस्त वैदिक एवं लौकिक विषयों को गहनता से धारण करते हैं।
उन्होंने पुराने उदाहरण देकर बताया कि तुलसी वृक्ष ना जानिए, गौ न जानिए ढोल, ब्राह्मण मनुज ना मानिए तीनों नंदकिशोर। अर्थात् तीनों भगवत रूप में होते हैं। बात है बुद्धि की कि उन्हें कैसे पहचानें? विशिष्ट वक्ता के रूप में स्वामी अच्युतानंद ने पृथ्वी का महत्व बताते हुए सात वस्तुओं को महत्वपूर्ण बताया। जिनके तपोवन पर पृथ्वी टिकी है। वह हैं गाय, वेद, ब्राह्मण, पतिव्रता स्त्री, सत्य, संतोष और दान। इन सभी विषयों पर उन्होंने वैदिक ढंग से प्रकाश डाला।
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संस्थान के प्राचार्य अभिषेक कुमार उपाध्याय ने सम्मानित अतिथि विद्वानों का स्वागत करते हुए कहा कि विद्वान होना आसान है। लेकिन, विद्वान होकर सहज सरल होना बहुत ही कठिन है। इस अवसर पर आचार्य सुरेंद्र शास्त्री जी ने अंग वस्त्र देकर विद्वानों का स्वागत किया। संस्थान के बटुकों ने यजुर्वेद के पाठ से सभी को मंत्रमुग्ध किया। इस दौरान आचार्य सौरभ शर्मा ने वैदिक विधि से धन्यवाद ज्ञापन भेंट किया।
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