जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महिला के अनुकंपा नौकरी के आवेदन को सही मानते हुए संबंधित संस्थान और जिला प्रशासन को आवेदन से जुड़े दस्तावेजों का प्रमाणीकरण करते हुए लाभ देने का आदेश दिया। कहा, अनुकंपा नौकरी नियमों में परिवार की परिभाषा स्पष्ट, इसमें लिंगभेद की गुंजाइश नहीं।
मां-बाप के लिए बेटी शादी के बाद भी बेटी ही रहती है। अनुकंपा आधारित नौकरी के नियमों में परिवार की परिभाषा को सीमित नहीं किया जा सकता। बेटी हो या बेटा, भाई हो या बहन, नियमों में शादी से पहले जो अनुकंपा नौकरी का हकदार है, वह शादी के बाद भी रहेगा, बशर्ते सेवाकाल में मरने वाले सरकारी कर्मचारी पर परिवार का सदस्य आश्रित हो। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महिला के अनुकंपा नौकरी के आवेदन को सही मानते हुए संबंधित संस्थान और जिला प्रशासन को आवेदन से जुड़े दस्तावेजों का प्रमाणीकरण करते हुए लाभ देने का आदेश दिया।
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कोर्ट ने विवाहित बेटी संबंधी दलील को खारिज करते हुए साफ किया कि अनुकंपा नौकरी नियम 1994 में लिंगभेद की कोई गुंजाइश नहीं है। कोर्ट ने कहा कि मायने ये रखता है कि अनुकंपा नौकरी के लिए आवेदन करने वाला आश्रित होने की शर्तें पूरी करता है।
शबीना नाम की महिला ने शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में तकनीकी सहायक पद पर कार्यरत पिता की मौत पर अनुकंपा नौकरी मांगी है, जिसे अदालत ने कानून के विपरीत नहीं माना। न्यायाधीश संजीव कुमार ने कहा कि यदि किसी तलाकशुदा बेटी, खासकर मुस्लिम महिला का उदाहरण लें तो वह तलाक के बाद इद्दत काल के दौरान गुजारा भत्ते की हकदार भी नहीं होती।
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ऐसी महिला अपने मां-बाप पर आश्रित हो सकती है। इसके अलावा विवाहित बेटी का पति दिव्यांग हो सकता है। उसे भी अभिभावकों का सहारा होता है। लिहाजा नियोक्ता अपने स्तर पर परिवार को परिभाषित नहीं कर सकता।
आवेदक यदि यह साबित कर देता है कि वह मृतक कर्मचारी का पति, पत्नी, बेटा, गोद लिया बेटा, बेटी, गोद ली बेटी, भाई, गोद लिया भाई, बहन, गोद ली बहन है और पूरी तरह से उसी पर आश्रित है तो उसे अनुकंपा नौकरी देने में कोई कानूनी अड़चन नहीं है।