राजस्थान हाईकोर्ट ने व्यवस्था देते हुए कहा है कि आजीवन कारावास का कैदी 14 साल की सजा भुगतने के बाद स्थाई पैरोल के लिए आवेदन कर सकता है, भले ही उसने पूर्व में तीन बार पैरोल का लाभ लिया हो या नहीं।
मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नान्द्रजोग, न्यायाधीश वीके व्यास और न्यायाधीश एसपी शर्मा की वृहदपीठ ने यह आदेश प्रेमदेवी की ओर से दायर याचिका में उठे विधिक बिन्दु को तय करते हुए दिए।
मामले के अनुसार हाईकोर्ट की एकलपीठ ने प्रकरण में यह विधिक बिन्दु उठाते हुए मामले को वृहदपीठ में भेज दिया था कि क्या आजीवन कारावास का कैदी 14 साल की सजा पूरी होने के बाद पहली बार में ही स्थाई पैरोल के लिए आवेदन कर सकता है या नहीं?
वृहदपीठ में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अनूप ढ़ंड ने अदालत को बताया कि चौथाई सजा पूरी होने पर कैदी को पहले पैरोल के तहत बीस दिन के लिए रिहा किया जाता है। इसके एक साल बाद तीस दिन के लिए और उसके एक साल बाद चालीस दिन के लिए पैरोल का लाभ दिया जाता है, लेकिन कई बार कैदी को पैरोल नियमों की जानकारी नहीं होती। ऐसे में वह 14 साल की सजा भुगतने तक पैरोल के लिए आवेदन नहीं कर पाता। इसलिए उसे स्थाई पैरोल के लिए आवेदन करने की अनुमति दी जानी चाहिए। जिसका विरोध करते हुए राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि राजस्थान प्रिजनर्स पैरोल नियम, 1958 के नियम 9 के तहत तीन बार पैरोल लेने के बाद ही स्थाई पैरोल का लाभ दिया जा सकता है।
दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद अदालत ने तय किया 14 साल की सजा भुगतने के बाद पहली बार में ही स्थाई पैरोल के लिए आवेदन किया जा सकता है।