राजस्थान हाईकोर्ट ने नगरीय विकास विभाग के गत 24 मई के उस सर्कुलर पर रोक लगा दी है, जिसमें 27 जून 1999 के बाद एसटी व एससी की भूमि पर बसी कॉलोनियों के नियमन करने का प्रावधान किया गया था। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार से पूछा है कि इस सर्कुलर के आधार पर कितने नियमन किए गए हैं। न्यायाधीश मनीष भंडारी की एकलपीठ ने यह आदेश अमरचंद की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।
याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता की भूमि को पीआरएन योजना के तहत अवाप्त किया गया था। समझौते के तहत जेडीए को पन्द्रह फीसदी विकसित भूमि देनी थी, लेकिन जेडीए ने भूमि देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि याचिकाकर्ता के पिता ने इस भूमि को पूर्व में किसी सोसायटी को एग्रीमेंट के जरिए बेच दी है। याचिका में कहा गया कि एग्रीमेंट फर्जी बनाया गया है। इस संबंध में उसकी ओर से एफआईआर भी दर्ज कराई जा चुकी है। ऐसे में उसे मुआवजा या पन्द्रह फीसदी विकसित भूमि दी जाए।
याचिका में यह भी कहा गया कि काश्तकारी अधिनियम की धारा 42 के तहत एससी या एसटी की भूमि सामान्य वर्ग को आवंटित नहीं की जा सकती है। वहीं राज्य सरकार की ओर से गत 24 मई का यूडीएच विभाग का सर्कुलर पेश कर कहा गया कि 27 जून 1999 के बाद एसटी या एससी वर्ग की भूमि पर बसी कॉलोनियों का पट्टा जारी किया जा सकता है।
जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने सर्कुलर पर रोक लगाते हुए पूछा है कि अब तक सर्कुलर के आधार पर कितने नियमन किए गए हैं।