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कलियुग में इन अंधे मां-बाप को मिलेगा कोई 'श्रवण कुमार'

Thu, 18 May 2017 04:07 PM IST
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
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करमावास चौधरी पत्नी लहरों देवी के साथ - फोटो : amar ujala
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त्रेतायुग में आपने अंधे माता-पिता को तीर्थ कराने निकले श्रवण कुमार की कहानी सुनी होगी, लेकिन कलियुग में आज अंधे और बूढें दंपती को भी सहारे की जरूरत है। सालों से एक-दूसरे की लाठी बनकर ये दंपती अब बूढें हो चुके हैं।
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हम बात कर रहे हैं बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र के करमावास गांव की। इस गांव में 75 वर्षीय करमावास चौधरी अपनी पत्नी लहरों देवी के साथ करीब बीस सालों से यही रह रहे हैं। दोनों पति-पत्नी आंख से अंधे हैं और इनके कोई संतान भी नहीं है। रोते हुए लहरों देवी ने बताया कि इसे विधि का विधान कहूं या फूटी किस्मत...बचपन में ही सही इलाज नहीं मिल पाने के कारण उसकी आंखे चली गई। शादी के बाद ससुराल आई तो कुछ सालों बाद पति देवाराम भी अंधा हो गया।

दुखों का पहाड़ अभी टूटना बाकी था। एक के बाद एक तीन बच्चे हुए जिन्हें भी मौत ने अपने आगोश में ले लिया। इसके बाद से ही दोनों जितनी भी मेहनत-मजदूरी करते उससे अपना पेट पालते थे। समय बीतने के साथ ही शरीर की ताकत भी जाती रही और अब बुढ़ापा अपना जोर दिखाने लगा। इसके चलते अब तो मेहनत-मजदूरी भी नहीं की जाती। पीहर से या आस-पड़ौस के लोगों से खाने-पीने के लिए जा मदद मिलती है उससे अपना गुजारा कर लेते हैं।
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दंपती के घर की हालत भी ठीक नहीं है। एक छोटे से कच्चे घर में रात गुजार लेते हैं। यहां ना बिजली है और ना ही पीने का पानी। दोनों दिनभर बाहर एक पेड़ के नीचे बैठकर अपने दिन गिनते रहते हैं। दंपती का कहना है कि जब से बूढ़े हुए हैं कोई सगा-संबंधी भी मिलने नहीं आता। उन्हें लगता है कि कहीं उनकी देखरेख का भार उन पर नहीं पड़ जाए। धीमी आवाज में दोनों बताते हैं कि अब तो सरकार से ही कुछ उम्मीद है।

उधर, बुजुर्ग दंपती की दयनीय हालत के मामले में जब करमावास सरपंच अशोक श्रीमाली से बात की गई तो उनका कहना है कि उन्हें इस सम्बंध में पूरी जानकारी नहीं है। पंचायत की ओर से जितनी सुविधा दी जा सकेगी उतनी मदद की जाएगी। समाजसेवी सुनील दवे का कहना है कि बुजुर्ग दंपती को पेंशन योजना से जुड़वाया था लेकिन ये बैंक भी नहीं जा पाते, इसलिए ये प्रयास भी बेकार ही रहा।
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