राजस्थान में विधानसभा और लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक हार के बाद मृत पड़ी कांग्रेस में नई जान फूंकने के लिए गुरुदास कामत की जगह अब राष्ट्रीय कांग्रेस ने अविनाश पांडेय को राजस्थान का प्रभार दिया है। मोदी लहर और गुटबाजी जैसी उल्टी लहरों के बीच प्रदेश कांग्रेस की नैया पार लगाने का भार पांडेय के कंधे पर आ गया है।
अविनाश पांडेय वर्ष 2008 में हुए विधानसभा चुनाव में राजस्थान में काम कर चुके हैं। उस समय काग्रेस की सरकार बनी थी। फिर भी प्रभारी के नाते पांडेय के लिए राजस्थान नया कार्य क्षेत्र है और राजस्थान में कांग्रेस की स्थिति बिलकुल भी ठीक नहीं कही जा सकती। चुनाव भी अगले वर्ष के अंत में होने वाले हैं। कांग्रेस राजस्थान विधानसभा में 200 में से मात्र 24 सीटें लाकर और लोकसभा चुनाव में सभी 25 सीटें गंवाकर ऐतिहासिक हार का दर्द झेल चुकी है। पिछले महीने धौलपुर उप चुनाव में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। ऐसे में पांडे के पास कांग्रेस को एकजुट करने के लिए अधिक समय नहीं बचा है।
पांडेय के सामने सबसे बड़ी चुनौति होगी कि यहां कांग्रेस दो धड़ों में बंटी नजर आती है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की कांग्रेस है, तो दूसरी ओर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की। गहलोत और पायलट धड़ों को एक सांचे में ढालकर टीम भावना पैदा करने का काम पांडेय को गम्भीरता से करना होगा।
कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच भी बड़ी असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि वे अपना नेता दोनों में से किसे मानें। पांडेय के सामने बुजुर्गों और युवा नेताओं को भी एक सूत्र में पिरोने की चुनौति पेश आएगी। बुजुर्ग और युवा नेता भी अलग-अलग पाले में खड़े दिखाई देते हैं। बुजुर्ग नेता और कार्यकर्ता अशोक गहलोत को पसंद करते हैं, वहीं युवा नेता और कार्यकर्ता सचिन पायलट को।
शुरू से ही राजस्थान कर्मभूमि रहने के कारण यहां अशोक गहलोत कांग्रेस के चेहरे के रूप में देखे जाते हैं। फिलहाल सचिन पायलट की ऐसी छवि नहीं बन पाई है। अविनाश पांडेय ने पद मिलने के बाद कहा कि मेरी नजर में पूरी कांग्रेस एक है। हम बुजुर्ग और युवाओं दोनों की राय लेकर आगे बढ़ेंगे। हमारा लक्ष्य रहेगा कि कांग्रेस का परचम राजस्थान में लहरे।