मुस्लिम विद्वान जफर सरेशवाला ने कहा कि मुस्लिम समाज में धार्मिक कट्टरता की जगह आधुनिक शिक्षा के प्रति लोगों का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। अब लोग धार्मिक गुरुओं को केवल मस्जिद तक ही सीमित रखना चाहते हैं।
सरेशवाला ने कहा कि देश में कोरोना संक्रमण को फैलाने के लिए कुछ लोगों ने तब्लीगी जमात को दोषी ठहराने की कोशिश की, लेकिन यह बहुत संकुचित सोच थी।
इससे भारत की छवि पूरी दुनिया में प्रभावित हुई। लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी ने इस कमी को समझा और मुस्लिम देश के नेताओं से बातचीत की। इससे स्थिति संभली।
लेकिन आज लोगों को इस बात का अहसास हो गया है कि यह किसी धर्म-संप्रदाय से जुड़ा मामला नहीं है। यह एक बीमारी है जो किसी भी धर्म-संप्रदाय, लिंग और किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है।
उन्होंने कहा कि वे लंबे समय से तब्लीगी जमात के कार्यक्रमों में आते-जाते रहे हैं। देश की रॉ-आईबी जैसी संस्थाओं से जुड़े उच्च लोग यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि तब्लीगी जमात में कोई खराबी नहीं है।
इससे जुड़ा कोई व्यक्ति अच्छा-बुरा हो सकता है। उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं मौलाना साद से इस कार्यक्रम को रोकने की बात कही थी, लेकिन उन्होंने यह सलाह नहीं मानी जिससे जमात की किरकिरी हुई।
हालांकि, जब जमात से जुड़े लोगों ने अपना प्लाज्मा दान, गरीबों की मदद और श्रमिकों को उनके घर पहुंचाने के दौरान उन्हें मदद देना शुरू किया, तब इस छवि में बदलाव आया।
उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस कुछ समय में ठीक हो जाएगा, इसका इलाज खोज लिया जाएगा। लेकिन कोरोना वायरस से ज्यादा खतरनाक सांप्रदायिकता का वायरस है, जिसका इलाज करने की ज्यादा जरूरत है, अन्यथा आने वाले समय में यह देश और समाज को ज्यादा बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है।
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले बेहद निंदनीय हैं और इसकी कड़ी आलोचना होनी चाहिए। उन्होंने अपने स्तर पर जांच के बाद यह पाया था कि इंदौर और मुरादाबाद में स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले हुए थे।
इससे समाज की छवि को गहरा नुकसान पहुंचता है। इस तरह की किसी भी घटना को रोका जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि देश की आर्थिक स्थिति को सही करने के लिए मांग को बढ़ाने की जरूरत है। देश के गरीब लोगों को राशन और नकदी की मदद की जानी चाहिए। एक बार लोगों को मदद मिलनी शुरू हो जायेगी, तब अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आएगी।
उन्होंने कहा कि इंग्लैंड में सरकार ने लॉकडाउन के पहले कंपनियों को सीधी आर्थिक मदद देना शुरू कर दिया। आज भी वहां लोगों का 85 फीसदी वेतन सरकार के खजाने से दिया जा रहा है।