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UP Assembly Election 2022: युवा-सोशल मीडिया-पार्टी प्रवक्ता.. इन पांच बिंदुओं में समझिए, क्यों बदली-बदली सी बसपा नजर आती है

प्रतिभा ज्योति
Updated Tue, 26 Oct 2021 02:27 PM IST

सार

बसपा की कई नई पहल का श्रेय पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद सतीश मिश्रा और उनके परिवार के सदस्यों को दिया जा रहा है। उनकी पत्नी और बेटा भी बसपा को चुनाव में जीत दिलाने के अभियान में जुटे हुए हैं। 
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बसपा सुप्रीमो मायावती - फोटो : amar ujala
मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में एक दशक बाद सत्ता में लौटने के लिए बेकरार है। लिहाजा पार्टी चुनाव जीतने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है। पार्टी अपनी पिछली कई गलतियों से सबक लेते हुए इस बार एक नए दृष्टिकोण के साथ चुनाव मैदान में उतरी है। जहां उसके केंद्र में युवा और महिलाएं हैं। सोशल मीडिया पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने की कवायद करने के साथ उनकी नजर पार्टी की छवि बदलने पर भी है। 

इस चुनाव में बसपा के रूप बदलने की चर्चा हर तरफ हो रही है। इन पांच बिंदुओं में समझते हैं कि 2022 में होने वाले चुनाव के लिए बसपा ने अपनी रणनीति में क्या अहम बदलाव किए हैं।  


1-  'सर्व धर्म सम भाव'    
इस बार मायावती की पार्टी ने राज्य में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। पार्टी दलित-ब्राह्मण सामाजिक इंजीनियरिंग से आगे जाकर खुद को 'सर्व धर्म सम भाव' (सभी धर्मों को समान समझने) की पार्टी के रूप में पेश कर रही है। भाजपा से नाराज माने जाने वाले ब्राह्रमणों के लिए नरम हिंदुत्व का रुख अपनाते हुए ब्राह्मणवाद की राह पर चल रही है। पार्टी राज्य भर में प्रबुद्ध सम्मेलनों का आयोजन कर रही है तो वहीं अपने कोर वोट बैंक दलितो को भी साधने में लगी है। 

सूत्रों के मुताबिक बसपा ओबीसी और ब्राह्मणों को टिकट बंटवारे में तवज्जो देने पर विचार कर रही है। इसलिए बसपा ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाकर 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा के वोट बैंक में सेंधमारी करना चाह रही है। इसके बाद वह अपने आधार वोटबैंक दलित और मुस्लिम को टिकट देने की रणनीति अपना रही है। 
 
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बसपा सुप्रीमो मायावती - फोटो : amar ujala
मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में एक दशक बाद सत्ता में लौटने के लिए बेकरार है। लिहाजा पार्टी चुनाव जीतने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है। पार्टी अपनी पिछली कई गलतियों से सबक लेते हुए इस बार एक नए दृष्टिकोण के साथ चुनाव मैदान में उतरी है। जहां उसके केंद्र में युवा और महिलाएं हैं। सोशल मीडिया पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने की कवायद करने के साथ उनकी नजर पार्टी की छवि बदलने पर भी है। 

इस चुनाव में बसपा के रूप बदलने की चर्चा हर तरफ हो रही है। इन पांच बिंदुओं में समझते हैं कि 2022 में होने वाले चुनाव के लिए बसपा ने अपनी रणनीति में क्या अहम बदलाव किए हैं।  

1-  'सर्व धर्म सम भाव'    
इस बार मायावती की पार्टी ने राज्य में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। पार्टी दलित-ब्राह्मण सामाजिक इंजीनियरिंग से आगे जाकर खुद को 'सर्व धर्म सम भाव' (सभी धर्मों को समान समझने) की पार्टी के रूप में पेश कर रही है। भाजपा से नाराज माने जाने वाले ब्राह्रमणों के लिए नरम हिंदुत्व का रुख अपनाते हुए ब्राह्मणवाद की राह पर चल रही है। पार्टी राज्य भर में प्रबुद्ध सम्मेलनों का आयोजन कर रही है तो वहीं अपने कोर वोट बैंक दलितो को भी साधने में लगी है। 

सूत्रों के मुताबिक बसपा ओबीसी और ब्राह्मणों को टिकट बंटवारे में तवज्जो देने पर विचार कर रही है। इसलिए बसपा ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाकर 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा के वोट बैंक में सेंधमारी करना चाह रही है। इसके बाद वह अपने आधार वोटबैंक दलित और मुस्लिम को टिकट देने की रणनीति अपना रही है। 
 

बसपा के ब्राह्मण सम्मेलन में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश मिश्रा - फोटो : amar ujala
मिश्रा का पूरा परिवार अभियान में शामिल
पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद सतीश मिश्रा और उनके परिवार के सभी सदस्य मिलकर पार्टी को जीत दिलाने की कोशिश में एकसाथ अभियान में जुटे हुए हैं। एक तरफ जहां उनके बेटे कपिल मिश्रा युवाओं की बैठकों को संबोधित कर रहे हैं। वे युवाओं से अपनी ‘बुआ’ को चुनाव जीताने की अपील कर रहे हैं। 'बुआ' सतीश चंद्र मिश्र को राखी बांधने वाली उनकी धर्म बहन मायावती ही हैं।

उन्होंने मीडिया से बातचीत में कई बार कहा है मुझे किसी पद की आवश्यकता नहीं है। मेरे लिए इतना ही काफी है कि मैं सतीश चंद्र मिश्रा का पुत्र और मायावती का भतीजा हूं। मेरे परिवार और मुझे पिछले 20 सालों से मायावती का प्यार और आशीर्वाद मिला है। मेरी इच्छा है कि मैं देखूं कि मेरी 'बुआ' पांचवीं बार मुख्यमंत्री बने। वहीं सतीश मिश्रा की पत्नी कल्पना मिश्रा ब्राह्मण और दलित समुदायों के महिला समूहों के साथ बातचीत के लिए "प्रबुद्ध महिला विचार गोष्ठी" और "बसपा महिला सम्मेलन" पहल के तहत बैठकें कर रही हैं।

इस बीच, मिश्रा पार्टी के स्थापित दलित-ब्राह्मण गठजोड़ में भाईचारा बढ़ाने की बात कर रहे हैं और उनकी बैठकें कर रहे हैं। मिली जानकारी के मुताबिक मिश्रा उत्तर प्रदेश के 70 से अधिक जिलों में ब्राह्मणों पर केंद्रित सभाओं को संबोधित कर चुके हैं। बसपा ने इस बार एक नया नारा भी दिया है- जय भीम, जय भारत, जय परशुराम। यूपी में दोनों समुदायों का एक साथ मिलाकर 36 प्रतिशत वोट शेयर है। 
 

गठबंधन की रैली को संबोधित करते आकाश आनंद (फाइल फोटो)
2-  युवाओं के हाथ में कमान
पार्टी यह बात समझ गई है कि प्रदेश के करीब 40 फीसदी युवा वोट बैंक को रिझाना हो तो बिना युवाओं को आगे किए हुए बात नहीं बनने वाली है। लिहाजा पार्टी ने दो महत्वपूर्ण युवा चेहरों को आगे करके उन्हें खास जिम्मेदारियां सौंपी है। बसपा प्रमुख मायावती के भतीजे आकाश आनंद और सतीश मिश्रा के बेटे कपिल मिश्रा को अहम जिम्मेदारी दी गई है। आकाश आनंद को राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया है। वहीं कपिल मिश्रा युवाओं को पार्टी के साथ जोड़ने के अभियान में लगे हैं। बताया जा रहा है कि इस बार बसपा बड़ी संख्या में युवा उम्मीदवारों को चुनाव में टिकट दे सकती है। 

3-  सोशल मीडिया पर मौजूदगी
सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत को समझते हुए पार्टी ने अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी अपनी दमदार उपस्थिति की रणनीति बनाई है। जबकि बसपा पहले सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखती थी और पार्टी का यह मानना था कि उनका वोटर सोशल मीडिया से प्रभावित नहीं होता है। देर से सोशल मीडिया की ताकत को समझने की वजह से पार्टी अभी तक इस मोर्चे पर भाजपा और सपा के मुकाबले पीछे दिखाई दे रही है, लेकिन अब पार्टी पूरी तरह से सोशल मीडिया पर सक्रिय है।

 

मायवती (फाइल फोटो)
मायावती ने 2018 में एक ट्विटर अकाउंट बनाया था। अब वे लगातार ट्वीट करती रहती हैं। जबकि मिश्रा ने इस साल जुलाई में ट्विटर ज्वाइन किया। ब्राह्रमणों के लिए आयोजित हुए सम्मेलन "प्रबुद्ध वर्ग विशाल गोष्ठी" की फेसबुक पर लाइव स्ट्रीमिंग शुरू की गई। सोशल मीडिया के जरिए बसपा की नजर उन युवाओं पर है जो भीमराव अंबेदकर की नीतियों का समर्थन करते हैं। मिली जानकारी के मुताबिक बड़ी संख्या में ऐसे छात्रों ने बसपा से जुड़ना शुरु कर दिया है। छात्रों और युवाओं को सोशल मीडिया की ट्रेनिंग दी जा रही है।

आकाश आनंद पार्टी नेताओं और युवाओं से सोशल मीडिया पर लगातार संपर्क बनाए रखते हैं। बसपा प्रवक्ता फैजान खान के बयान के मुताबिक 'बसपा सोशल मीडिया के जरिए युवाओं समेत समाज के हर वर्ग से जुड़ रही है, लेकिन पार्टी भी जमीन पर काम कर रही है।

4-  पार्टी प्रवक्ता नियुक्त
पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति में एक और बड़ा बदलाव किया है। बिना प्रवक्ता वाली पार्टी कहे जाने वाली बसपा ने जनता और मीडिया तक अपनी बात पहुंचाने के लिए तीन प्रवक्ताओं को नियुक्त किया है। मायावती ने धर्मवीर चौधरी, एमएच खान और फैजान खान को प्रवक्ता बनाया है। जबकि पहले बसपा नेताओं को मीडिया से बात करने की मनाही होती थी। हालांकि, बसपा की ओर से अभी तक कुछ चुनिंदा नेता टीवी पर बहस करते नजर आते थे, लेकिन वे पार्टी के घोषित प्रवक्ता नहीं थे। बल्कि उन्हें बसपा समर्थक कहा जाता था। बसपा नेता सुधींद्र भदौरिया टीवी पर पार्टी समर्थक के तौर पर चर्चा में हिस्सा लेते देखा गया, लेकिन पार्टी ने उन्हें प्रवक्ता नहीं बनाया है।

बसपा काल में बने पार्क
5-  छवि में बदलाव
जो एक और बड़ा बदलाव देखा जा रहा है वह यह है कि पार्टी छवि बदलने की कवायद पर जोर दे रही है। मूर्ति, पार्क और स्मारक बनाने की आलोचना सहने वाली वाली पार्टी अब इस छवि से बाहर निकलने की छटपटाहट में है। मायावती ने हाल ही में पार्टी के एक कार्यक्रम में वादा किया था कि इस बार सरकार बनने पर वह मूर्ति, पार्क और स्मारक बनाने के बजाए केवल राज्य के विकास पर ध्यान देंगी। इसके पीछे बसपा यह तर्क देती है कि दलित सम्मान की खातिर पार्क, मूर्तियां और स्मारक बनाना भी जरुरी था और वह काम अब पूरा हो चुका है इसलिए अब केवल विकास कार्य किए जाएंगे। 

बाहुबलियों के साथ सख्ती से निबटने की योगी सरकार की नीतियों को देखते हुए बसपा ने भी बाहुबलियों से अपना पीछा छुड़ाने की घोषणा की और पांच बार विधायक और गैंगस्टर से नेता बने मुख्तार अंसारी को टिकट देने से इनकार कर दिया। मायावती ने यह भी घोषणा की है कि वे इस चुनाव में किसी भी "बाहुबली" को टिकट नहीं देंगी। 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले मायावती ने अंसारी और उनके परिवार के सदस्यों को पार्टी में शामिल किया था और उन्हें टिकट दिया था। 
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