पीठ ने अस्पताल की ओर से पेश वकील श्रीनिवास राव से कहा कि वह मामले में कागजात देखें और बताएं कि अस्पताल ने लंग्स ट्रांसप्लांट के लिए जो खर्च बताया है, क्या उसमें कोई कमी हो सकती है।
पति के लंग्स ट्रांसप्लांट के लिए वित्तीय मदद की गुहार करने वाली एक महिला की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अस्पताल से कहा कि वह देखे कि क्या अनुमानित खर्च में कमी की जा सकती है?
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दरअसल एक महिला ने याचिका दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट से कहा कि पति के लंग्स का ट्रांसप्लांट होना है। इसके लिए उसे पीएम केयर या स्टेट सीएम रिलीफ फंड से एक करोड़ रुपये की सहायता दिलवाई जाए।
जस्टिस एल नागेश्वर राव व जस्टिस अनिरुद्ध की पीठ ने कहा कि वह अस्पताल को कोई निर्देश नहीं दे रहे हैं बल्कि सिर्फ यह अपील कर रहे हैं कि क्या इस मामले में कुछ राहत दी जा सकती है। क्याइलाज में आने वाले खर्च को कम किया जा सकता है।
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अस्पताल के वकील ने पीठ को बताया कि मरीज की स्थिति ठीक हो रही है और अगर स्वास्थ्य में सुधार जारी रहा तो हो सकता है कि लंग्स के ट्रांसप्लांट की जरूरत ही न पड़े। इस पर पीठ ने कहा कि यह अच्छी बात है। आप अगले हफ्ते अस्पताल से निर्देश लेकर आएं कि क्या वह इलाज के खर्च में कोई छूट दे सकता है। हम सोमवार, 16 अगस्त को अगली सुनवाई करेंगे।
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा कि उनके पति का इलाज भोपाल एम्स में ईसीएमओ मशीन नहीं होने के कारण नहीं हो पाया तो उन्हें एयर लिफ्ट कर तेलंगाना में सिकंदराबाद के आईएमएस अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पति को वित्तीय सहायता न देना संविधान के अनुच्छेद 14 एवं अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
राज्य की जिम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों को पर्याप्त स्वास्थ्य सुरक्षा मुहैया कराए और कोविड जैसे संकट में यह जिम्मेदारी विशेष मायने रखती है। उन्होंने अपनी दलील में परमानंद कटारा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी जिक्र किया। इसमें कहा गया है कि लोगों के जीवन की रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है।