नीतीश कुमार लालू प्रसाद यादव का साथ छोड़ एक बार फिर भाजपा के साथ सरकार बनाने की तैयारी कर चुके हैं।रविवार को उन्होंने राज्यपाल को इस्तीफा सौंप दिया है। आज शाम ही उनके दुबारा शपथ लेने की संभावना है। इस पूरे प्रकरण में भाजपा और नरेंद्र मोदी विजयी बनकर उभरे हैं। नीतीश कुमार को अपने पाले में लाकर उन्होंने न केवल विपक्ष के इंडिया गठबंधन के ताबूत में आखिरी कील ठोकने का काम किया है, बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव में अपनी जीत की राह भी आसान कर ली है।
लेकिन इस पूरे प्रकरण का एक असर यह भी होगा कि पूरा गैर भाजपाई मतदाता राष्ट्रीय जनता दल के नीचे एकजुट हो सकता है। यहां तक कि नीतीश कुमार के पारंपरिक मतदाताओं का एक हिस्सा भी तेजस्वी यादव के साथ जा सकता है। यदि ऐसा हुआ तो तेजस्वी यादव बिहार में विपक्ष के सबसे बड़े नेता के तौर पर उभर सकते हैं।
पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में जब कि भाजपा और जदयू ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, उस चुनाव में भी राष्ट्रीय जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। एआईएमआईएम के द्वारा कुछ मतों को काटने और तेजस्वी यादव के कमजोर अनुभव के कारण तेजस्वी यादव सरकार बनाने से वंचित रह गए थे।
लेकिन अब जिस तरह की वर्तमान चुनावी परिस्थितियां बन रही हैं, और बिहार की राजनीति में बेहद प्रभावशाली मुस्लिम मतदाताओं का रुझान राजद या कांग्रेस के पक्ष में झुकाव हुआ है, आगामी चुनाव में पूरा गैर भाजपाई वोटर राजद के नीचे एकत्र हो सकता है। इससे तेजस्वी यादव विपक्ष के सबसे बड़े नेता बनकर उभर सकते हैं।
ये होंगे मुद्दे
इस चुनाव में तेजस्वी यादव यह दावा कर सकते हैं कि उनके प्रयास के कारण ही बिहार में जातीय जनगणना हुई है। आरक्षण की सीमा में बढ़ोतरी हुई है और भारी संख्या में युवाओं को सरकारी नौकरियां मिली हैं। बिहार का जातीय समीकरण इस तरह का है कि वहां उनके इस मुद्दे के खरीदार काफी संख्या में होंगे और उन्हें इसका लाभ मिल सकता है। यही कारण है कि महागठबंधन या इंडिया गठबंधन के लिए इस पूरे नकारात्मक प्रकरण में तेजस्वी यादव के लिए बड़ा अवसर दिखाई दे सकता है।