इसके पूर्व केरल के पलक्कड़ में आरएसएस की तीन दिवसीय बैठक के बाद एक प्रेस कांफ्रेंस करते हुए संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी सुनील आंबेकर ने स्पष्ट किया था कि संघ जातिगत जनगणना के विरोध में नहीं है। यदि सरकार को जनता का विकास करने के लिए इसकी आवश्यकता है तो जातिगत जनगणना कराई जानी चाहिए। हालांकि उन्होंने इसकी राजनीति का विषय न बनाये जाने की अपील भी की थी।
दरअसल, संघ का जातिगत जनगणना को दिया गया यह समर्थन यह बताता है कि वह देश की नई सियासी चाल को बखूबी समझ रहा है। संघ समझ रहा है कि जातियां भारतीय समाज की एक कटु सच्चाई हैं। यह भी सच है कि अपनी जातिगत पहचान को लेकर इस समय लोगों के अंदर एक विशेष तरह का आकर्षण देखा जा रहा है। ऐसे में यदि वह जातिगत जनगणना का विरोध करता है तो विपक्षी दलों के द्वारा उसे दलित-पिछड़ी जातियों के विकास का विरोधी करार दिया जा सकता है। संभवतः यही कारण है कि संघ ने जातिगत जनगणना के मुद्दे का निःसंकोच समर्थन कर दिया।
इसके पहले बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान आरक्षण की समीक्षा संबंधी बयान देकर संघ उसका नुकसान देख चुका है। ऐसे में यदि एक बार भी वह जातिगत जनगणना के विरोध में बात कहता तो विपक्षी दल इसे भाजपा की असली सोच बताते हुए इसका विरोध किया जा सकता था। आगामी विधानसभा चुनावों में इसका भगवा दल को बड़ा नुकसान हो सकता था। यह भी एक कारण हो सकता है कि संघ ने इस मुद्दे पर सामान्य जनमत को ध्यान में रखते हुए इसका समर्थन कर दिया हो।
पूर्व में भी वामपंथी विचारधारा के विद्वान संघ के अंदर पिछड़ी-दलित जातियों के लोगों की उच्च पदों पर पर्याप्त भागीदारी न होने का प्रश्न उठाते रहे हैं। लेकिन तब भी संघ कभी विचलित नहीं हुआ। बल्कि संघ ने इन आरोपों का हमेशा ही मजबूती के साथ खंडन किया। उसका कहना रहा है कि वह कभी किसी व्यक्ति को जाति के रूप में नहीं देखता। संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों को भी कभी अपने आसपास के लोगों की जातियों के बारे में कोई जानकारी नहीं होती। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि संघ में किसी की जाति को देखने की संस्कृति नहीं है। वह अपने कार्यकर्ताओं-पदाधिकारियों का मूल्यांकन उनके सामाजिक कार्यों और संघ में दिए गए सेवाकाल के आधार पर करता है। लेकिन जब संघ पर ऐसे आरोप लगे, तब यही देखा गया कि संघ के कई बेहद महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली पदों पर विभिन्न जातीय समुदायों के लोग बैठते रहे हैं।
बदलती रही है संघ की सोच
दरअसल, पूर्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक रूढ़िवादी संगठन के तौर पर देखा जाता था। लेकिन डॉ. मोहन भागवत के नेतृत्व में संघ ने हाल ही में कई बार ऐसे बयान दिए हैं जिससे ये संकेत मिलते हैं कि संघ लगातार समय के साथ अपने आपको बदल रहा है। डॉ. मोहन भागवत का एक मस्जिद में जाकर मुस्लिम धार्मिक विद्वान से मुलाकात करना संघ की सोच में बड़े बदलाव का संकेत दे चुकी है।
संघ हमेशा से समाज के कमजोर वर्गों को ही आरक्षण दिए जाने का समर्थक रहा है, लेकिन अब वह दलित-ओबीसी समाज के लोगों को तब तक के लिए आरक्षण का समर्थन कर रहा है जब तक कि उस समाज के लोग स्वयं यह न कह दें कि उन्हें अब आरक्षण की कोई आवश्यकता नहीं है। संघ की यह सोच भी उसके अंदर बड़े बदलाव का संकेत है। इसके अलावा किन्नर समुदाय के अधिकारों की बात करना, गुरु गोलवलकर की सोच से उलट मुसलमानों के बिना भारत के अधूरा होने की बात कहना भी उसके अंदर सतत परिवर्तन का प्रमाण है। राजनीतिक विश्लेषक इसे एक सकारात्मक बदलाव के तौर पर देखते हैं।
'संघ हमेशा राष्ट्र को प्रमुखता देता है'
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय ने अमर उजाला से कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा राष्ट्र प्रथम की विचारधारा से प्रेरित रहा है। उसके हाल के कुछ स्टैंड में जो बदलाव दिख रहे हैं, वे समय के अनुसार राष्ट्र को मजबूत बनाने के लिए लिए गए समझे जा सकते हैं। संघ ने आज भी जातिगत जनगणना का समर्थन समाज की कमजोर जातियों के विकास के लिए किया है। लेकिन उसने इसके राजनीतिक उपयोग से बचने की बात भी कही है क्योंकि संघ जानता है कि जातिगत जनगणना की संख्या सार्वजनिक होने से इसके गंभीर दुष्परिणाम निकल सकते हैं।
सुनील पांडेय ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें समाज की प्राथमिकता को देखते हुए ही अपनी नीतियां बनाती हैं और आर्थिक संसाधनों को उचित दिशा में झोंकती हैं। ऐसे में यदि सरकारों के पास जातियों की पूरी जानकारी नहीं होगी तो उसके लिए किस वर्ग को कितनी प्राथमिकता देनी है, इसकी जानकारी नहीं हो पाएगी। ऐसे में जातिगत जनगणना कराने में कोई बुराई नहीं है।
लेकिन पूर्व में यूपी-बिहार से लेकर दक्षिण भारत तक के राज्यों में जातिगत मुद्दों पर जितने गहरे विवाद रहे हैं, उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि सामाजिक समरसता बनाए रखने के लिए जातिगत जनगणना के आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। भारतीय राजनीतिक दल जिस तरह राष्ट्रीय हितों को किनारे रखकर राजनीति करते रहे हैं, उसे देखते हुए भी यह गंभीर चिंता का विषय है कि इन आंकड़ों को कैसे सुरक्षित रखा जाए जिससे इसका कोई दुरुपयोग न हो सके।
'संघ को खुद को अलग रखना चाहिए'
राजनीतिक विश्लेषक विवेक सिंह ने अमर उजाला से कहा कि जातिगत जनगणना पूरी तरह से एक प्रशासनिक मामला है। किसी सरकार को इसकी आवश्यकता नीतियां बनाने के लिए हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। देश के प्रशासन को लेकर उसकी सीधी कोई जिम्मेदारी नहीं है, ऐसे में संघ को इस तरह के विषयों में बोलने से बचना चाहिए था। उन्होंने कहा कि संघ की भूमिका समाज को मजबूत करने के लिए है और उसे अपनी उसी भूमिका को मजबूत करना चाहिए, इस तरह के मामलों में बयान देने से विपक्षी दलों पर उस पर आक्रमण करने का अवसर मिल जाता है जिससे बचना संघ और सरकार दोनों के लिए हितकर है।