भारत में 2018 में तपेदिक के करीब 5.4 लाख मामले दर्ज ही नहीं हुए। ऐसा तब हुआ हैै जबकि भारत इस बीमारी से सबसे ज्यादा जूझ रहे आठ देशों में शामिल है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2018 में तपेदिक मरीजों की संख्या में पिछले साल की तुलना में करीब 50,000 की कमी आई।
टीबी के इलाज की कारगर दवा रिफामसिन के हताश करने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इस दवा के निष्प्रभावी मामलों की संख्या 2017 में 32 फीसदी थी। यह संख्या 2018 में बढ़कर 46 फीसदी हो गयी। हालांकि टीबी के नये मरीज और दोबारा इसकी चपेट में आने मरीजों की के उपचार की सफलता दर 2016 के 69 फीसद से बढ़कर 2017 में 81 फीसदी हो गई।
रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य सेवा का बड़ा ढांचा कमजोर है और कर्मचारियों की कमी की समस्या देखने को मिल रही है। इसके अलावा बीमारी का शुरुआती दौर में पता लगने में दिक्कत और सही इलाज का मिलना चुनौती बनी हुई है। खराब रिपोर्टिंग भी एक प्रमुख समस्या है।