जापान ने अपने यहां आर्थिक मंदी की घोषणा कर दी है। जापान तीसरी से चौथी अर्थव्यस्था बन गया। ब्रिटेन को आर्थिक क्षेत्र में बड़ा झटका लगा है। जर्मनी की अर्थव्यवस्था सुधार करते हुए तीसरे नंबर पर आई है, लेकिन चुनौतियां बढ़ रही हैं। चीन के सामने बड़ा संकट मुंह बाए खड़ा है। वहां से तमाम अंतरराष्ट्रीय कंपनियां दूसरे देशों की तरफ का रुख कर रही हैं। रंजीत कुमार कहते हैं कि अमेरिका और यूरोप में मांग काफी घट गई है। इस तरह से दुनिया में एक बड़ी आर्थिक मंदी दस्तक देती हुई नजर आ रही है। हालांकि, इसके असर से अभी अरब देशों को कोई बड़ा नुकसान नहीं हो रहा है। ईरान पहले से अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों को झेल रहा है। रूस और इस्राइल युद्ध में उलझे हुए हैं। अफ्रीकी देश इस दौड़ से बहुत प्रभावित नहीं हो रहे, लेकिन दुनिया के तमाम विकासशील देशों पर अब इसका असर तेजी से बढ़ने लगा है।
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ऐसे बंद किया पश्चिम का मुंह
म्यूनिख सम्मेलन से इतर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक बार फिर पश्चिम का मुंह बंद कराया। जब विदेश मंत्री कूटनीतिक लहजे में खुलकर बोल रहे थे तो उस समय अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के पास मुस्कराने के सिवा कोई चारा न था। उस समय मंच पर जर्मनी की विदेश मामलों की मंत्री अन्नालेना बेयरबॉक भी थीं। जयशंकर से भारत की गुट निरपेक्ष से हर गुट की ओर बढ़ रही विदेश नीति पर सवाल किया गया।
जवाब में विदेश मंत्री ने सवाल किया कि क्या यह एक समस्या है? आखिर यह एक समस्या क्यों होनी चाहिए? जयशंकर ने कहा कि मैं (भारत) इतना चालाक हूं और मेरे पास एक से अधिक विकल्प हैं, तो आपको हमारी तारीफ करनी चाहिए। जयशंकर का यह जवाब बड़ा सटीक था। उन्होंने भारत के रूस से सस्ता तेल लेने और इस विकल्प में वेनेजुएला को भी शामिल करने का मुंहतोड़ जवाब दिया। उन्होंने इसे भारत के हित से जोड़ा और भारत के मानवीय पक्ष को मजबूत रखते हुए कूटनीतिक जवाब दिया। जबकि पश्चिम के देश ऐसे सवाल के बहाने रूस की आलोचना सुनना चाहते थे। जयशंकर भारत की सस्ते तेल की आवश्यकता को देखते हुए कई मौकों पर अपने चतुराई भरे बयान से पश्चिम के देशों का मुंह बंद कर चुके हैं। लेकिन भारत पर अपने विकास से जुड़े हित को देखते हुए सस्ती दर पर कच्चा तेल पाना लगातार एक चुनौती बना हुआ है।
इस्राइल, हमास, ईरान और अमेरिका का तनाव बढ़ा रहा भारत जैसे देशों की चुनौती
इस्राइल का गाजा पर और हमास के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई जारी है। ईरान और अमेरिका में टकराव चल रहा है। इस तनाव के कारण हूती विद्रोहियों ने पूरे लाल सागर के व्यापारिक मार्ग को अशांत, अस्थिर, भययुक्त बना रखा है। इसके चलते मालवाहक जहाजों को काफी लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है और मालभाड़े में लगभग दोगुने तक की बढ़ोतरी हो गई है। जहाजरानी मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि इसके कारण तमाम भारतीय व्यापारियों, कारोबारियों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। यह स्थिति केवल भारत के सामने नहीं है, बल्कि तमाम विकासशील देश इससे जूझ रहे हैं।
यूक्रेन और रूस के बीच में चल रहा युद्ध भी अनिश्चित
एलन मस्क ने भविष्यवाणी की है कि यदि यूक्रेन से रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन पीछे हटे तो उन्हें मार दिया जाएगा। एयर वाइस मार्शल एन बी सिंह भी कहते हैं कि अब यूक्रेन का मसला पुतिन के लिए जीवन और मरण का प्रश्न बन गया है। युद्ध लंबा खिंच रहा है। जबकि यूक्रेन के पास लड़ने के संसाधन नहीं है और रूस भी गोला बारूद आदि को टोटा महसूस कर रहा है। इस युद्ध से यूरोप की अर्थव्यवस्था पर काफी प्रभाव पड़ा है। खासकर ब्रिटेन को बड़ा झटका लगा है। इसी तरह इस्राइल की हमास के विरुद्ध गजा पर सैन्य कार्रवाई लंबा खिंचती जा रही है। इस्राइल की सैन्य कार्रवाई के बाद से ही अमेरिका के यूक्रेन को सहायता देने के मामले में हाथ बंधे हैं। रूस के पास भी यूक्रेन के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई जारी रखने के लिए गोला बारूद का टोटा है। रूस को गोला-बारूद आदि संसाधन जुटाने में जहां कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है, वहीं आर्थिक प्रतिबंधों के चलते भारत, चीन समेत तमाम देशों को व्यापार, कारोबार में हाथ बांधने पड़ रहे हैं। पूर्व एयर वाइस मार्शल एन बी सिंह कहते हैं कि जब युद्ध होता है तो वहां अर्थव्यवस्था, निवेश, कारोबार, व्यापार की काफी संभावनाएं ठप हो जाती हैं। विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार का कहना है कि यूरोपीय देशों की मांग को देख लीजिए। वहां मांग काफी घट गई है। रंजीत कुमार और एयर वाइस मार्शल दोनों का कहना है कि इस समय तो दुनिया पूरी तरफ से उलझी हुई है। सीधी सी बात है कि इसका सबसे अधिक असर तो विकासशील और अविकसित देशों पर ही ज्यादा पड़ेगा।
चीन के कारण भी लड़खड़ा सकती है कुछ देशों की अर्थव्यवस्था
रंजीत कुमार कहते हैं कि चीन और अमेरिका तमाम बड़ी दुश्वारियां झेल रहे हैं। अमेरिका के साथ रिश्ते बिगड़ने के बाद से चीन के सामने अर्थव्यवस्था को संभालने, घरेलू चुनौतियों से निपटने, रोजगार के संकट से पार पाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। अंतरराष्ट्रीय सामाजिक मामलों के जानकार सुमित चंद्रा कहते हैं कि चीन के सामने दोहरी चुनौती है। वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धमक बढ़ाना चाहता है। इसके साथ-साथ घरेलू चुनौती लगातार अपना आकार बढ़ाती जा रही है। चीन को दुनिया की फैक्ट्री कहा जाने लगा था। चीन ने अपने इंजीनियरों आदि को दुनिया के देशों में भेजकर (वर्ल्ड टूरिज्म ) कई देशों में आर्थिक मजबूती के लिए अपने पांव जमाए थे। लेकिन मांग घटने और कई भू-राजनैतिक बदलावों के चलते उसे कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। सुमित चंद्रा कहते हैं कि यही स्थिति रही तो दुनिया के तमाम देशों को चीन के कारण एक आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, अमेरिका और चीन ने अपने रिश्तों को पटरी पर लाने के लिए सोचना और जोर देना शुरू कर दिया है, लेकिन अभी आगे के बारे में कुछ कहना मुश्किल है।
भारत ने सही नीति अपनाकर तमाम खतरे से बचाया लेकिन आगे बढ़ेंगी चुनौतियां
रूस से सस्ता ईंधन तेल मिलने में आई कठिनाई को देखकर भारत ने वेनेजुएला से लेना शुरू कर दिया। वैकल्पिक सप्लाई चैन, ग्रीन ऊर्जा तथा सेमी कंडक्टर क्षेत्र में निवेश तथा नए प्रयोग से भारत ने खुद को तमाम आर्थिक खतरों और चुनौतियों से बचाया है। रंजीत कुमार यह भी कहते हैं कि भारत ने सही समय पर अपनी नीतियों में छोटे-मोटे बदलाव, घरेलू व्यापार और विस्तार को नई दिशा देकर आर्थिक झटकों से बचाए रखा है। दूसरे, चीन से निकल रही दुनिया की कंपनियों में कुछ भारत में भी अपने कल कारखाने और निवेश लेकर आ रही हैं। लेकिन अभी भारत में निवेश के क्षेत्र में इको सिस्टम बनाने की चुनौती है। यह इको सिस्टम अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को भारत में आने से रोकती है। एनबी सिंह भी कहते हैं कि चीन, यूरोप, समेत तमाम देशों की तुलना में अंतरराष्ट्रीय प्रभाव काफी कम है। लेकिन फिर भी हमें सतर्क रहना होगा।