किसी महिला से उसकी इच्छा के बिना सेक्स करना रेप यानी बलात्कार माना जाता है। यह कानूनन अपराध है जिसके लिए भारतीय दंड संहिता में सजा का प्रवाधान है। लेकिन भारत में पति अपनी पत्नी की मर्जी के बिना उसके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे अपराध नहीं माना जाता। यानी भारत में वैवाहिक बलात्कार या मैरिटल रेप कानूनन अपराध के दायरे से बाहर है।
केंद्र सरकार ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने से इंकार किया है और कहा है कि ऐसा करना विवाह की संस्था के लिए खतरा साबित होगा।
दरअसल दिल्ली हाईकोर्ट वैवाहिक बलात्कार को अपराध करार देने की मांग वाली याचिकाओं का निपटारा कर रही है। कोर्ट ने इस बारे में केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने को कहा। इसके जवाब में केंद्र सरकार ने हलफनामा दायर कर कहा कि वैवाहिक बलात्कार को दंडनीय अपराध नहीं बनाया जा सकता क्योंकि ऐसा करना विवाह की संस्था के लिए खतरनाक साबित होगा। यह एक ऐसा चलन बन सकता है, जो पतियों को प्रताड़ित करने का आसान जरिया बन सकता है।
केंद्र सरकार का मत है कि बहुत सारे पश्चिमी देशों में वैवाहिक बलात्कार अपराध की श्रेणी में है। लेकिन इससे यह जरूरी नहीं है भारत में भी इसका आंख मूंदकर अनुसरण किया जाए। केंद्र ने यह भी कहा कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने से पहले देश में शिक्षा, महिलाओं की आर्थिक हालत, गरीबी जैसी तमाम समस्याओं के बारे में भी सोचना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने साल 2017 में अपने एक फैसले में कहा था, "वैवाहिक संबंध के भीतर हुए बलात्कार को अपराध की श्रेणी में नहीं गिना जाएगा।"
उस समय एक स्वयंसेवी संस्था इंडिपेंडेंट थॉट ने मैरिटल रेप को कानून अपराध घोषित करने के लिए याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। तब भी केंद्र सरकार ने कहा था कि सरकार आईपीसी की धारा 375 के परंतुक (अपवाद) 2 के समर्थन में है। धारा 375 के अपवाद 2 में पति, नाबालिग पत्नी और उनके वैवाहिक संबंध की मर्यादा की रक्षा की बात कही गई है।
ऐसे में यह सवाल मौजूं हो जाता है कि 'बलात्कार' और 'वैवाहिक बलात्कार' में क्या फर्क है और विवाह की संस्था का इससे क्या संबंध है?