फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बुंदेलखंड: पहले खेत सूखे, फिर पेट सूखे, अब हलक सूखे

विज्ञापन
बुंदेलखंड की सबसे बड़ी चुनौती जो जिंदा है, उनके लिए जिंदा बने रहने की है। - फोटो : ब्यूरो, अमर उजाला
विज्ञापन
पहले खेत सूखे, फिर पेट सूखे, नदी-नाले सूखे और अब हलक सूखे। पिछले चालीस सालों के सबसे भयावह सूखे से जूझ रहे आज के बुंदेलखंड की यही असल तस्वीर है। खेतों में अर्से से वीरानियां हैं। गांव-देहात बूढ़े और महज लाचार लोगों की बस्तियां हैं। पीने के पानी के लिए भी अब धरती से पाताल तक जद्दोजहद करनी पड़ रही है। पानी के झगड़े अब हिंसक हो रहे हैं और इससे सामाजिक समरसता खत्म हो रही है। नदी-नाले सूखने से जानवरों ने दम तोड़ना शुरू कर दिया है। अब सबसे बड़ी चुनौती जो जिंदा है, उनके लिए जिंदा बने रहने की है। 
विज्ञापन


मेरी पैदाइश इसी बुंदेलखंड की धरती की है। जो तस्वीर आज देख रहा हूं, इससे पहले कभी नहीं देखी। सूखे के बारे में खूब सुना-पढ़ा था लेकिन ललितपुर जिले में इस तरह के बदतर हालात इससे पहले कभी नहीं देखे। बुंदेलखंड का चाहे वो उत्तर प्रदेश का इलाका हो या मध्यप्रदेश का, कमोबेश हालात एक जैसे ही हैं। 

ललितपुर जिले की बार तहसील के एक गांव के सरकारी स्कूल में शिक्षक दीपक जैन कहते हैं, "अब असल चुनौती अगले तीन महीने की हैं। इन तीन महीनों से पार पाना इलाके के लोगों के लिए अपने जीवन-मरण की चुनौती है।" जैन बताते हैं कि इलाके के गांवों से तेजी से पलायन हो रहा है। गांव में केवल वही बचे हैं जो लाचार हैं और कहीं दूसरी जगह जाकर कमा नहीं सकते। ज्यादातर जवान लड़के पंजाब और आसपास के दूसरे शहरों में पेट पालने की जद्दोजहद में पलायन कर चुके हैं। 
विज्ञापन


पेट भरने का संघर्ष  पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो ही चुका था अब गले को तर करने की जद्दोजहद भी बढ़ गई है। कुएं, तालाब, बांध, नदियां सब सूख चुके हैं और हैंडपंपों में पानी पाताल को जा पहुंचा है। महरौनी तहसील के नाराहट गांव के निवासी आनंद गुप्ता कहते हैं "जिन हैंडपंपों में पानी पहले 70 फीट पर हुआ करता था, अब वहां 150 फीट पर भी पानी नहीं मिल रहा। अभी गर्मी की शुरुआत हुई है, भीषण गर्मी की चुनौती अभी बाकी है। अगर इस बार मॉनसून ने  धोखा दिया तो जो हालात होंगे उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।" 

बुंदेलखंड हमेशा से सियासत का बड़ा मुद्दा रहा है। इस बार भी केंद्र और राज्य सरकारें दावों-प्रतिदावों की खूब सियासत कर रही हैं लेकिन अगर सियासी रहनुमा इस इलाके का हवाई दौरा भी करें तो आंखें खोल देने वाली हकीकत सामने आएगी। अमर उजाला ने अपने तमाम रिपोर्टर के जरिये इलाके में सूखे की अब तक की जो तस्वीर देखी, वो पढ़कर आपको इसकी भयावहता का अंदाज हो जाएगा।


सूखे का सूरत-ए-हाल: पहली तस्वीर

(झांसी से मुकेश साहू की रिपोर्ट) बुंदेलखंड में सूखे का असर यहां के बांधों पर भी पड़ रहा है। पिछले कई साल से औसतन वर्षा न होने के कारण अधिकांश बांधों में पानी नहीं है। आसपास के गांवों का जलस्तर तो बहुत नीचे पहुंच ही गया है। अधिकांश कुएं व हैंडपंप भी साथ छोड़ चुके हैं। जानवरों तक के लिए पानी तो दूर अब वे तलहट की कीचड़ में फंस कर दम तोड़ रहे हैं। 

गांव के नजदीक बांध बना होने के बाद भी लोगों को दूर-दूर से पानी लाना पड़ रहा है। यह कहा जाता है कि जहां बांध बने होते हैं वहां के आसपास गांवों की खेती हमेशा लहलहाती नजर आती है। इन गांवों के छोटे कास्तकार (पांच बीघा जमीन से भी कम खेती वाले किसान) भी संपन्न होते हैं। मगर बुंदेलखंड के सूखे ने इस परिभाषा को बदल दिया है। वैसे तो यहां माताटीला, ढुकुवा, पारीछा, डोंगरी, पहूज, खपरार, सपरार, पहाड़ी, लहचूरा, बड़वार आदि कई बांध बने हुए हैं। मगर जिन बांधों को भरने के लिए बरसात के पानी को पीछे से आने का कोई स्रोत नहीं है, वह बांध चैत्र की तपिश में ही सूख गए हैं। इनमें डोंगरी, खपरार, लहचूरा, बड़वार में बिलकुल भी उपयोगी पानी नहीं बचा है। बांध पर खड़े होकर देखें तो सामने थोड़ा बहुत पानी ऊपर नजर आएगा, मगर उसके नीचे सिर्फ कीचड़ (सिल्ट) भरा पड़ा है।

डोंगरी बांध की ही बात करें तो इसके भराव क्षेत्र के आसपास चमरौआ, कोटी, सलैया, टपरिया, बंडा, बजरंग गढ़ गांव बसे हैं। 362 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला बांध का भराव क्षेत्र 25 हेक्टेयर में सिमट कर रह गया है। इन सभी गांवों के पंद्रह हजार से अधिक लोग बूंद-बूंद पानी को परेशान हो रहे हैं। बांध के भराव क्षेत्र के सबसे नजदीक बसे कोटी गांव में आठ हैंडपंपों में सिर्फ दो में पानी आ रहा है। चमरौआ में भी पंद्रह हैंडपंपों में तीन पानी दे रहे हैं। यह हैंडपंप भी गांव से दूर हैं, इस कारण लोगों को साइकिलों व अन्य साधनों से पानी ढोना पड़ रहा है। जलस्तर गिरने से उक्त सभी गांवों के किसानों के खेतों में बने साढ़े तीन सौ से अधिक कुओं में सिर्फ बीस कुओं में ही पानी है, बाकी सब सूख चुके हैं। जिन कुओं में पानी है वह भी गांव से दूर हैं। 

कुओं व बांध में पानी न होने से इस बार दस फीसदी किसान भी गेहूं की फसल कर सालभर के अन्न का इंतजाम नहीं कर सके हैं। इन दिनों मजदूरी करने जा रहे ग्रामीणों को छोड़ दें तो अन्य जो भी परिवार में सदस्य हैं वह सिर्फ पानी लाने के इंतजाम में लगे रहते हैं। यह दंश उन्हें कब तक झेलना होगा? यह सवाल दिमाग में आते ही आसमान की तरफ देखने लगते हैं।  

बोए गेहूं की भी नहीं निकल सकी लागत 
डोंगरी बांध के आसपास के गांवों के जिन भी ग्रामीणों ने इस बार गेहूं की फसल बोई थी, उनकी लागत तक नहीं निकल सकी। किसान थान सिंह ने बताया कि उसकी चार एकड़ जमीन में सौ कुंतल गेहूं निकलता था, मगर इस बार आठ कुंतल ही गेहूं निकल सका। लागत भी नहीं निकल सकी। निरभान सिंह ने बताया कि उनकी छह एकड़ भूमि में सिर्फ दो बोरा गेहूं निकला है। जबकि हर साल कम से कम सत्तर बोरे गेहूं निकल आते थे। इसी तरह रामकिशुन ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि वह दस एकड़ जमीन का कास्तकार है और मात्र नौ कुंतल गेहूं उसके खेतों में इस बार हो सका है। कर्जा लेकर फसल की बुआई की थी। इस गेहूं को बेचकर वह कर्जा भी नहीं चुका सकेगा। शिवदयाल ने बताया कि इस साल उसके घर में शादी है। फसल चौपट होने के कारण कर्जा लेकर अब शादी करनी पड़ेगी। 

बोर में गवाएं हजारों रुपये 
सूखे की मार झेल रहे कई किसानों ने पाताल (बोर कराके) को खोदकर पानी निकलाने का प्रयास किया, मगर असफलता हाथ लगी। बोर असफल होने से किसानों के हजारों रुपये डूब गए। बंडा गांव के रामधुन ने चार सौ फीट गहरा बोर कराया कि पानी निकल आया तो फिर से खेती होने लगेगी। मगर चार सौ फीट पर सिर्फ धूल ही बाहर निकली। इस बोरिंग में उसके साठ हजार रुपये भी धूल में चले गए। इसी तरह थान सिंह ने अलग-अलग तीन बोर कराए, मगर तीनों फेल हो गए। खचोरे, वान सिंह व रमेश ने भी डेढ़ सौ फीट गहरे बोर कराएं, मगर पानी की एक बूंद बाहर नहीं आई। 


सूखे का सूरत-ए-हाल-दूसरी तस्वीर

(ललितपुर से अमर उजाला संवाददाता की रिपोर्ट) वातानुकूलित कमरों में बैठकर व मिनरल वाटर से गला तर करके पेयजल संकट से निपटने की योजनाएं बनाने वाले अधिकारियों का ललितपुर जिला मुख्यालय से 50 किमी दूर बसे मुड़ारी गांव का दौरा करने से हकीकत से सामना हो सकता है। गांव के हालात इतने खराब हैं कि लोगों को पानी की व्यवस्था करने के लिए आधी रात से ही प्रयास करने पड़ते हैं, ताकि कड़ी धूप में एक-डेढ़ किमी दूर से पानी लाने से बचा जा सके। गांव में लगे 10 में से छह हैंडपंप खराब हैं। 

पाली तहसील के ग्राम मुड़ारी की विडंबना देखिए कि गांव के एक किनारे से नारायणी नदी और थोड़ी दूर सौंर नदी का बहाव है, लेकिन सूखे के कारण नदियों में पानी नहीं है। ऐसे में 300 मीटर ऊंची पहाड़ी पर बसे ग्राम मुड़ारी की महिलाओं को पानी के लिए एक से डेढ़ किमी तक का सफर करना पड़ता है। गांव में दस हैंडपंप लगे हैं, जिनमें से केवल चार हैंडपंप ही काम कर रहे हैं। लेकिन, इन हैंडपंपों से पानी लेना कड़े संघर्ष से कम नहीं है। एक बाल्टी देने के बाद आधा घंटे का इंतजार करना पड़ता है। इन हालतों से समझ सकते हैं कि पूरे परिवार के लिए पानी लेने के लिए कितना समय लगता होगा। गांव की महिलाएं पानी लेने के लिए आधी रात से जाग जाती हैं, ताकि कड़ी धूप में पानी के लिए परेशान नहीं होना पड़े। पिछले एक महीने से गांव में किसी भी घर के सभी सदस्य नहीं सो पाए हैं, क्योंकि पानी भरने के लिए एक न एक सदस्य जागता रहता है। गांव के कुओं में पानी बचा नहीं है, पहाड़ी पर होने के कारण ज्यादा पानी की संभावना भी नहीं है। 

गांव वालों का आरोप है कि जिन हैंडपंपों में पानी आ रहा है, उनके बोर होते समय विभाग से ज्यादा गहराई करने की मांग की गई थी, लेकिन विभागीय कर्मियों ने एक न सुनी। अप्रैल की शुरुआत में पानी के भयंकर संकट को झेल रहे ग्रामवासियों को मई व जून की चिंता सता रही है। अगर प्रशासन की ओर से जल्द कदम नहीं उठाए गए तो सूखे की चपेट से गांव वालों की स्थिति बदतर हो सकती है। 

गांव के पूर्व प्रधान की बेटी सुनीता बताती है कि वर्तमान में मनरेगा से कुंआ खोदने का काम चल रहा है, लेकिन मजदूरों को पानी नहीं मिलने के कारण उन्होंने काम पर आना छोड़ दिया था। इस कारण गांव वालों ने मिलकर एक हैंडपंप को दिन भर मजदूरों के लिए आरक्षित कर दिया है। इस हैंडपंप से केवल दिन में मजदूर ही पानी पीते हैं, क्योंकि एक बार बाल्टी भरने के बाद एक घंटे से ज्यादा समय का इंतजार दोबारा पानी भरने के लिए करना पड़ता है।ा प्रशासन के अधिकारियों को एक बार गांव का दौरा कर स्थिति का निरीक्षण करना चाहिए।

सूखे का सूरत-ए-हाल-तीसरी तस्वीर

(जालौन से संदीप कुमार दुबे की रिपोर्ट) जालौन जिले के कदौरा इलाके में दैवीय आपदा और सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड में आग ने तबाही मचा रखी है। ऐसे में पीने तक के पानी को मोहताजलोगों को अब आग बुझाने को भी पानी नहीं मिल रहा। कदौरा के सिद्धार्थनगर में शुक्रवार देर रात यही स्थिति हो गई। यहां एक घर में लगी आग पानी न मिलने से बुझाई नहीं जा सकी और फिर दूसरा घर भी चपेट में आ गया। दोनों घरों का सारा सामान जलकर राख हो गया। मोहल्ले के सभी छह हैंडपंपों के खराब होने और छह महीने से पीने तक के पानी को मोहताज बेबस लोग सामने घर जलते देखते रहे और कुछ न कर सके। उधर, दमकल विभाग को भी फोन किया पर समय पर विभागीय गाड़ी के न पहुंचने से नुकसान नहीं रोका जा सका। 

कस्बा कदौरा के मोहल्ला सिद्धार्थ नगर निवासी रजिया खातून पत्नी कुदरत शाह के कच्चे मकान में शुक्रवार की रात 12 बजे आग लग गई। इससे मोहल्ले में अफरातफरी मच गई। मोहल्ले के लोगों ने घरों में पीने के लिए रखे पानी से आग बुझाने का प्रयास किया लेकिन कुछ बाल्टी पानी से आग कहां बुझने वाली थी। लोग पानी के इंतजाम के लिए भागते रहे और आग बढ़ती गई। मोहल्ले में पानी उपलब्ध न होने से आग बढ़ती गई और पड़ोस के बाबू खां के कच्चे मकान को भी चपेट में ले लिया। इससे दोनों मकानों में रखे गृहस्थी के सामान, कपडे़, बर्तन, गेहूं, जेवर नकदी आदि सामान जलकर राख हो गया। मोहल्ले के सभी हैंडपंप खराब होने और पानी का कोई और इंतजाम नहीं होने से लोग अपने घर जलते देखते रहे और कुछ नहीं कर सके।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें