वैज्ञानिकों का कहना है कि नए वर्ष से कोरोना जांच के साथ मरीज के शरीर में वायरल लोड यानी शरीर में वायरस की मात्रा का भी पता लगाया जाए तो महामारी से लड़ाई आसान होगी। डॉक्टर प्राथमिकता से ऐसे मरीजों पर विशेष ध्यान दे सकेंगे और उन्हें मौत के मुंह में जाने के बचाया जा सकेगा।
न्यूयॉर्क स्थित कोलंबिया यूनिवर्सिटी के संक्रामक रोग विभाग के डॉ. डेनियल ग्रिफिन बताते हैं कि जिन मरीजों में वायरल लोड अधिक होता है उनकी सेहत को बहुत नुकसान होता है। ये कई अध्धयनों में स्पष्ट हो चुका है।
ऐसे में सबसे बेहतर तरीका है कि संदिग्ध या लक्षण वाला मरीज जब जांच के लिए पहुंचता है तो उसकी आरटी-पीसीआर के साथ वायरल लोड जांच भी कराई जाए। इसका फायदा ये होगा कि जिस मरीज में वायरल लोड अधिक होगा। उस मरीज पर चिकित्सक अधिक ध्यान देंगे।
गंभीर रूप से संक्रमित पर दिया जा सकेगा विशेष ध्यान
दो हिस्सों में बंट जाएंगे रोगी.... डॉ. ग्रिफिन बताते हैं कि कोरोना जांच के साथ वायरल लोड जांच होती है तो चिकित्सक मरीज को दो भाग में बांट सकते हैं। अधिक वायरल लोड वाले मरीजों को ऑक्सीजन और आईसीयू सपोर्ट वाले वार्ड में रखा जा सकता है। कम वायरल लोड वालों को जनरल वार्ड में इलाज संभव है। कोरोना के अधिकतर मरीजों को गंभीर संक्रमण नहीं होता है। ऐसे में कम वायरल लोड को जानकारी होने पर मानसिक तनाव भी हावी नहीं होगा।
मौत का खतरा किसे पता चल जाएगा... हार्वर्ड टीएच चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के महामारी मीना का कहना है कि वायरल लोड जांच से वायरस से लड़ाई आसानी होगी। इसके जरिए डॉक्टर इसका भी अंदाजा लगा सकते हैं कि किस मरीज की जान को खतरा अधिक है, या कितने समय में उसकी मौत हो सकती है। इस आधार पर अलग-अलग तरह की दवाओं के जरिए मरीज के शरीर में वायरस को मारा जा सकता है।