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उत्तराखंड : अमृत यात्रा के साथ गंगामृत का प्रदेश, बदलावों की साक्षी बनी भगवान की भूमि

संजय अभिज्ञान
Updated Sun, 19 Dec 2021 06:43 AM IST

सार

आजादी मिलने के समय देश अगर पिछड़ा हुआ था तो पहाड़ पिछड़ों में भी पिछड़ा था। पौड़ी गढ़वाल जैसे स्थानों का हाल यह था कि देश को आजादी मिलने की खबर एक दिन बाद वहां पहुंची थी। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में गोरखाओं और अंग्रेजों से लड़ाई लड़ने वाले पहाड़ी जनमानस ने आजादी के बाद भी खुद को हाशिए पर ही पाया। यूपी के आठ सीमांत जिलों में समेट दिए गए वजूद को सरकारी झुनझुनों से मन बहलाना पड़ा।
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चारधाम यात्रा - फोटो : अमर उजाला

हिमालय के इतिहास में 75 वर्ष का महत्व उतना ही है, जितना गंगा की अनंत धारा से उठाए गए एक अंजुलि भर जल का। लेकिन जैसे घट में ब्रह्मांड का दर्शन संभव है, वैसे ही यह नन्हा कालखंड हमें उत्तराखंड ही नहीं, पूरे भारत के बदलाव की झांकी दिखा सकता है। सबसे पहले बात विकास की। आजादी मिलने के समय अगर देश पिछड़ा हुआ था तो पहाड़ पिछड़ों में भी पिछड़ा था। पौड़ी गढ़वाल जैसे स्थानों का हाल यह था कि देश को आजादी मिलने का समाचार एक दिन बाद पहुंचा था। 

मैदान में छपे अखबार को पहाड़ के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंचने में 24 से 48 घंटे लगते थे। तराई और भांबर खत्म होते ही सड़कें पगडंडियों में तब्दील हो जाती थीं। टेलीफोन सिर्फ किस्सों का हिस्सा था और रेलगाड़ी के दर्शन के लिए बच्चों को जवान होने का इंतजार करना पड़ता था। राष्ट्रीय चेतना में भी हिमालय का यह हिस्सा चार धाम की आध्यात्मिक पहचान से आगे नहीं बढ़ता था। पर्वतीय जीवन लगातार अतिवृष्टि, भूस्खलन, भूकंप और बाढ़ की चुनौती से जूझता था। लेकिन अगले 75 साल में नजारा काफी कुछ बदल जाना था। 



जिस तरह शेष भारत सपेरों के देश वाली पुरानी संकीर्ण पहचान बदलकर भाखड़ा नांगल और पोकरण वाली नई छवि गढ़ने के लिए कमर कस रहा था, उसी तरह उत्तर प्रदेश का यह पर्वतीय भूभाग भी नए टेक्नोक्रेट अवतार की ओर बढ़ रहा था। उसे आगे चलकर आईआईटी रुड़की, ओएनजीसी, आईआईएम काशीपुर, एम्स ऋषिकेश और एशिया के सबसे ऊंचे बांधों में एक टिहरी प्रोजेक्ट की मेजबानी करनी थी। तस्वीरें बदलीं और वाकई गंगोत्री-जमनोत्री और बद्री-केदार का प्रदेश आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के साथ कदमताल करने लगा। 

धर्म के समांतर विज्ञान अंगड़ाई लेने लगा। आदिबद्री, भविष्य बद्री, ध्यान बद्री, योगबद्री और बद्री विशाल वाला पंचबद्री का प्रांत आईडीपीएल, भेल, ओएनजीसी और आईजीएल को रास्ता देने लगा। रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, देवप्रयाग, विष्णुप्रयाग और नंदप्रयाग जैसे पंचसंगम के समांतर सेंट जार्ज, दून स्कूल, शेरवुड और वेलहम जैसे एजुकेशन ब्रांड चर्चित होने लगे। केदारनाथ, कल्पेश्वर, मद्महेश्वर, रुद्रनाथ, तुंगनाथ नाम के पंचकेदारों की देवभूमि पर भारतीय वन संस्थान (एफआरआई, दून), पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय, आर्यभट्ट अनुसंधान संस्थान (एरीज, नैनीताल), भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए, दून), भारतीय वन्य जीव संस्थान (डब्ल्यूडब्ल्यूआई, दून), नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम, उत्तरकाशी), लालबहादुर शास्त्री आईएएस अकादमी, मसूरी और वाडिया इंस्टीट्यूट, दून जैसे अनुसंधान और प्रशिक्षण के नए तीर्थ उभर आए।

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चारधाम यात्रा - फोटो : अमर उजाला
हिमालय के इतिहास में 75 वर्ष का महत्व उतना ही है, जितना गंगा की अनंत धारा से उठाए गए एक अंजुलि भर जल का। लेकिन जैसे घट में ब्रह्मांड का दर्शन संभव है, वैसे ही यह नन्हा कालखंड हमें उत्तराखंड ही नहीं, पूरे भारत के बदलाव की झांकी दिखा सकता है। सबसे पहले बात विकास की। आजादी मिलने के समय अगर देश पिछड़ा हुआ था तो पहाड़ पिछड़ों में भी पिछड़ा था। पौड़ी गढ़वाल जैसे स्थानों का हाल यह था कि देश को आजादी मिलने का समाचार एक दिन बाद पहुंचा था। 

मैदान में छपे अखबार को पहाड़ के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंचने में 24 से 48 घंटे लगते थे। तराई और भांबर खत्म होते ही सड़कें पगडंडियों में तब्दील हो जाती थीं। टेलीफोन सिर्फ किस्सों का हिस्सा था और रेलगाड़ी के दर्शन के लिए बच्चों को जवान होने का इंतजार करना पड़ता था। राष्ट्रीय चेतना में भी हिमालय का यह हिस्सा चार धाम की आध्यात्मिक पहचान से आगे नहीं बढ़ता था। पर्वतीय जीवन लगातार अतिवृष्टि, भूस्खलन, भूकंप और बाढ़ की चुनौती से जूझता था। लेकिन अगले 75 साल में नजारा काफी कुछ बदल जाना था। 

जिस तरह शेष भारत सपेरों के देश वाली पुरानी संकीर्ण पहचान बदलकर भाखड़ा नांगल और पोकरण वाली नई छवि गढ़ने के लिए कमर कस रहा था, उसी तरह उत्तर प्रदेश का यह पर्वतीय भूभाग भी नए टेक्नोक्रेट अवतार की ओर बढ़ रहा था। उसे आगे चलकर आईआईटी रुड़की, ओएनजीसी, आईआईएम काशीपुर, एम्स ऋषिकेश और एशिया के सबसे ऊंचे बांधों में एक टिहरी प्रोजेक्ट की मेजबानी करनी थी। तस्वीरें बदलीं और वाकई गंगोत्री-जमनोत्री और बद्री-केदार का प्रदेश आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के साथ कदमताल करने लगा। 

धर्म के समांतर विज्ञान अंगड़ाई लेने लगा। आदिबद्री, भविष्य बद्री, ध्यान बद्री, योगबद्री और बद्री विशाल वाला पंचबद्री का प्रांत आईडीपीएल, भेल, ओएनजीसी और आईजीएल को रास्ता देने लगा। रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, देवप्रयाग, विष्णुप्रयाग और नंदप्रयाग जैसे पंचसंगम के समांतर सेंट जार्ज, दून स्कूल, शेरवुड और वेलहम जैसे एजुकेशन ब्रांड चर्चित होने लगे। केदारनाथ, कल्पेश्वर, मद्महेश्वर, रुद्रनाथ, तुंगनाथ नाम के पंचकेदारों की देवभूमि पर भारतीय वन संस्थान (एफआरआई, दून), पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय, आर्यभट्ट अनुसंधान संस्थान (एरीज, नैनीताल), भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए, दून), भारतीय वन्य जीव संस्थान (डब्ल्यूडब्ल्यूआई, दून), नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम, उत्तरकाशी), लालबहादुर शास्त्री आईएएस अकादमी, मसूरी और वाडिया इंस्टीट्यूट, दून जैसे अनुसंधान और प्रशिक्षण के नए तीर्थ उभर आए।

तत्कालीन यूपी के इन पहाड़ों को यह आधुनिक रंग-ढंग बिना संघर्ष के नहीं मिला। यूपी के आठ सीमांत जिलों में समेट दिए गए उसके वजूद को 1968 तक पर्वतीय विकास परिषद जैसे झुनझुनों से मन बहलाना पड़ा। उस साल हालांकि परिषद को एक अलग बजट वाले मंत्रालय का रूप दे दिया गया लेकिन तब भी उत्तरप्रदेश के विराट बरगद के नीचे पहाड़ की हितचिंता पनप नहीं पाई। कसमसाहट और वंचना की इस पृष्ठभूमि पर अलग राज्य के आंदोलन ने रफ्तार पकड़ी और मसूरी, खटीमा और रामपुर तिराहे जैसे शहादत के गहरे जख्म खाने के बाद अंततः नवंबर 2000 में यानी आजादी के लगभग 53 साल बाद, पहाड़ को अलग राज्य और अस्थायी राजधानी देहरादून के रूप मे एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान नसीब हुई।

आंदोलनधर्मी पर्वतीय जनमानस मूलतः स्वतंत्र रहा है। पर्यावरण रक्षा, महिला स्वातंत्र्य और शराबबंदी जैसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय आंदोलनों की सबसे सच्ची आवाजें उत्तराखंड से उठीं। गौरादेवी, टिंचरी माई, चंडीप्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा जैसे नाम इसी भूमि से उपजकर विश्वभर में विख्यात हुए। आज मोनाल, कस्तूरी हिरन, बुरांश और ब्रह्मकमल जैसे राज्य प्रतीक पूज्य बने हुए हैं। वृक्षों-पादपों से आलिंगन का यही चिपको भाव जिम कार्बेट या राजाजी जैसे अभय वनों के रूप में बाघ, गजराज और दूसरे जीवों को स्वतंत्र अस्तित्व का अवकाश देता है। 

आज अगर राज्य में नंदादेवी बायोस्फीयर और फूलों की घाटी जैसे यूनेस्को विरासत स्थल हैं और आज अगर गंगा और हिमालय को जीवित प्राणी वाला वैधानिक दर्जा है तो इसके मूल में उत्तराखंड से उपजी पर्यावरण चिंता ही है।  साथ ही सुमित्रानंदन पंत, इलाचंद्र जोशी, शिवानी जैसे क्लासिक रचनाकारों से लेकर वीरेंद्र डंगवाल, मंगलेश डबराल, रस्किन बांड या लीलाधर जगूड़ी तक अनेक नाम हैं जिन्होंने पहाड़ से लेकर मैदान तक साहित्यिक चेतना की मशाल जलाए रखी। खेलों में जसपाल राणा, बछेंद्री पाल, मीर रंजन नेगी से लेकर ऋषभ पंत और वंदना कटारिया तक कई नाम चर्चित रहे।

मनोरंजन जगत में अर्चना पूरणसिंह, हिमानी शिवपुरी, प्रसून जोशी से लेकर नई पीढ़ी के जुबिन नौटियाल-नेहा कक्कड़ जैसे कई नाम तो हैं ही, विक्टर बनर्जी, विशाल भारद्वाज और टॉम ऑल्टर जैसे अनेक कलाकारों ने तो यहां की सुरम्य पहाड़ियों में अपना घर ही बना लिया। मगर जिस एक पहलू का उल्लेख तीन चौथाई सदी के उत्तराखंडी अतीत में खासतौर पर रेखांकित होना चाहिए, वह है सैन्य संस्थाओं के प्रति उत्तराखंडियों का लगाव और समर्पण। जनरल विपिन रावत के रूप में देश को उसका पहला चीफ आफ डिफेंस स्टाफ देने वाले इस छोटे से राज्य ने एक से बढ़कर एक जनरल-कमांडर भारतीय सेना को दिए। आईएमए और आरआईएमसी जैसे संस्थानों के बाद उत्तराखंड का पांचवां धाम...सैन्य धाम आने वाले वर्षों में राज्य का एक नया टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनकर उभरने वाला है।

 उत्तराखंड एक सवाल पिछले दो दशक से अपने आप से पूछ रहा है। अलग राज्य से पहाड़ को क्या फायदा हुआ? वन, पर्यावरण का क्षरण रुक नहीं रहा है। देहरादून अस्थायी राजधानी का बोझ अपने कंधों पर नहीं उठा पाया और नगर नर्क में तब्दील हो गया। बंद होते स्कूल और खाली होते गांव राज्य को शर्मिंदा करने लगे हैं। रिस्पना, बिंदाल, तमसा, गौला, गगास और कोसी जैसी नदियां अब नालों सरीखी हैं। कहने को राज्य का बजट इक्कीस साल में एक हजार करोड़ से बढ़कर 57 हजार करोड़ हो गया है। 

आबादी भी 2011 के एक करोड़ के आंकड़े में दसेक लाख अधिक का स्तर छू चुकी है लेकिन अर्थव्यवस्था और इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रभावित नहीं करते। ऊधमसिंह नगर में काशीपुर, रुद्रपुर में तराई के सिखों के प्रभाव वाली उद्यमिता से कुछ व्यावसायिक खुशहाली दिखने लगी है, लेकिन सितारगंज-खटीमा, किच्छा के उद्योग सेंटर अब निस्तेज हो रहे हैं। उद्योग-व्यापार में ठंडापन और नतीजतन रोजगार सृजन में कमी प्रदेश की सबसे दुखती रग है। कड़वा सच यह है कि ढाई हजार गांव सड़क नेटवर्क से जुड़ नहीं पाए हैं। हजारों गांवों में कनेक्टिविटी न होने से मोबाइल काम नहीं करते।

बीमारों को अस्पताल पहुंचाने के लिए डंडी-कंडी और बच्चों को स्कूल पहुंचाने के लिए रस्सीपुल की मोहताज इन गांवों की आबादी का दर्द तब कई गुना बढ़ जाता है जब आपदा उनके ठिकानों को तहसनहस कर देती है। उत्तरकाशी भूकंप, केदारनाथ आपदा या हाल की चमोली आपदा जैसे बड़े हादसे तो भारत के संज्ञान में आ भी जाते हैं लेकिन आपदा जैसे दुर्गम क्षेत्रों की जीवनशैली ही बन चुकी है। उम्मीदें मगर कायम हैं। उत्तराखंड की आंदोलनधर्मिता, उसकी प्रश्नाकुलता एक दिन इन विरोधाभासों को मिथक साबित कर ही देगी क्योंकि अन्वेषण इस भूमि का सदियों पुराना संस्कार है। 

हिमालय प्रेमी आशा करते हैं कि देश और दुनिया, अतीत की तरह भविष्य में भी अपने प्रश्नों के समाधान के लिए उत्तराखंड को देखते रहेंगे। उत्तराखंड एक सवाल पिछले दो दशक से लगातार अपने आप से पूछ रहा है। अलग राज्य बनने से पहाड़ को क्या फायदा हुआ? यह एक हद तक उदास करने वाला प्रश्न है। इक्कीस साल के राजनीतिक-सामाजिक अनुभव मोहभंग जैसी तस्वीर उकेर रहे हैं।

पहाड़ में अपनों से बात करने की राह आसान
  • वर्ष 2001 : प्रदेश में 6102 पीसीओ थे। 2,61,930 लैंडलाइन फोन थे।
  • 2004-05 : लैंडलाइन फोन 3,89,929 हुए। मोबाइल फोन की संख्या 1,31,825 पर पहुंच गई।
  • वर्ष 2018 : एक लाख तीन हजार लैंडलाइन, जबकि 13 लाख 59 हजार 534 पर पहुंचे मोबाइल।

दुर्गम में चुनौती बरकरार
  • धारचूला सहित कई दुर्गम क्षेत्रों के बाशिंदों के लिए मोबाइल आज भी अनुपयोगी यंत्र है। बच्चों को ऑन लाइन क्लास के लिए कनेक्टिविटी की खातिर कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।
  • 101 लाख जनसंख्या आंकी गई 2011 की जनगणना में 1941 में 25 लाख थी। 85 लाख साल 2001 में आंकी गई।

जनसंख्या घनत्व (प्रति वर्ग किलोमीटर)
  • 47 वर्ष 1941 में
  • 189 साल 2011 में

सेहत का मोर्चा : बुनियादी ढांचा बढ़ा...सिस्टम में आया सुधार
  • राज्य गठन के समय शिशु मृत्यु दर 48 (प्रति एक हजार जन्म पर) थी। जो अब घट कर 31 हो गई है।
  • स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे का विस्तार और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का आकार बढ़ा। दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों तक टेलीमेडिसिन के जरिये स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचीं।
तीन नए मेडिकल कालेज प्रस्तावित
  • पहले : एक भी मेडिकल कालेज नहीं था।
  • अब : दून, श्रीनगर, हल्द्वानी राजकीय मेडिकल कालेज चल रहे हैं। अल्मोड़ा मेडिकल कालेज इसी सत्र से। हरिद्वार, पिथौरागढ़, रुद्रपुर में प्रस्तावित।
पांच लाख का मुफ्त इलाज देने वाला देश का पहला राज्य
  • केंद्र की अटल आयुष्मान योजना के तहत राज्य सरकार ने 23 लाख परिवारों को पांच लाख तक मुफ्त इलाज की सुविधा दी है।
  • 3.29 लाख मरीजों को मुफ्त इलाज की सुविधा मिली है। जिसमें 438 करोड़ की राशि सरकार ने खर्च की है।
चुनौतियां भी
  • 1147 विशेषज्ञ डॉक्टरों के पदों पर वर्तमान में 493 ही कार्यरत हैं। जबकि 654 विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली हैं। बालरोग विशेषज्ञों का भी भयानक अकाल।
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