हिमालय के इतिहास में 75 वर्ष का महत्व उतना ही है, जितना गंगा की अनंत धारा से उठाए गए एक अंजुलि भर जल का। लेकिन जैसे घट में ब्रह्मांड का दर्शन संभव है, वैसे ही यह नन्हा कालखंड हमें उत्तराखंड ही नहीं, पूरे भारत के बदलाव की झांकी दिखा सकता है। सबसे पहले बात विकास की। आजादी मिलने के समय अगर देश पिछड़ा हुआ था तो पहाड़ पिछड़ों में भी पिछड़ा था। पौड़ी गढ़वाल जैसे स्थानों का हाल यह था कि देश को आजादी मिलने का समाचार एक दिन बाद पहुंचा था।
मैदान में छपे अखबार को पहाड़ के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंचने में 24 से 48 घंटे लगते थे। तराई और भांबर खत्म होते ही सड़कें पगडंडियों में तब्दील हो जाती थीं। टेलीफोन सिर्फ किस्सों का हिस्सा था और रेलगाड़ी के दर्शन के लिए बच्चों को जवान होने का इंतजार करना पड़ता था। राष्ट्रीय चेतना में भी हिमालय का यह हिस्सा चार धाम की आध्यात्मिक पहचान से आगे नहीं बढ़ता था। पर्वतीय जीवन लगातार अतिवृष्टि, भूस्खलन, भूकंप और बाढ़ की चुनौती से जूझता था। लेकिन अगले 75 साल में नजारा काफी कुछ बदल जाना था।
जिस तरह शेष भारत सपेरों के देश वाली पुरानी संकीर्ण पहचान बदलकर भाखड़ा नांगल और पोकरण वाली नई छवि गढ़ने के लिए कमर कस रहा था, उसी तरह उत्तर प्रदेश का यह पर्वतीय भूभाग भी नए टेक्नोक्रेट अवतार की ओर बढ़ रहा था। उसे आगे चलकर आईआईटी रुड़की, ओएनजीसी, आईआईएम काशीपुर, एम्स ऋषिकेश और एशिया के सबसे ऊंचे बांधों में एक टिहरी प्रोजेक्ट की मेजबानी करनी थी। तस्वीरें बदलीं और वाकई गंगोत्री-जमनोत्री और बद्री-केदार का प्रदेश आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के साथ कदमताल करने लगा।
धर्म के समांतर विज्ञान अंगड़ाई लेने लगा। आदिबद्री, भविष्य बद्री, ध्यान बद्री, योगबद्री और बद्री विशाल वाला पंचबद्री का प्रांत आईडीपीएल, भेल, ओएनजीसी और आईजीएल को रास्ता देने लगा। रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, देवप्रयाग, विष्णुप्रयाग और नंदप्रयाग जैसे पंचसंगम के समांतर सेंट जार्ज, दून स्कूल, शेरवुड और वेलहम जैसे एजुकेशन ब्रांड चर्चित होने लगे। केदारनाथ, कल्पेश्वर, मद्महेश्वर, रुद्रनाथ, तुंगनाथ नाम के पंचकेदारों की देवभूमि पर भारतीय वन संस्थान (एफआरआई, दून), पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय, आर्यभट्ट अनुसंधान संस्थान (एरीज, नैनीताल), भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए, दून), भारतीय वन्य जीव संस्थान (डब्ल्यूडब्ल्यूआई, दून), नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम, उत्तरकाशी), लालबहादुर शास्त्री आईएएस अकादमी, मसूरी और वाडिया इंस्टीट्यूट, दून जैसे अनुसंधान और प्रशिक्षण के नए तीर्थ उभर आए।