पीएम मोदी, अमित शाह, सीएम योगी और जेपी नड्डा
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस बार भाजपा ने सहयोगियों केलिए अपना दिल बड़ा किया है। दिल बड़ा करने के पीछे भाजपा की बड़ी योजना है। पार्टी अपने दोनों सहयोगियों अपना दल और निषाद पार्टी के जरिये न सिर्फ विपक्ष के ओबीसी विरोधी होने के आरोपों की हवा निकालना चाहती है, बल्कि इनके जरिये एंटीइन्कम्बेंसी (सत्ता विरोधी फैक्टर) की तपिश को भी कम करना चाहती है।
इस चुनाव में भाजपा दोनों सहयोगियों को अपनी जीती हुई ऐसी आधी दर्जन से भी अधिक सीटें देगी, जहां सिटिंग विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर गहरी नाराजगी है। इनमें अपना दल के हिस्से कम से कम पांच और निषाद पार्टी केहिस्से कम से कम दो ऐसी सीटें आएंगी। इनमें प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र की सीटें भी शामिल हैं। भाजपा सूत्रों का कहना है कि खासतौर से अपना दल ऐसी सीटों के जातीय समीकरण के कारण माहौल को अपने पक्ष में करने की क्षमता रखती है। इनमें चायल, कुशीनगर, कायमगंज, पिंडरा, घाटमपुर सहित कई सीटों की चर्चा है।
अनुप्रिया को ट्रंप कार्ड मानती है भाजपा
इस चुनाव में भाजपा अपना दल की अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल को ट्रंप कार्ड मान रही है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि विगत कुछ वर्षों में पिछड़ा वर्ग में उनकी पैठ बढ़ी है। उनकी आक्रामक भाषा शैली और खासतौर पर सामाजिक न्याय से जुड़े विषयों पर उनकी मुखरता भाजपा पर ओबीसी विरोधी होने के विपक्ष के आरोपों की धार कुंद कर सकती है। इसी के मद्देनजर अनुप्रिया का पूरे प्रदेश में कार्यक्रम कराने का फैसला किया गया है।
सामाजिक न्याय पर लगातार रही हैं मुखर
आठ साल पर संसदीय राजनीति की शुरुआत करने वाली अनुप्रिया सामाजिक न्याय के मुद्दों पर मुखर नजर आती रही हैं। नीट में ओबीसी आरक्षण, उत्तर प्रदेश में 69000 शिक्षक भर्ती में आरक्षण नियमों की अनदेखी, नवोदय, सैनिक और केंद्रीय विद्यालयों में छात्रों को ओबीसी आरक्षण का लाभ मामले में वह संसद और विभिन्न बैठकों में मुखर रही। नीट मामले में उन्होंने सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले विपक्ष पर भी लगातार तीखा हमला करती रही हैं।
इसलिए बदलेगी सीट
- भाजपा की अपनी रिपोर्ट में आधे से अधिक विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर गहरी नाराजगी का जिक्र है। पार्टी ने लोगों की नाराजगी कम करने के लिए पहली सूची में 20 विधायकों के टिकट काटे थे। विधायकों की ओर से बड़ा विरोध न हो, इससे बचने के लिए पार्टी ने कम से कम बीस प्रतिशत टिकट काटने, कुछ विधायकों की सीटें बदलने और कुछ सीटें सहयोगियों को देने की रणनीति बनाई है।
- सहयोगियों को सीटें मिलने से नया चेहरा सामने होगा। इससे विधायक के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी से सियासी नुकसान नहीं होगा।
अपना दल को विस्तार का मिला मौका
- विधानसभा चुनाव ने अपना दल को संगठन विस्तार का भी बड़ा अवसर प्रदान किया है। पार्टी अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों के इतर दूसरे क्षेत्रों में भी सीट हासिल करने में कामयाब रही हैं।
- इनमें सबसे अधिक चर्चा रामपुर के स्वार सीट की है। पार्टी को इस बार झांसी, लखनऊ, कानपुर, चित्रकूट जिले मेंं भी सीट मिल सकती है।
निषाद पार्टी में भाजपा खपाएगी अपने उम्मीदवार
- भाजपा सूत्रों का कहना है कि निषाद पार्टी को दस से बारह सीटें दी जा सकती हैं। इनमें भाजपा के कई नेता निषाद पार्टी से चुनाव लड़ेंगे। भाजपा ने बिहार में वीआईपी के साथ भी यही फार्मूला अपनाया था। इस क्रम में भाजपा ने अपने कई उम्मीदवार तय भी कर लिए हैं।