अमूमन सरकारी स्कूलों और कॉलेज की पढ़ाई हिंदी में होती है। जबकि सिविल सेवा में आईआईटी व एमबीए के टॉप संस्थानों के छात्र भी आते हैं। जाहिर तौर पर मुकाबला असमान स्तर पर होता है। इसका असर परिणाम में दिखता है। कोचिंग संस्थान सालों पुराने मैटेरियल का इस्तेमाल करते हैं। 1200-1200 तक का इनका एक बैच होता है। ऐसे में छात्रों की पढ़ाई गुणवत्तापूर्ण नहीं हो पाती। कोचिंग में बताया जाता है कि किताब की जगह संस्थान के नोट्स पढ़ो। इससे जानकारी का स्तर एक दायरे में सिमट जाता है। जबकि यूपीएसएस की परीक्षा का दायरा असीमित होता है।
- 2014 में हिंदी माध्यम के प्रतिभागियों में सबसे ज्यादा स्कोर करने वाले की रैंक 13 थी।
- 2015 में यह आंकड़ा 61 था।
- 2016 में टॉप 50 में हिंदी माध्यम से तीन परीक्षार्थी मेरिट लिस्ट में जगह बनाने में कामयाब हुए।
- 2017 हिंदी माध्यम से सबसे ज्यादा स्कोर करने वाले की रैंकिंग 146 थी।
विशेषज्ञों की राय
अभिव्यक्ति आईएएस के डायरेक्टर सुनील अभिव्यक्ति का कहना है कि हिंदी के प्रतिभागियों की अनेकों चुनौतियां हैं।
- हिंदी के दुर्लभ शब्दों के बीच से बाहर निकल पाना प्रतिभागियों के लिए आसान नहीं।
- हिंदी के प्रतिभागियों का मुकाबला ऐसे अभ्यर्थियों से होता है, जिसने टॉप 20 कॉलेज व यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है।
- प्रतिभागी सिविल सेवा में चयनित होने के लिए कोचिंग संस्थानों का सहारा लेते हैं, लेकिन इनके भी शिक्षक लीक से नहीं हटते।
- वह पढ़ाई सिविल सेवा के पाठ्यक्रम के इर्द-गिर्द करवाते हैं। जबकि परीक्षा में सवाल कई बार बाहर से आते हैं।
- रैंकिंग सुधारने लिए करीब 50 फीसदी प्रतिभागी होते पूर्व चयनित, नए प्रतिभागियों की बढ़ती दिक्कत।
- कोचिंग खत्म करके घर पर तैयारी करने वाले छात्र नहीं हो पाते अपडेट।
- कई कोचिंग के 500 से अधिक के एक बैच में हर प्रतिभागी पर शिक्षक का नहीं रहता ध्यान जबकि इस परीक्षा के लिए एक-एक उम्मीदवार को तराशने की आवश्यकता होती है।