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सियासत: क्या जयंत चौधरी को मिलेगी जनता की सहानुभूति, राजीव गांधी-उद्धव ठाकरे की तरह बदलेगी किस्मत?

Sun, 30 Jan 2022 07:33 PM IST
अमित शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ताजा मसला पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत का है, जहां जाटों का वोट बैंक किसी भी राजनीतिक दल के समीकरण को बिगाड़ने की ताकत रखता है। इस जाट वोट बैंक पर रालोद की पकड़ मजबूत मानी जाती है, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के हाथ से यह सिरा फिसल गया था।
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रालोद मुखिया जयंत चौधरी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भारत की राजनीति में मसलों से ज्यादा भावनाएं हावी रहती हैं। देश में कई चुनाव ऐसे हो चुके हैं, जिनके नतीजे भावनाओं की लहर पर सवार होकर आए। चाहे 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी की प्रचंड जीत हो या महाराष्ट्र में बाल ठाकरे के निधन के बाद उद्धव ठाकरे का मुख्यमंत्री बनना। इनके अलावा जगनमोहन रेड्डी और एमके स्टालिन जैसे दिग्गज नेताओं के उदाहरण भी मौजूद हैं।

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ताजा मसला पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत का है, जहां जाटों का वोट बैंक किसी भी राजनीतिक दल के समीकरण को बिगाड़ने की ताकत रखता है। इस जाट वोट बैंक पर रालोद की पकड़ मजबूत मानी जाती है, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के हाथ से यह सिरा फिसल गया था। अब दौर 2022 विधानसभा चुनाव का है।

ऐसे में अटकलें लग रही हैं कि अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी से गठबंधन करने वाले रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी को भी सहानुभूति का फायदा मिल सकता है। दरअसल, जाटों के बड़े नेता माने-जाने वाले अजित सिंह ने पिछले साल इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।
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इस वजह से लग रहीं अटकलें
जानकारों की मानें तो चौधरी चरण सिंह जाटों के साथ-साथ किसानों के बड़े नेता माने जाते थे। पूरे जाट समुदाय में उन्हें बेहद सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। उनके बेटे अजित सिंह ने इस राजनीतिक परंपरा को आगे बढ़ाया। वहीं, जब पूरा देश किसानों की नाराजगी की तपिश से झुलस रहा था, तब अजित सिंह ने राकेश टिकैत को समर्थन देकर किसान आंदोलन को पुनर्जीवित कर दिया था। इससे जाट नेताओं-किसानों के बीच उनकी साख काफी ज्यादा बढ़ गई थी। माना जा रहा है कि इसी साख का फायदा जयंत चौधरी को मिल सकता है।

2013 में हुआ था काफी नुकसान
2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के चलते जाट-मुस्लिम एकता में दरार पड़ गई, जिसका नुकसान अजित सिंह को भी उठाना पड़ा। पिता-पुत्र की जोड़ी संसद पहुंचने में नाकाम रही, लेकिन किसान आंदोलन ने पश्चिमी बेल्ट में जाट-मुस्लिम समीकरण में एक बार फिर जान फूंक दी। माना जा रहा है कि इसका फायदा समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल गठबंधन को मिल सकता है।

जाटों को साधने की कोशिश कर रहे जयंत
गौरतलब है कि जयंत चौधरी लगातार बयान दे रहे हैं कि अब जाट राजनीति के नाम पर जो भी फैसले होंगे, उन्हें पूरे समाज का फैसला माना जाएगा। इसमें किसी भी नेता की मनमानी नहीं चलेगी। अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष यशपाल मलिक का दावा है कि जाट मतदाता इस बार सपा-आरएलडी गठबंधन के पक्ष में लामबंद हैं। वे एकजुट होकर भारतीय जनता पार्टी को सबक सिखाने के मूड में हैं। अजित सिंह के जाने के बाद जाटों का भावनात्मक जुड़ाव जयंत चौधरी से बढ़ा है, जिसका फायदा गठबंधन को मिलना तय है।

गठबंधन को नुकसान पहुंचा सकती है भाजपा
जाट नेता यशपाल मलिक ने यह भी माना कि जाटों का वोट बैंक कई जगह टूट भी रहा है। दरअसल, कुछ विधानसभा सीटों पर भाजपा ने जाट उम्मीदवारों को मैदान में उतार दिया है। उन्होंने बताया कि इससे लगभग एक तिहाई जाट भाजपा के पक्ष में वोट कर सकते हैं, लेकिन बाकी सीटों पर जाट समाज पूरी तरह गठबंधन के साथ खड़ा है।

देशभक्त जाट हमारे साथ, मिलेगी जीत
गौतमबुद्ध नगर के भाजपा जिलाध्यक्ष विजय भाटी ने कहा कि जाटों का समर्थन पूरी तरह गठबंधन के पक्ष में होने की बात कहकर हवा बनाने का काम हो रहा है। जमीनी सच्चाई यह है कि जाट समुदाय बेहद देशभक्त कौम रही है। जब देश की बात आती है तो वे व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रीय मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं। सरकार ने अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, फिल्म सिटी, औद्योगिक क्षेत्र और गंगा एक्सप्रेसवे का विकास किया है। इसका लाभ पूरे क्षेत्र को मिलेगा। सभी के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, जिसकी सहूलियत जाट युवाओं को भी मिलेगी।

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