किसी भी राजनीतिक दल को देश की सत्ता की ड्योढ़ी तक ले जाने वाले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति फिलहाल कमजोर है। 2019 में अमेठी से राहुल गांधी के लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद रायबरेली कांग्रेस की इकलौती लोकसभा सीट बची हुई है। भाजपा ने गांधी परिवार के इस अंतिम गढ़ को ध्वस्त करने के लिए एक बार फिर कांग्रेसी तरकश से ही एक तीर निकाला है। पूर्व कांग्रेसी नेता अदिति सिंह पाला बदलकर अब भाजपा के टिकट पर रायबरेली शहर से ताल ठोक रही हैं। उनके पास भाजपा के कोर वोटरों के साथ-साथ अपने समर्थक भी मौजूद हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या रायबरेली में गांधी परिवार की साख बचती है, या यहां भी भाजपा कमल खिलाने में कामयाब हो जाती है। चौथे चरण में रायबरेली में 23 फरवरी को मतदान होगा।
रायबरेली लोकसभा क्षेत्र में पांच विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें से तीन सीटें बछरावां, हरचंदपुर और सरेनी में कांग्रेस मजबूत स्थिति में बताई जाती है और वह इन पर जीत दर्ज कर सकती है। बाकी दो सीटों– रायबरेली सिटी और ऊंचाहार पर भी कांग्रेस अच्छी लड़ाई लड़ रही है। रायबरेली शहर सीट से डॉ. मनीष चौहान कांग्रेस के टिकट पर चुनावी मैदान में हैं। वे भाजपा की उम्मीदवार अदिति सिंह को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।
हालांकि, जानकारों का कहना है कि अदिति सिंह और डॉ. मनीष चौहान का कोर वोटर परंपरागत तौर पर कांग्रेसी विचारधारा का ही रहा है, ऐसे में दोनों एक-दूसरे के वोट बैंक काट सकते हैं। बीच में इसका फायदा समाजवादी पार्टी को मिल सकता है, जिसके उम्मीदवार आरपी यादव यहां से अच्छी लड़ाई लड़ रहे हैं।
रायबरेली में मुस्लिम मतदाताओं की अहम भूमिका
रायबरेली शहर की सीट पर जीत-हार तय करने में सबसे बड़ी भूमिका मुस्लिम मतदाताओं की रहने वाली है। माना जाता है कि वे यहां उसी दल को वोट कर सकते हैं, जो भाजपा को हराने में सक्षम होगी। ऐसे में मुस्लिम मतदाता सपा या कांग्रेस में से किसी एक को चुन सकते हैं। इस स्थिति में कांग्रेस के लड़ाई में कमजोर रहने पर इनका समर्थन सपा की ओर जा सकता है। ऐसा होता है तो कांग्रेस को नुकसान हो सकता है।
रायबरेली जिले की ऊंचाहार विधानसभा क्षेत्र स्वामी प्रसाद मौर्य के कारण बेहद चर्चित रही है। बसपा से भाजपा में होते हुए समाजवादी पार्टी में आए स्वामी प्रसाद मौर्य इस सीट से अपने बेटे को चुनाव लड़ाना चाहते थे। कहा जाता है कि भाजपा में यह इच्छा पूरी न होते देख स्वामी प्रसाद मौर्य समाजवादी पार्टी की साइकिल पर सवार हो गए, लेकिन यहां भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। सपा ने यहां से अपने वर्तमान विधायक मनोज पांडेय को मैदान में उतारा है। 2012 और 2017 में इस सीट पर जीत दर्ज कर चुके मनोज पांडेय इस बार भी यहां से मजबूत लड़ाई लड़ रहे हैं।
हालांकि, इस बार भाजपा ने ऊंचाहार से अमरपाल मौर्य को मैदान में उतारा है। वे उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बेहद करीबी के तौर पर देखे जाते हैं। केशव प्रसाद मौर्य के कारण अमरपाल मौर्य यहां मजबूत लड़ाई लड़ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह तक उनके पक्ष में चुनाव प्रचार कर चुके हैं। इस बार वे सपा उम्मीदवार मनोज पांडेय के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं। ऊंचाहार से बसपा उम्मीदवार अंजली मौर्य यहां के मौर्य समाज के वोटों में हिस्सा बंटा सकती हैं और कांग्रेस उम्मीदवार अतुल सिंह यहां प्रतीकात्मक लड़ाई के रूप में ही देखे जा रहे हैं।
अन्य सीटों में ज्यादातर पर त्रिकोणात्मक लड़ाई है, जिसमें कांग्रेस अपनी परंपरागत साख के कारण कुछ बेहतर स्थिति में है। लेकिन भाजपा ने इस बार गांधी परिवार के इस किले पर विजय पाने के लिए बेहद सोच-समझकर एक-एक सीट पर उम्मीदवार उतारे हैं। उधर सपा भी हर सीट पर जिताऊ उम्मीदवार उतारकर लखनऊ विधानसभा पहुंचने के सपने संजो रही है। ऐसे में बहुत कम वोटों के अंतर से मामला किसी भी ओर मुड़ सकता है।
'गांधी परिवार की साख मजबूत, भविष्य उज्ज्वल'
समाजसेवी और कांग्रेस नेता आरपी पांडेय ने अमर उजाला से कहा कि गांधी परिवार अमेठी-रायबरेली की अभिन्न पहचान बन चुका है। इस विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस यहां से मजबूत चुनाव लड़ रही है और वह जिले की चार सीटों पर जीत दर्ज कर सकती है, तो एक अन्य सीट पर भी वह अच्छी लड़ाई लड़ रही है। सोनिया गांधी ने जिस तरह लोगों से अपील की है, उससे जनता के मन में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ है। यह सोच मतदान के रूप में दिखाई पड़ेगी। उन्होंने बताया कि प्रियंका गांधी ने प्रदेश में कांग्रेस को एक नई ताकत दी है, जो इस विधानसभा चुनाव के साथ-साथ आगे आने वाले लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को मजबूती देगी।