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UP Assembly Election 2022: यूपी में शिवसेना का क्या काम? कहीं ममता ने तो नहीं दिखाई राह?

प्रतिभा ज्योति
Updated Wed, 12 Jan 2022 08:30 PM IST

सार

उत्तर प्रदेश में तो मराठी वोट बैंक भी नहीं, फिर क्या वजह है कि शिवेसना यहां पैर पसारने की कोशिश कर रही है?  इस रिपोर्ट में इन्हीं कारणों की पड़ताल की गई है।
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उद्धव ठाकरे, मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र - फोटो : ANI
2024 के लोकसभा चुनाव के लिहाज से बहुत अहम माने जाने वाले उत्तर प्रदेश चुनाव में शिवसेना भी उतरेगी। पार्टी नेता संजय राउत ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 50 से 100 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। मीडिया से बात करते हुए, राउत ने कहा कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना यूपी चुनाव लड़ेगी। राउत ने यह भी कहा कि वह गुरुवार यानी 13 जनवरी से पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दौरा करेंगे। 

पिछले साल दिसंबर 2021 में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी से मुलाकात के बाद राउत ने कहा था कि दोनों पार्टियां उत्तर प्रदेश और गोवा चुनावों के लिए मिलकर काम करने पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा था कि हिंदुत्व की काट के बिना कोई भी पार्टी भाजपा को नहीं हरा सकती और शिवसेना भाजपा के लिए एक अच्छा जवाब हो सकती है। हालांकि अभी तक साफ नहीं हुआ है कि पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन करेगी या नहीं?


अतीत में भी लड़  चुकी है शिवसेना
शिवसेना अतीत में बिहार, पश्चिम बंगाल, गोवा समेत जैसे कई राज्यों में निकाय, विधानसभा या लोकसभा चुनाव लड़ चुकी है। पार्टी का दावा रहा है कि वह 1991 से यूपी चुनाव लड़ रही है,  जब एक विधायक पवन कुमार पांडेय चुने गए थे। राज्य भर के विभिन्न नगर निकायों में भी कई शिव सैनिक चुने गए हैं।
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उद्धव ठाकरे, मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र - फोटो : ANI
2024 के लोकसभा चुनाव के लिहाज से बहुत अहम माने जाने वाले उत्तर प्रदेश चुनाव में शिवसेना भी उतरेगी। पार्टी नेता संजय राउत ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 50 से 100 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। मीडिया से बात करते हुए, राउत ने कहा कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना यूपी चुनाव लड़ेगी। राउत ने यह भी कहा कि वह गुरुवार यानी 13 जनवरी से पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दौरा करेंगे। 

पिछले साल दिसंबर 2021 में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी से मुलाकात के बाद राउत ने कहा था कि दोनों पार्टियां उत्तर प्रदेश और गोवा चुनावों के लिए मिलकर काम करने पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा था कि हिंदुत्व की काट के बिना कोई भी पार्टी भाजपा को नहीं हरा सकती और शिवसेना भाजपा के लिए एक अच्छा जवाब हो सकती है। हालांकि अभी तक साफ नहीं हुआ है कि पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन करेगी या नहीं?

अतीत में भी लड़  चुकी है शिवसेना
शिवसेना अतीत में बिहार, पश्चिम बंगाल, गोवा समेत जैसे कई राज्यों में निकाय, विधानसभा या लोकसभा चुनाव लड़ चुकी है। पार्टी का दावा रहा है कि वह 1991 से यूपी चुनाव लड़ रही है,  जब एक विधायक पवन कुमार पांडेय चुने गए थे। राज्य भर के विभिन्न नगर निकायों में भी कई शिव सैनिक चुने गए हैं।

उद्धव ठाकरे - फोटो : पीटीआई
उत्तर प्रदेश चुनाव लड़ने के क्या मायने?
2019 के लोकसभा चुनाव से पहले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अयोध्या का दौरा किया था। हालांकि तब अयोध्या के साधु संत उनका विरोध कर रहे थे। उसी दौर से यह संकेत मिल गए थे कि शिवसेना महाराष्ट्र से बाहर उत्तर भारत में अपने पैर पसारने की कोशिश कर रही है। शिवसेना ने लोकसभा चुनाव में अपने कुछ उम्मीदवार यहां उतारे थे। शिवसेना की शुरुआती राजनीति उत्तर-प्रदेश और बिहार के लोगों के प्रति विरोध की रही है।

शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे यूपी-बिहार के कामगारों के प्रति अपने विवादित बयानों के लिए कई बार सुर्खियों में रहें। बाल ठाकरे के दौर में यूपी-बिहार के लोगों को एक खास शब्द 'भईया' कहकर पुकारा जाने लगा था। पार्टी इसी छवि से बाहर निकलना चाहती है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में अयोध्या, काशी, मथुरा जैसे धार्मिक स्थल हैं, जो शिवसेना के हिंदुत्व के एजेंडे में फिट बैठती है।
  
राष्ट्रीय पार्टी बनने की कवायद का हिस्सा?
इस बार, शिवसेना एनसीपी और कांग्रेस के महा विकास अघाड़ी  गठबंधन का नेतृत्व करके उत्साहित है। पार्टी यूपी और गोवा चुनावों में प्रभाव डालकर राष्ट्रीय स्तर पर पैर जमाने की उम्मीद कर रही है। दूसरी तरफ पार्टी की इस कवायद को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के तौर पर भी देखा जा रहा है। पार्टी पहले भी इसी कोशिश के तहत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है।इस बार पार्टी कुछ महत्वपूर्ण सीटों पर ध्यान दे रही है ताकि एक निश्चित संख्या में वोट मिल सके। हालांकि माना जा रहा है कि शिवसेना के लिए राष्ट्रीय पार्टी बनने की राह आसान नहीं है। 
 

ममता बनर्जी - फोटो : पीटीआई
शिवसेना को क्या हासिल होगा? 
महाराष्ट्र की राजनीति को समझने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक शिवसेना को सूबे की राजनीति में कुछ भी हासिल नहीं होगा, लेकिन इसी बहाने शिवसेना को हिन्दुत्व के मुद्दे पर भाजपा को घेरने का अवसर मिल जाएगा, क्योंकि राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व दोनों ही शिवसेना की विचारधारा का हिस्सा है जो भाजपा से अलग नहीं है।

हालांकि उनका कहना है कि वास्तविकता यह भी है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ जाने से शिवसेना की हिन्दुत्व वाली छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। उनके मुताबिक शिवसेना यदि तृणमूल कांग्रेस की तरह अन्य राज्यों में जाने की बात सोच रही है तो उसकी राह मुश्किल है, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल की राजनीति करते हुए भी उत्तर भारत के  लोगों के खिलाफ नहीं रही, जबकि शिवसेना की छवि केवल मराठी वोट बैंक की है। 

क्या ममता ने दिखाई राह?
राजनीति के जानकार कहते हैं कि यूपी सभी पार्टियों के लिए एक प्रयोगशाला बन गई है। जिसका रास्ता तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी दिखा रही हैं।  कांग्रेस के कमजोर होने पर ममता बनर्जी राष्ट्रीय राजनीति की अपनी महत्वाकांक्षा बढ़ा रही हैं और इसलिए टीएमसी फरवरी में होने वाले गोवा विधानसभा चुनाव लड़ रही है और कई राज्यों में अपनी पार्टी का विस्तार भी कर रही है। टीएमसी अगले साल त्रिपुरा विधानसभा चुनाव भी लड़ना चाहती है।

टीएमसी को देखकर अन्य  क्षेत्रीय पार्टियां भी राष्ट्रीय स्तर पर अपना वजूद बढ़ाने की महत्वाकांक्षा पाल रही हैं। एनसीपी और शिवसेना भी उसी रास्ते पर है। एनसीपी भी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और अन्य छोटे-छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली है। इसी तरह गोवा में भी वह कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की योजना बना रही है।

मुंबई दौरे के दौरान ममता बनर्जी - फोटो : ANI
ममता खेमे से बनी रणनीति?
हालांकि कहा यह भी जा रहा है कि शिवसेना और एनसीपी जैसी पार्टियों के दूसरे राज्यो में भी चुनाव लड़ने के पीछे की रणनीति ममता बनर्जी खेमे से बनाई गई हो ताकि सभी क्षेत्रीय पार्टियां मिलकर भाजपा के खिलाफ एक मजबूत विकल्प तैयार कर सकें। कुछ समय पहले ममता बनर्जी ने महाराष्ट्र का दौरा किया था और एनसीपी और शिवसेना के नेताओं से मुलाकात की थी। ममता बनर्जी एक मजबूत विपक्ष के बारे में कई बार सार्वजनिक मंचों से बयान दे चुकी हैं।

आम आदमी पार्टी अपवाद
वैसे देखा गया है कि एक राज्य विशेष में सीमित जितनी भी पार्टियां हैं वो अब तक किसी दूसरी राज्य में कोई खास सफल नहीं रहीं। हालांकि इसमें आम आदमी पार्टी अपवाद है। आम आदमी पार्टी पहले ही दिल्ली से बाहर पंजाब में अपनी स्थिति मजबूत कर चुकी है। यही वजह है कि पंजाब विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस को कड़ी टक्कर देती नजर आ रही है।

वहीं असदुद्दीन ओवैसी की आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादु मुस्लिमीन (AIMIM) को भी हैदराबाद से बाहर बिहार में सफलता मिली। ओवैसी की पार्टी ने 2020 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीतीं। इससे पार्टी गद्गद हुई। हालांकि पिछले साल अप्रैल-मई में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी को वह अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई।
 

उद्धव ठाकरे, मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र - फोटो : ANI
इससे पहले बिहार-गोवा में क्या हुआ? 
शिव सेना का इतिहास देखें तो महाराष्ट्र के बाहर उसका रिकार्ड काफी खराब रहा है और महाराष्ट्र से बाहर उसकी स्वीकार्यता नहीं बन पाई। ऐसा नहीं है कि शिवसेना आज ही महाराष्ट्र के बाहर अपने हाथ-पांव मार रही है। इससे पहले शिवसेना बिहार में भी विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है। पार्टी ने 2015 में बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में करीब 60 जगहों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और इससे भाजपा थोड़ी परेशान भी हुई।

भाजपा उम्मीदवारों का कुछ नहीं बिगड़ा
शिवसेना का दावा था कि ऐसी करीब 35 सीटें थीं जहां उसकी वजह से भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। हालांकि वर्ष 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव में शिवसेना को नोटा से भी कम वोट मिले थे। शिवसेना को 0.05 फीसदी वोट मिले थे, जबकि नोटा पर 1.68 फीसदी वोट थे। पार्टी ने गोवा में साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भी अपने तीन उम्मीदवार उतारे थे जिसका भाजपा उम्मीदवारों पर कुछ भी असर नही पड़ा। जबकि शिवसेना को तीनों ही सीटों पर बुरी हार झेलनी पड़ी।

बिहार और गोवा चुनाव में शिवसेना महज वोट कटुआ पार्टी के तौर पर ही अपनी दस्तक दी है। दोनों ही राज्यों में शिवसेना को कोई जीत नसीब नहीं हुई। शिवसेना 1998 से शिवसेना राजस्थान विधानसभा चुनाव लड़ रही है, लेकिन कभी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाई। विश्लेषक कहते हैं, अब देखना होगा कि इस विधानसभा चुनाव में शिवसेना जहां अपने पैर पसारने की कोशिश कर रही है, वहां जीत हासिल करेगी या फिर एक बार फिर वोट कटुआ का तमगा बरकरार रहेगा।
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