देश भर में कोरोना संक्रमण में हो रही लगातार वृद्धि के बीच घर पर खुद ही जांच करने वाले कोरोना किट की मांग बहुत बढ़ गई है। खासतौर पर दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में जहां कोरोना मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इससे सरकार को किट के महंगे होने और कालाबाजारी करने की आशंका सताने लगी है।
स्व-परीक्षण किट की बड़े पैमाने पर बिक्री स्वास्थ्य अधिकारियों के बीच चिंता भी पैदा कर रही है क्योंकि पॉजिटिव रिपोर्ट आने वाले लोगों को ट्रैक करने, उन्हें अलग करने और उनका रिकॉर्ड रखना भी मुश्किल हो रहा है। पिछले सप्ताह मुंबई में अकेले एक कंपनी ने पांच लाख से अधिक स्व-परीक्षण किट बेचे गए हैं। स्वपरीक्षण करने वाले लगभग सात किट बाजार में उपलब्ध हैं। एक को छोड़कर ये सभी परीक्षण नाक के स्वाब-आधारित टेस्ट हैं और सभी केमिस्ट की दुकानों और ऑनलाइन उपलब्ध है।
लोग आरटी-पीसीआर की तुलना में रैपिड टेस्ट का विकल्प क्यों चुन रहे हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि स्व-परीक्षण किट रातों-रात लोगों में मशहूर हो गया है क्योंकि यह कोरोना टेस्टिंग करने का आसान तरीका बन गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक कुछ डॉक्टर तेजी से परीक्षण के साथ-साथ आरटी-पीसीआर टेस्टिंग के लिए भी कह रहे हैं जिसमें औसतन 48-72 घंटों का समय लग रहा है। ऐसे में लोग इतने घंटों का इंतजार नहीं करना चाहते।
कोरोना किट की मदद से आसानी और तेजी से परीक्षण हो जाता है और यदि व्यक्ति पॉजिटिव आता है तो जल्दी अपना इलाज शुरू करा सकता है। बहुत सारे लोग कोरोना के हल्के लक्षणों को देखते हुए बाहर से टेस्ट कराने के बजाए स्व-परीक्षण ही करना पसंद कर रहे हैं जिस वजह से कोरोना किट की मांग बढ़ी है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि लोगों ने कोरोना के बढ़ते खतरे के बीच घरों में किट को स्टॉक करना भी शुरू कर दिया है।