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समान नागरिक संहिता: क्या मुसलमानों-आदिवासियों की नाराजगी का खतरा उठाएगी भाजपा? जानें कितना कारगर होगा यह दांव

सार

बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या सरकार यह कानून लाकर आदिवासियों और मुसलमानों की नाराजगी का खतरा उठाएगी? कहा जा रहा है कि इससे उन लोगों पर ज्यादा असर होगा जो अपनी धार्मिक मान्यता के अनुसार चार विवाह कर सकते हैं।
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समान नागरिक संहिता - फोटो : AMAR UJALA
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विस्तार
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विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) पर लोगों से रायशुमारी करनी शुरू कर दी है। माना जा रहा है कि केंद्र सरकार लोकसभा चुनाव 2024 के पहले इसे लाने का बड़ा राजनीतिक दांव चल सकती है। चुनावों में इसका कितना लाभ मिल सकता है? यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन कानून के जानकारों का कहना है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे गंभीर मुद्दे पर कानून बनाने के लिए एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसके लिए फिलहाल समय नहीं बचा है। ऐसे में लोकसभा चुनाव के पहले समान नागरिकता कानून बनने की संभावना नहीं है।
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सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी दुबे ने कहा कि यदि सरकार चाहे तो वह अध्यादेश के जरिए समान नागरिक संहिता लाने का विकल्प अपना सकती है। बाद में इसके उपबंधों पर विस्तृत विचार-विमर्श करते हुए कानून लाया जा सकता है। केंद्र सरकार इसके पहले कई मुद्दों पर अध्यादेश के जरिए कानून ला चुकी है। इस कानून को लाने से पहले दर्जनों अन्य वर्तमान कानूनों में बदलाव की आवश्यकता होगी जो कि एक लंबी प्रक्रिया है। विभिन्न समुदायों से व्यापक विचार-विमर्श के बिना इस कानून को लाने से इसका विरोध हो सकता है। सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) और एनआरसी (नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजंस) जैसे मुद्दों पर इसी तरह का विरोध हुआ था। 

नाराजगी का खतरा उठाएगी सरकार?
बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या सरकार यह कानून लाकर आदिवासियों और मुसलमानों की नाराजगी का खतरा उठाएगी? कहा जा रहा है कि इससे उन लोगों पर ज्यादा असर होगा जो अपनी धार्मिक मान्यता के अनुसार चार विवाह कर सकते हैं। 1955 में एक कानून के जरिए बहुविवाह को अवैध करार दे दिया गया था, लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण मुसलमानों को भी इससे छूट प्राप्त है।
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कई जनजातियों-आदिवासी समूहों में भी 'बहुपत्नी' (Polygyny) और 'बहुपति' (Polyandry) प्रथा विद्यमान है। इसे उन समाजों में सामाजिक-धार्मिक मान्यता प्राप्त है। समान नागरिक संहिता लागू होने से आदिवासियों-जनजातियों की इस मान्यता को चोट पहुंच सकती है। लिहाजा इस कानून के प्रति उनके बीच विरोध तेज हो सकता है। 

विशेषकर यह ध्यान रखते हुए कि आदिवासी मतदाता भाजपा के कोर वोटर बनकर उभरे हैं। आदिवासी-जनजातीय समुदाय के लोगों के लिए आरक्षित सीटों में भाजपा को 2014 के लोकसभा चुनाव में 27 सीटों और 2019 में 31 सीटों पर सफलता मिली थी। दूसरी सीटों पर भी आदिवासी मतदाताओं ने भाजपा की जीत सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 

पिछले साल संपन्न हुए गुजरात विधानसभा चुनावों में भी भाजपा को 27 आदिवासी सीटों में से 23 पर जीत हासिल हुई थी। अब जबकि इसी साल आदिवासी मतदाताओं की बहुलता वाले राज्य छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होने हैं, भाजपा इन मतदाताओं की नाराजगी का खतरा क्यों उठाएगी?

आदिवासियों को छूट देने का रास्ता उपलब्ध
हालांकि, कानून के जानकारों के अनुसार विशेष उपबंधों के जरिए अनुसूचित जनजातियों को इस कानून से छूट दी जा सकती है। इस समय भी कई कानूनों में आदिवासियों को विशेष छूट प्राप्त है। इसे समान नागरिक संहिता में भी आगे बढ़ाकर भाजपा एक तीर से दो शिकार करने का दांव चल सकती है। हालांकि, इससे 'एक देश, एक विधान' की मूल सोच प्रभावित हो सकती है।   
 
मुसलमानों की नाराजगी का भी खतरा
भाजपा ने एक सोची-समझी रणनीति के अंतर्गत मुसलमान मतदाताओं को आकर्षित करने की रणनीति भी अपनाई है। पीएम नरेंद्र मोदी ने पार्टी की हैदराबाद कार्यकारिणी में पार्टी कार्यकर्ताओं को अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच पैठ बनाने की बात कही थी। पार्टी ने विशेष अभियान चलाकर अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश भी की है। 

हाल ही में संपन्न हुए उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में भाजपा ने 395 मुसलमान उम्मीदवारों को उतारकर सबको चौंका दिया था। स्वयं मुसलमान समुदाय में भी इसे भाजपा की ओर से सकारात्मक पहल के तौर पर देखा गया था। इसका परिणाम रहा कि भाजपा उन मुस्लिम बहुल सीटों पर भी जीतने में सफल रही जहां उसे कभी सफलता नहीं मिलती थी। 

क्या नाराजगी का जोखिम उठाएंगे पीएम मोदी?
भाजपा इसी रणनीति पर चलते हुए यूपी की आजमगढ़, रामपुर, सहारनपुर, आगरा और मेरठ की मुसलमान बहुल लोकसभा सीटों पर भी अपनी जीत की राह आसान करना चाहती है जहां या तो उसे जीत नहीं मिलती है, या तो उसकी जीत का अंतर बेहद कम होता है जो कड़े मुकाबले में किसी भी पक्ष की ओर जा सकता है। ऐसे में भाजपा मुस्लिम मतदाताओं को भी नाराज करने का जोखिम नहीं उठाएगी। इस लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यूपी की सभी सीटों पर जीत दर्ज करने का 'मिशन 80' प्लान बनाया है। ऐसे में उसके लिए मुस्लिम मतदाताओं का महत्व बढ़ गया है।

मुस्लिम महिलाओं का मिलेगा साथ
भाजपा के एक केंद्रीय नेता ने अमर उजाला से कहा कि तीन तलाक कानून के समय भी यही कहा जा रहा था कि इस कानून के लाने के बाद मुसलमान भाजपा से नाराज हो जाएंगे। लेकिन चुनाव परिणाम यह दर्शाते हैं कि तीन तलाक कानून के आने के बाद मुसलमानों के बीच भाजपा का समर्थन बढ़ गया। माना गया कि तीन तलाक कानून से पीड़ित मुस्लिम महिलाओं ने बढ़ चढ़ कर भाजपा का समर्थन किया। नेता ने कहा कि बहुपत्नी प्रथा से भी मुस्लिम महिलाओं के हितों को ही चोट पहुंचती है, ऐसे में मुस्लिम महिलाएं इस प्रथा का कभी समर्थन नहीं करेंगी और उनके बीच पार्टी का समर्थन और ज्यादा बढ़ सकता है।
     
लंबी है प्रक्रिया
समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर काम कर रहे एक विशेषज्ञ ने अमर उजाला को बताया कि समान नागरिक संहिता पर लोगों की राय लेने की प्रक्रिया बेहद लंबी है। लोगों से विचार-विमर्श करते हुए राज्य स्तर पर ही लाखों विचार मिलते हैं। इन्हें एक स्वरूप देने में पर्याप्त समय लगता है। इन सभी सलाहों पर विचार करते हुए इन्हें एक कानून के रूप में देने की सलाह देने के लिए भी प्राप्त आंकड़ों को पेश करना होता है। राष्ट्रीय स्तर पर इस प्रक्रिया को पूरा करने में बहुत समय लग सकता है। ऐसे में अभी राष्ट्रीय स्तर पर समान नागरिक कानून लाने की संभावना नहीं है।
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