दुधवा नेशनल पार्क से सटे वन क्षेत्र के अशिक्षित आदिवासियों का जीवन बेहद दुरूह रहा है। पिछले कुछ सालों में यहां थारू महिलाओं ने अपने हुनर से अपने बारे में आम लोगों की धारणा ही बदल दी है। आज वे कंप्यूटर पर डिजाइन सीख कर अपने हुनर को निखार रही हैं। लगन, ईमानदारी, कड़ी मेहनत और बेदाग चरित्र ये इनके खास गहने हैं।
आरती राना ने समूह बनाकर इसकी शुरुआत की और लखीमपुरखीरी की डीएम किंजल सिंह ने इनकी आंखों में सपने भर कर थारू समाज के पुश्तैनी हुनर को एक दिशा दे दी। आरती की मदद से आज 120 समूह बन चुके हैं। द राइजिंग अभियान से डीएम इन महिलाओं को सरकार की योजनाओं, इंटरनेट, कंपनियों और विशेषज्ञों के जरिए हर दिन कुछ नया देने की कोशिश कर रही हैं।
चंदनचौकी और उसकी आसपास की 21 ग्राम पंचायतों में थारू समाज के लोग रहते हैं। यह जनजाति परंपराओं और हस्तशिल्प के कारण अलग पहचान रखती है। रामनगर, बरबटा, पचपेड़ा, पोया, बलेरा, धुसकिया, पुरैना, बेलडांडी में हस्तशिल्प समूह बने हैं। डीएम किंजल सिंह ने इनके जीवन, कामकाज और हस्तशिल्प की जानकारी जुटाई।
उन्होंने उनके हुनर को राष्ट्रीय मंच पर ले जाने की ठानी और द राइजिंग कार्यक्रम चलाकर 10 दिनों तक थारू महिलाओं और लड़कियों के साथ रहकर उन्हें प्रशिक्षित कराया। उनकी प्रतिभा बढ़ाने के लिए ओरछा, मध्य प्रदेश के तारा ग्राम में भ्रमण कराया। इस दल को 30 सितंबर 2015 को मुख्यमंत्री ने अपने आवास से हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था।
इसके बाद थारू महिलाओं को अपने उत्पादों की प्रदर्शनी राष्ट्रीय मंचों पर लगाने का मौका मिलने लगा। 8-17 जनवरी 2016 तक चले गोवा लोकोत्सव में सर्वाधिक सात स्टाल थारू महिलाओं को मिले। लखनऊ महोत्सव, हरियाणा महोत्सव में भी थारू हस्तशिल्प के स्टाल लगाए गए। जिससे इन्हें नई रोशनी मिली।