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इन महिलाओं में है ऐसा हुनर कि बड़े-बड़े लोग मानने लगे हैं लोहा

Tue, 08 Mar 2016 05:42 AM IST
विकास शुक्ल/अमर उजाला, लखीमपुर खीरी

सार

  • आज वे कंप्यूटर पर डिजाइन सीख कर अपने हुनर को निखार रही हैं।
  • लगन, ईमानदारी, कड़ी मेहनत और बेदाग चरित्र ये इनके खास गहने हैं।
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आरती राना - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दुधवा नेशनल पार्क से सटे वन क्षेत्र के अशिक्षित आदिवासियों का जीवन बेहद दुरूह रहा है। पिछले कुछ सालों में यहां थारू महिलाओं ने अपने हुनर से अपने बारे में आम लोगों की धारणा ही बदल दी है। आज वे कंप्यूटर पर डिजाइन सीख कर अपने हुनर को निखार रही हैं। लगन, ईमानदारी, कड़ी मेहनत और बेदाग चरित्र ये इनके खास गहने हैं।
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आरती राना ने समूह बनाकर इसकी शुरुआत की और लखीमपुरखीरी की डीएम किंजल सिंह ने इनकी आंखों में सपने भर कर  थारू समाज के पुश्तैनी हुनर को एक दिशा दे दी। आरती की मदद से आज 120 समूह बन चुके हैं। द राइजिंग अभियान से डीएम इन महिलाओं को सरकार की योजनाओं, इंटरनेट, कंपनियों और विशेषज्ञों के जरिए हर दिन कुछ नया देने की कोशिश कर रही हैं।

चंदनचौकी और उसकी आसपास की 21 ग्राम पंचायतों में  थारू समाज के लोग रहते हैं। यह जनजाति परंपराओं और हस्तशिल्प के कारण अलग पहचान रखती है। रामनगर, बरबटा, पचपेड़ा, पोया, बलेरा, धुसकिया, पुरैना, बेलडांडी में हस्तशिल्प समूह बने हैं। डीएम किंजल सिंह ने इनके जीवन, कामकाज और हस्तशिल्प की जानकारी जुटाई।
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उन्होंने उनके हुनर को राष्ट्रीय मंच पर ले जाने की ठानी और द राइजिंग कार्यक्रम चलाकर 10 दिनों तक थारू महिलाओं और लड़कियों के साथ रहकर उन्हें प्रशिक्षित कराया। उनकी प्रतिभा बढ़ाने के लिए ओरछा, मध्य प्रदेश के तारा ग्राम में भ्रमण कराया। इस दल को 30 सितंबर 2015 को मुख्यमंत्री ने अपने आवास से हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था।

इसके बाद थारू महिलाओं को अपने उत्पादों की प्रदर्शनी राष्ट्रीय मंचों पर लगाने का मौका मिलने लगा। 8-17 जनवरी 2016 तक चले गोवा लोकोत्सव में सर्वाधिक सात स्टाल थारू महिलाओं को मिले। लखनऊ महोत्सव, हरियाणा महोत्सव में भी थारू हस्तशिल्प के स्टाल लगाए गए। जिससे इन्हें नई रोशनी मिली।

क्या कहती हैं आरती राना

आरती राना - फोटो : अमर उजाला
हम लंबे समय हस्तशिल्प तैयार कर रहे हैं लेकिन मंच नहीं था। डीएम किंजल सिंह की मदद से दिल्ली समेत अन्य प्रदेशों में लगने वाले हस्तशिल्प मेलों में स्टाल लगाने का ऑफर मिलने लगा। तैयार उत्पाद की बिक्री बढ़ी तो आर्थिक स्थिति ठीक हुई है।
-आरती राना

राजकुमारी को हैं दरी बनाने में महारथ

दरी बनाने में महारथ हासिल कर चुकी राजकुमारी अब दूसरी थारू महिलाओं को इसका प्रशिक्षण दे रही हैं। अपने पैरों पर खड़े होने के कारण परिवार में खुशहाली है। दोनों बच्चे अच्छी शिक्षा हासिल कर रहे हैं।

कलिया डलवा टोकरी में एक्सपर्ट

कलिया दरी के साथ डलवा और टोकरी बनाने में भी कुशल हैं। इस हुनर को सिखा कर सिखाकर वह औरों को भी आत्मनिर्भर बना रही हैं।

कलावती की दरियों में ककहरे की डिजाइन

दरियों में अक्षरों की बेहतरीन डिजाइन कलावती की अलग पहचान है। इस कला को वह  सभी को सिखा रही हैं।

कुसमा बनीं महिलाओं की प्रेरणा

दरी बनाने में माहिर कुसुमा अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा भी हैं। अब वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवा रही हैं।

निराशो ने परिवार में भरी खुशहाली

निराशो घरेलू महिला हैं और अपने पारंपरिक थारू पहनावे में ही रहती हैं। घर के खर्चे से लेकर बच्चों तक के पढ़ाने का खर्चा वह खुद ही उठाती हैं।
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ये उत्पाद होते हैं तैयार

आरती राना - फोटो : अमर उजाला
योगा मैट, कारपेट, पूजा आसनी, मूंजषा बास्केट, जूट हैंडबैग, पर्स, फाइल कवर, मोबाइल कवर, स्लीपर, कैप, दरी, डलिया, डलवा आदि।

थारू विकास के लिए किए गए प्रयास

- राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत 120 थारू महिला स्वयं सहायता समूहों का गठन, 1200 से अधिक महिलाएं शामिल
- इन महिला समूहों को 15 हजार रुपये प्रति समूह की दर से रिवाल्विंग फंड की धनराशि से एक लाख 80 हजार की धनराशि मुहैया कराई

पलिया ब्लाक में अनुसूचित जनजाति थारू की संख्या सर्वाधिक है। कृषि भूमि नहीं है लेकिन हस्तशिल्प का हुनर है। इसलिए समूह के रूप में संगठित कर आजीविका मिशन के तहत साधन उपलब्ध कराना आसान था। इससे जनजाति की जंगल पर निर्भरता कम होगी और जंगल की सुरक्षा भी होगी। साथ ही आर्थिक सशक्तीकरण से शिक्षा का स्तर सुधरेगा और अगली पीढ़ी खुद विकास करेगी।
- किंजल सिंह, जिलाधिकारी, लखीमपुर खीरी
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