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इन गांवों में अब बाल विवाह नहीं होते

Thu, 20 Sep 2018 08:22 PM IST
धीरेंद्र शर्मा
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यदि मेरे परिवार वाले संपन्न होते और पढ़ने के लिए उन्होंने मुझे स्कूल भेजा होता, तो संभव है कि आज मैं जरूरतमंद बच्चों की पीड़ा नहीं समझ पाता और न ही उनके लिए कुछ कर रहा होता! ऐसे बच्चों की मदद करके मैं दोबारा से अपना बचपन जी रहा हूं। मुझे याद है कि जब मैं छोटा था, तो स्वतंत्रता दिवस का पूरे साल इंतजार करता था, क्योंकि यही वह दिन था, जब मुझे मुफ्त में जलेबियां खाने को मिलती थीं। मेरा कद शुरू से ही लंबा रहा है, जिसका फायदा मैं मेज से ज्यादा जलेबियां उठाने के लिए करता था। फिर बाद में अपने दोस्तों के साथ आराम से मिल-बांटकर खाता था।
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मैं बिहार के गया जिले के श्रीपुर गांव में रहता हूं। विधिवत स्कूल न जाकर भी मैं सौभाग्य से कुछ ऐसे शिक्षकों के संपर्क में आया, जिन्होंने मुझे बहुत ईमानदारी से जिंदगी के फलसफे सिखा दिए। यही कारण था कि जब मैं कुछ करने लायक बना, तब मैंने बच्चों को सिखाने-पढ़ाने का काम चुना। सौ साल की उम्र पूरी करने के बहुत करीब द्वारको सुंदरनी के साथ मिलकर, जो कि गांधी जी के चुनिंदा जीवित शिष्यों में से एक हैं, फरवरी, 2009 में मैंने बोधि ट्री एजुकेशनल फाउंडेशन की स्थापना की थी। हमारा उद्देश्य था कि हम शैक्षणिक उपकरणों का प्रयोग करके अपने इलाके के बच्चों के समग्र विकास में अपनी भूमिका निभाएं। हमारी संस्था गरीब खेतिहर मजदूरों, खासकर मांझी समुदाय से आने वाले बच्चों की बेहतरी के लिए काम करती है। अक्सर लोग कोई भी काम शून्य से शुरू करते हैं, लेकिन मैंने अपना काम शून्य से पीछे 'माइनस चालीस' से शुरू किया, क्योंकि दूसरे राज्यों की तुलना में बिहार के सामाजिक हालात ज्यादा बदतर हैं। यहां बच्चों के अभिभावकों, खासकर लड़कियों के मां-बाप को अपनी बच्चियों को स्कूल भेजने के लिए मना पाना बड़ी चुनौती है। मैंने महसूस किया है कि इन गरीब परिवारों से आने वाले बच्चों की इच्छाएं दूसरे सामान्य बच्चों की तरह कोई कीमती वस्तु या खिलौना पाने की नहीं होती। ये तो बस अपनी सामाजिक स्वीकार्यता और आत्मीयता के भूखे होते हैं। कथित सभ्य समाज में ये हर जगह दुत्कारे जाते हैं। इन बच्चों में भी कुछ खास होते हैं, जिन पर अलग से ध्यान की जरूरत होती है। ऐसे विशेष बच्चों के लिए मैंने बाद में एक दूसरा स्कूल खोला। मानसिक या शारीरिक, किसी भी प्रकार की समस्या वाले बच्चों का दूसरे स्कूल में विशेष ध्यान रखा जाता है। हमारे स्कूल में एसी का मतलब होता है 'एबसल्यूट कंफर्ट' और हम यही मानते हैं कि मुस्कराते हुए खुशहाल जीवन बिताना हर बच्चे का अधिकार है। आज नौ गांवों के बच्चे मेरे स्कूल में पढ़ने आते हैं। मुझे यह कहने में गर्व होता है कि हमारे इलाके में अब बाल विवाह लगभग समाप्त हो गया है। हमारे दोनों स्कूल सामाजिक सहभागिता के आधार पर चल रहे हैं। मैं परंपरा से जुड़े नियमों को नहीं मानता। मुझे लगता है कि मैं थोड़ा दीवाना भी हूं। मैं कोई महान काम नहीं कर रहा हूं। कोई भी अपने समाज के लिए इतना काम आराम से कर सकता है।

हम अपने शरीर की छवि निहारने के लिए आईने में खुद को देखते हैं। मगर यदि हमें अपने आंतरिक व आत्मिक गुणों का पता लगाना है, तो हमें अपनी नीयत को कसौटी पर कसना होगा।
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(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित)
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