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"मां की जन्नत थी सऊदी अरब पर हकीकत तो मुझे बड़े होकर पता चली": तसलीमा नसरीन

Tue, 26 Jun 2018 03:58 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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छोटी उम्र में मां मुझे अपने सपनों के बारे में बताती थीं। मां का सबसे बड़ा सपना एक बार अपनी आंखों से सऊदी अरब को देखना था। मां सऊदी अरब को दुनिया का सबसे पवित्र देश मानती थीं। अल्लाह के प्रिय नबी हजरत मोहम्मद उसी देश में पैदा हुए थे। उसी देश में इस्लाम धर्म का जन्म हुआ है। उस देश की भाषा कुरान की भाषा है और उसी देश में काबा शरीफ हैं। मक्का-मदीना की बात कहते-कहते मां भावुकता में रोने लगती थीं। तब मुझे भी लगता था कि उस पवित्र देश में कुछ गलत हो ही नहीं सकता।

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जैसे-जैसे मैं बड़ी हो रही थी, अपने चारों ओर देख रही थी, इस पृथ्वी को जान रही थी, मां के सपनों के उस देश के बारे मेरी धारणाएं टूट रही थीं। सऊदी अरब में लोकतंत्र नहीं, राजतंत्र है। सऊदी राजपरिवार अपने देश के बारे में जो इच्छा, निर्णय कर सकता है, किसी को इसमें बाधा देने का अधिकार नहीं है। सरकारी जल्लाद सार्वजनिक स्थलों पर लोगों के सामने अपराधियों के सिर तलवार से अलग कर देते हैं, जो सड़क के दूसरी ओर फुटबॉल की तरह लुढ़क जाते हैं।

यह देख उपस्थित लोग खुशी से झूम उठते हैं। खड़े होकर यह वीभत्सता नहीं देखी जा सकती। सऊदी अरब में बोलने की स्वतंत्रता तो नहीं है साथ ही अभिव्यक्ति की आजादी भी नहीं है। मुक्तचिंतक रउफ बदावी को आज भी कैद करके रखा हुआ है। उस देश में मानवाधिकार का उल्लंघन होता है, महिलाओं के अधिकार के नाम पर ज्यादा कुछ नहीं है। धनी पुरुषों की मर्जी के मुताबिक उप-पत्नियां हैं।

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"लड़कियों को धर्म पुलिस बनाती है निशाना"

लड़कियों को बाहर निकलने से पहले खुद को सिर से पांव तक ढंकना पड़ता है। ललाट पर दो बाल भी दिख गए, तो धर्म पुलिस निशाना बनाती है। महिलाओं को वाहन चलाने का अधिकार इसी साल 24 जून को मिला है। महिलाओं को अकेले कहीं घूमने का अधिकार नहीं है। लड़कियों के साथ बलात्कार होता है, तो उन्हें ही सजा भी मिलती है। कोई गैर-मुस्लिम मक्का-मदीना नहीं जा सकता।

बीती सदी के पांचवें-छठे के दशक में सऊदी अरब के तेल कुओं में वहीं के श्रमिक काम करते थे। उसके बाद पड़ोस के मुल्क से वहां कामगार जाने लगे। बीती सदी के आठवें दशक में वहां एशिया से कामगार लेने की परंपरा शुरू हुई। इन एशियाई लोगों को सऊदी अरब में श्रमिक के तौर पर तो छोड़िए, मनुष्य के तौर पर भी मर्यादा नहीं मिलती। महिला कामगार यौन हिंसा का शिकार बनती हैं। सऊदी पुरुष अपने घर में काम करने वाले लोगों को पैरों से, जूतों से, चाबुक से पीटते हैं।

यह सोचकर भी आश्चर्य होता है कि एशिया से गए ये मुस्लिम श्रमिक सऊदी अरब जैसे मुस्लिम देश में गुलामों जैसा जीवन बिताते हैं, जबकि यही मुसलमान ईसाइयों और नास्तिकों के देश में तुलनात्मक रूप से आजाद हैं, वहां इनके मानवाधिकारों की कद्र की जाती है, वहां वे ज्यादा सुरक्षित हैं। मुस्लिम औरतें गैर मुस्लिम नहीं, बल्कि मुस्लिम पुरुषों द्वारा सर्वाधिक शोषित होती हैं। सऊदी अरब में महिला कामगारों का बलात्कार इतना अधिक होता है कि अब इंडोनेशिया, फिलीपींस और श्रीलंका की महिलाएं भी वहां काम करने नहीं जाना चाहतीं। इन्हीं देशों से महिला कामगार वहां अधिक जाती थीं।

"अपने देश की महिलाओं की कद्र नहीं करता तो गरीब देश की महिलाओं की कैसे करेगा"

ऐसे में, सऊदी अरब ने अब बांग्लादेश से दो लाख महिला श्रमिकों की मांग की है। बांग्लादेश से हर महीने दस हजार महिला श्रमिकों को सऊदी अरब भेजे जाने की कोशिश चल रही है। हालांकि जिस तरह की बर्बरता वहां होती है, उसे देखते हुए इन महिला श्रमिकों को यौन दासी कहना ही अधिक उपयुक्त होगा। वहां उनका शारीरिक शोषण ही नहीं होता बल्कि उन्हें उनके आर्थिक हितों से भी वंचित किया जाता है। यह अजीब है कि सऊदी अरब में काम करा लेने के बाद श्रमिकों को पैसे न देने के बावजूद सऊदी नागरिकों को कोई सजा नहीं मिलती।

वहां के लोगों को ना तो शोषण करने की सजा मिलती है और ना ही बलात्कार की। सऊदी मालिक किसी भी अंतरराष्ट्रीय श्रम कानून को न मानने को बाध्य हैं। इसके बजाय उन्हें यथासंभव क्रूर होने का अधिकार है। शोषण के शिकंजे में फंसे श्रमिक वहां से निकलना चाहते हैं, लेकिन निकल नहीं पाते। सऊदी अरब का कानून श्रमिकों के हक में नहीं है, शोषितों और महिलाओं के पक्ष में नहीं है। सऊदी अरब का कानून पुरुषों के, अमीरों के, शासकों के, मालिकों के और अत्याचारियों के पक्ष में है।

मुस्लिम मुस्लिमों के भाई हैं, यह बात बार-बार गलत साबित होती है। ज्यादातर धनी मुस्लिम गरीब मुसलमानों के हित में नहीं सोचते। धनी मुसलमान गरीब मुसलमानों को अगर दान में रुपये-पैसे देते भी हैं, तो उन्हें और धार्मिक या धर्मांध बनाने के लिए। सऊदी अरब गरीब मुस्लिम देशों का हिताकांक्षी न कभी था, न है। वह श्रमिकों की मांग करता है, तो सिर्फ अपने हित में। सऊदी पुरुष जब अपनी महिलाओं की ही कद्र नहीं करते, तो वे गरीब देशों से आने वाली महिला श्रमिकों की गरिमा भला क्या समझेंगे?
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शोषित महिलाओं को और शोषित करने के लिए भेजा जा रहा सऊदी अरब

बांग्लादेश चाहता, तो महिला श्रमिक भेजने से मना कर सकता था। लेकिन शेख हसीना सरकार का कहना है कि बांग्लादेश में भी महिलाएं कोई कम शोषित नहीं हैं। लेकिन क्या बांग्लादेश की गरीब महिलाओं को सऊदी अरब भेजकर जान-बूझकर उनका शोषण होने देने का कारण बनना चाहिए? चूंकि हम अपने घर में महिलाओं को मर्यादा और सुरक्षा नहीं दे पा रहे, इसलिए विदेश में भेजकर उन्हें और शोषित होने देने में कोई हर्ज नहीं है!

बांग्लादेश में महिलाएं शोषण का शिकार हैं, तो इसके लिए कौन दोषी है? मैं शेख हसीना की सरकार की तरह नहीं सोचती। मैं घर और बाहर, दोनों मोर्चे पर महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार का घोर विरोध करती हूं। इसीलिए सऊदी अरब में बांग्लादेश से महिला श्रमिक भेजे जाने की तैयारियों ने मुझे आशंका और क्षोभ से भर दिया है।  

तसलीमा नसरीन
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