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शिक्षक दिवस: पढ़िए इन 5 शिक्षकों की कहानी, जो आपके दिल को छू लेगी

Sun, 04 Sep 2016 09:14 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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आज शिक्षक दिवस है। एक व्यक्ति के जीवन में अगर माता-पिता के बाद जिस व्यक्ति का सबसे ज्यादा महत्व होता है वो शिक्षक का होता है क्योंकि, शिक्षक ही अपने विद्यार्थी के ज्ञान का एकमात्र सहारा होता है। आज भी समाज में ऐसे शिक्षक हैं जिनकी कर्मठता, सदाचार और राष्ट्र निर्माण के प्रति उनके कार्यों से शिक्षक समाज का मस्तक गर्व से ऊंचा हुआ है। उन्हें इस काम के लिए किसी शिक्षक दिवस की जरूरत नहीं है। हर दिन उनके लिए शिक्षक दिवस है। आइए रूबरू होते हैं शिक्षक दिवस पर ऐसे ही 5 शिक्षकों से, जिनकी मेहनत और लगन की कहानी आपके दिल को छु लेगी-
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आठ साल से रोज पहाड़ चढ़कर बच्चों को पढ़ाने जाता है ये शिक्षक
कुछ लोग स्कूल पैदल जाते है तो कुछ लोग साइकिल और गाड़ियों से, लेकिन सुरेश बी चालागोरी को स्कूल जाने के लिए प्रतिदिन पहाड़ पर चढ़ना होता है। बच्चों को पढ़ाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर चुके चालागोरी पिछले 8 सालों से प्रतिदिन स्कूल जाने के लिए पहाड़ की चढ़ाई करते हैं। बैरापुरा के प्राथमिक विद्यालय को अभी तक चलाने का सारा श्रेय चालागोरी को ही जाता है।

आठ साल पहले, 50 वर्षीय चालागोरी की पोस्टिंग कर्नाटक के गडग जिले में स्थित बैरापुर गांव में स्थित प्राथमिक विद्यालय में हुई थी। उस वक्त यह स्कूल बंद होने की कगार पर था। इस स्कूल में अधिकतर लंबानी जनजाति के बच्चे पढ़ते हैं। अपने तबादले के दिनों को याद करते हुए चालागोरी कहते हैं, 'स्कूल कहां था, इस बारे में कुछ नहीं पता था। मुझे बस लैंडमार्क कालकेश्वर मंदिर के बारे में बताया गया था। जब मैंने स्कूल के बारे में पूछा तो मुझे कहा गया कि पहाड़ पर चढ़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।'
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चालागोरी ने बताया कि शुरुआत में उन्हें काफी दिक्कतें हुई, लेकिन अब यह उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। चालागोरी रोज पहाड़ पर चढ़ते हैं, कभी-कभी तो उन्हें अपने साथ मिड-डे-मील का राशन, किताबें और स्टेशनरी को भी ढोना पड़ता है। इस स्कूल में सालाना लगभग 60 बच्चों का नामांकन होता है। चालागोरी ने बताया कि स्कूल में छात्रों की संख्या में कमी न आए, इसकी जिम्मेदारी मुझ पर है। स्कूल में इस वक्त तीन शिक्षक हैं, लेकिन मैं हेडमास्टर, टीचर, प्लंबर और सफाई वाले की भूमिका निभाता हूं। 

एक ऐसा शिक्षक जिसका हर छात्र आईआईटी में पढ़ता है

अपने और माता-पिता के सपनों को तो लगभग हर इंसान साकार करने की इच्छा रखता है। यह अच्छा भी है लेकिन ऐसे लोग बहुत कम होते हैं जो गरीब और अभावहीन बच्चों के सपनों को पूरा करना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लेते हैं। पटना में जन्में, पले और शिक्षित हुए आनंद कुमार ऐसे ही व्यक्ति हैं। आज दुनिया आनंद कुमार को सुपर 30 संस्था के संस्थापक के रूप में जानती है। हर साल आईआईटी रिजल्ट्स के दौरान उनके सुपर 30 की चर्चा अखबारों में खूब सुर्खियां बटोरती हैं। सन 2003 से हर साल आईआईटी में सुपर 30 से आए बच्चे सफलता हासिल कर रहे हैं। इतनी बड़ी कामयाबी आनंद कुमार को यूं ही नहीं मिली। इसके पीछे उनकी जिंदगी का लंबा संघर्ष और मजबूत इरादों की बहुत भावुक और संघर्षमयी प्रेरक कहानी है।

आनंद कुमार का परिवार बहुत साधारण मध्यवर्गीय परिवार था। पिता पोस्टल विभाग में क्लर्क थे। आनंद कुमार को गणित विषय बचपन से ही पसंद था। उनके गणित प्रेम को देखते हुए उनके शिक्षक ने उन्हें प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय भेजना चाहा लेकिन उनके पिता के देहांत और परिवार के आर्थिक तंगी के चलते यह संभव नहीं हो पाया। इस हादसे के बाद पूरे संयुक्त परिवार की जिम्मेदारी आनंद के कंधों पर आ गई। आनंद ने पैसे कमाने के लिए बच्चों को गणित पढ़ाना शुरु कर दिया। घर के खर्चे पूरे नहीं होते थे इसलिए उनकी मां ने घर में पापड़ बनाना शुरु कर दिया। आनंद रोज शाम को चार घंटे मां के बनाए पापड़ों को साइकिल में घूम-घूम कर बेचते। ट्यूशन और पापड़ से हुई कमाई से घर चलता  रहा। फिर आनंद ने गणित को आधार बनाया और रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स खोला।

शुरुआत में इस स्कूल में हर तरह की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों को कोचिंग दी जाती थी। कोई छात्र सौ रुपए देता, कोई दो सौ तो कोई तीन सौ रुपए। आनंद रख लेते, किसी से पैसे को लेकर बहस नहीं करते। आनंद ने इस कोचिंग सेंटर में दो बच्चों को पढ़ाने से शुरुआत की और देखते ही देखते बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ती चली गई और जगह कम पडऩे लगी। फिर आनंद ने एक बड़े हॉल की व्यवस्था की और पांच सौ रुपए की सालाना फीस निश्चित कर दी। लेकिन आनंद की कोचिंग में ऐसे कई छात्र आते थे जो प्रतिभावान तो थे लेकिन वो इतने गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे कि उनके पास फीस चुकाने के लिए पांच सौ रुपए भी नहीं होते थे।

इन बच्चों की स्थिति देखने के बाद आनंद के मन में सुपर 30 इंस्टीट्यूट खोलने का विचार आया। सन 2002 में आनंद ने सुपर 30 की शुरुआत की और तीस बच्चों को नि:शुल्क आईआईटी की कोचिंग देना शुरु किया। पहले ही साल यानी 2003 की आईआईटी प्रवेश परीक्षाओं में सुपर 30 के 30 में से 18 बच्चों को सफलता हासिल हो गई। इसके बाद सफलता का ग्राफ लगातार बढ़ता गया। आज आनंद राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय मंचों को संबोधित करते हैं। उनके सुपर 30 की चर्चा विदेशों तक फैल चुकी हैं। आनंद कुमार को कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है।

एक ऐसा शिक्षक जिसकी विदाई पर बच्चों समते रो पड़ा पूरा गांव

यह कहानी है उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के अवनीश की। अवनीश की यह कहानी आज के उस शिक्षक समुदाय के लिए प्रेरणा हो सकती है, जिसकी साख पर दिन-प्रतिदिन बट्टा लगता जा रहा है।

गाजीपुर जिले के बभनोली निवासी अवनीश यादव की तैनाती 2009 में देवरिया जिले में गौरी बाजार के प्राथमिक विद्यालय पिपराधन्नी गांव में हुई। यह इतना प्रदेश के पिछड़े इलाकों मे आता है। कोई भी शिक्षक यहां आने से आना-कानी करता था। लेकिन बच्चों को कुछ बेहतर बनाने और शिक्षा के प्रति जुनून  के चलते अवनीश इस गांव में शिक्षक बनकर गए।

अवनीश के जाने से पहले इस गांव में शिक्षा की स्थिति बदहाल थी। बच्चे स्कूल जाने की बजाय अपने मां-बाप के काम-काज में हाथ बंटाया करते थे। लेकिन अवनीश ने हार नहीं मानी। उन्होंने गांव में घर घर जाकर संपर्क करना शुरू किया।लोगों को पढ़ाई के गुण बताने लगे। खेल खुद से बच्चों को जागरूक करने लगे।

अवनीश के प्रयासों के चलते गांव में शिक्षा की अलख पुरे गांव में जगने लगी। गांव के लोग अवनीश को अपने बेटे की तरह मानने लगे। आखिर धीरे-धीरे ही सही, लेकिन अवनीश की मेहनत रंग लाने लगी, लोगों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे अवनीश के सरकारी स्कूल ने इलाके के सभी बड़े कॉन्वेंट स्कूल को फेल कर दिया।

धीरे-धीरे अवनीश के सरकारी स्कूल ने इलाके के सभी बड़े कॉन्वेंट स्कूल को फेल कर दिया। लेकिन अचानक एक दिन अवनीश के तबादले का आदेश आ गया। अवनीश जब गांव से विदा ले रहे थे तो उस समय पूरा गांव उन्हें विदाई देने आ गया। पूरा गांव भावुक हो गया था। अवनीश की विदाई में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा, स्कूल के बच्चों के साथ-साथ पूरे गांव के लोग रोने लगे, अवनीश भी खूब रोए। क्या बूढ़े क्या जवान क्या बच्चे हर लोगो की दशा एक तरह थी हर शख्स यही कह रहा था शिक्षक हो तो ऐसा!
 

मजदूरों के बच्चों को पढ़ाने के लिए छोड़ दी सरकारी नौकरी

संदीप राजपूत
संदीप राजपूत भी समाज के गरीब बच्चों को काबिल बनाने में जुटे हैं। संदीप बताते हैं कि वह एक निजी संस्थान में अधिकारी थे।  जिस रास्ते से वह रोजाना आते-जाते थे वहां की सड़कों के दोनों किनारों पर बसी झुग्गियां और वहां खेलते बच्चे उन्हें अपनी ओर खींचते थे। एक दिन संदीप उन बच्चों के पास गए पाया कि वहां सैकड़ों बच्चे ऐसे हैं जो स्कूल नहीं जाते। न ही उनके माता-पिता के पास इतना साधन था कि वह इन्हें पढ़ा सकें। तभी संदीप ने नौकरी छोड़ उन्हें पढ़ाने का प्रण लिया। इन बच्चों को पढ़ाने के लिए इनोवेशन मोबाइल स्कूल शुरू किया।

2000 बच्चों को दे रहे शिक्षा...
आज संदीप के मोबाइल स्कूल में 2,000 ऐसे बच्चे हैं जो प्रवासी मजदूरों और भीख मांगने वालों के हैं। ट्रैफिक रेड लाइट पर भीख मांगने वाले बच्चों को भी संदीप शिक्षित कर रहे हैं। इनके लिए सिग्नेचर टावर पर विशेष इनोवेशन मोबाइल स्कूल का सेंटर चलाया जाता है। इनोवेशन मोबाइल स्कूल की शुरूआत 25 अक्तूबर, 2010 से हुई थी। संदीप बताते हैं कि इन बच्चों को बिना किसी शुल्क के पढ़ाया जाता है। इन सभी को कॉपी, किताब, बस्ता, पेंसिल, पेन सहित अन्य पाठ्य सामग्री प्रदान की जाती है।

एक वैन में पाठ्य सामग्री को रखा जाता है। सभी सेंटरों पर यह वैन जाती है। सोहना रोड के दोनों किनारों पर बनी झुग्गियों में बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, झारखंड और राजस्थान के प्रवासी मजदूरों के परिवार रहते हैं। इनके बच्चों के लिए शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। कई किशोरों को तो अपने मां-बाप के साथ कंस्ट्रक्शन साइटों पर काम करना पड़ता था। अब इन सभी के जीवन में शिक्षा का उजियारा फैल रहा है। 
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काश इनके जैसा हो हर शिक्षक, सरकारी स्कूल को बनाया मिसाल

- फोटो : amar ujala
उत्तरांचल की राजधानी देहरादून के जूनियर हाईस्कूल देहरा के प्रधानाध्यापक हुकुम सिंह बगैर किसी सरकारी मदद के गरीब और अनाथ बच्चों के लिए आवासीय विद्यालय चला रहे हैं। खास बात यह है कि प्रदेश में सरकारी स्कूलों में जहां हर साल छात्रों की संख्या घट रही है और साढ़े चार हजार स्कूल बंदी की कगार पर हैं। वहीं, इनके विद्यालय में छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है। शिक्षक हुकुम सिंह की जिद ही थी, जो बंदी की कगार पर पहुंच चुका स्कूल आज फिर खिलखिला रहा है।

दून के सबसे पुराने विद्यालयों में से एक राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय देहरा में वर्ष 2008 में 16 छात्र पंजीकृत थे, लेकिन मुश्किल से पांच छात्र स्कूल आते थे। घटती छात्र संख्या के चलते स्कूल बंदी की कगार पर था। कालसी ब्लॉक से स्थानांतरित होकर इस स्कूल में पहुंचे हुकुम सिंह ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर न सिर्फ स्कूल को बंद होने से बचाया, बल्कि सरकार और शिक्षकों के सामने एक मॉडल प्रस्तुत किया है।

उन्होंने जर्जर हाल हो चुके स्कूल के लिए सरकार का मुंह ताके बगैर जनता से सहयोग लिया और इसे आवासीय विद्यालय के रूप में संचालित किया। अब उनके इस आवासीय विद्यालय में अनाथ, गरीब एवं स्कूल से बाहर रह गए 162 बच्चे अध्ययनरत हैं।  इस स्कूल के शिक्षकों का वेतन शिक्षा विभाग देता है, लेकिन आवासीय विद्यालय पर जो खर्च आता है, उसका वहन शिक्षक हुकुम सिंह अपने वेतन एवं कुछ अन्य लोगों के सहयोग से उठा रहे हैं। 
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