मद्रास उच्च न्यायालय ने कथित आईएसआईएस समर्थक को जमानत देने का आदेश पारित किया। क्या हिंदू धार्मिक नेताओं की हत्या को आतंकवादी कृत्य माना जा सकता है? इस सवाल पर न्यायमूर्ति एस एस सुंदर और न्यायमूर्ति सुंदर मोहन की खंडपीठ ने कहा, इस सवाल विस्तार से 'बहस' होनी चाहिए। इस विशेष मामले के संदर्भ में कथित आईएसआईएस समर्थक की जमानत याचिका पर सुनवाई के बाद अदालत ने आरोपी को कई शर्तों के साथ रिहा करने का फरमान सुनाया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, जमानत की अपील करने वाला आसिफ मुस्तहीन इरोड का निवासी है। पुलिस का आरोप है कि आसिफ उस क्षेत्र में और उसके आसपास हिंदू संगठनों के नेताओं को निशाना बनाने की ताक में था। जमानत के विरोध में दी गई दलीलों के मुताबिक आसिफ गैरकानूनी गतिविधियों का आरोपी है। आसिफ अपनी योजना को अंजाम देने के उद्देश्य से प्रतिबंधित संगठन- इस्लामिक स्टेट का सदस्य भी बनना चाहता था और इसके लिए वह एक अन्य आरोपी से लगातार संपर्क में है।
जमानत याचिका के विरोध में मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष दी गई दलीलों में कहा गया, दोनों के बीच अरबी भाषा में संदेशों का आदान-प्रदान हुआ है। इनसे पता चलता है कि वह भारत की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने की साजिश बना रहा था। हिंदू संगठनों के सदस्यों को मारना चाहता था। अभियोजन पक्ष ने आसिफ पर यूएपीए कानून की धारा 18 और 38(2) के तहत आरोप लगाए हैं।
हालांकि, जमानत के विरोध में दी गई दलीलों को खारिज करते हुए अदालत ने कहा, आपस में भेजे गए संदेशों से कहीं भी यह संकेत नहीं मिलता कि आसिफ प्रतिबंधित संगठन- आईएसआईएस का हिस्सा बन चुका था। मद्रास हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा, भले ही यह मान लिया जाए कि आसिफ आईएसआईएस का सदस्य है, टेक्स्ट मैसेज से केवल यही संकेत मिलता है कि वह दूसरे शख्स के करीब रहना चाहता था।
अदालत ने साफ किया, भले ही आरोपी दूसरे गैरकानूनी या गंभीर अपराध की साजिश कर रहा हो; किसी के साथ करीबी के आधार पर किसी व्यक्ति को आतंकवादी संगठन के साथ जोड़ना या उससे जुड़े होने का दावा करना अलग स्थिति है। पीठ ने कहा, मैसेज के अलावा, पुलिस को दो चाकू बरामद हुए हैं। इसके अलावा अभियोजन पक्ष ने अपने आरोप साबित करने के लिए आसिफ की चाकू पकड़े तस्वीरों और कटे हुआ सिर पकड़े एक अज्ञात व्यक्ति की तस्वीर पर भी भरोसा किया।