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तालिबान: क्या सीरिया की तरह अफगानिस्तान में भी दो महाशक्तियों के टकराव की स्थिति बनेगी?

Wed, 11 Aug 2021 11:00 PM IST
सुरेंद्र जोशी शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • -काबुल की तरफ कूच करने की तैयारी में तालिबान
  • -भारत ने अफगानिस्तान के हर हलचल पर बढ़ाई नजर
  • -पाकिस्तान, चीन, रूस, ईरान की चौकड़ी ने बढ़ाई सक्रियता
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तालिबान - फोटो : twitter
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विस्तार
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अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के निर्णय के बाद राष्ट्रपति जो बाइडन अपने सिर पर बड़ी बदनामी नहीं लेना चाहते। इसके समानांतर रूस, चीन, पाकिस्तान और ईरान ने अफगानिस्तान में अपने हितों को सुरक्षित रखने के प्रयास तेज कर दिए हैं। महाशक्तियों की इस रणनीतिक तैयारी में अफगानिस्तान, वहां की सरकार और तालिबान जैसे दो ध्रुवों में बंटता नजर आ रहा है। तालिबान ने अफगानिस्तान के करीब नौ प्रांतों में बढ़त ले ली है और उसकी तैयारी काबुल की तरफ कूच करने की है। ऐसे में बड़ा सवाल यह भी है कि क्या अपने हितों के लिए महाशक्तियां एक बार फिर टकराने की तैयारी कर रही हैं?

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कुंदुज पर कब्जे ने बढ़ाई चिंता
कुंदुज में तालिबान ने बढ़त ले ली है। एक लंबी जंग में अफगानिस्तान की सेना ने हथियार डाल दिए और एयरपोर्ट पर मौजूद 217 काप्स पर तालिबान की मौजूदगी ने चिंता बढ़ा दी है। बताते चलें कि उत्तरी अफगानिस्तान का यह क्षेत्र काफी अहम है। अफगानिस्तान का यह बड़ा शहर है। यह प्रांत खनिजों की खान है और पश्चिम एशिया समेत अन्य क्षेत्रों से नारकोटिक्स के कारोबार का गेटवे है। कुदुंज पहले भी तालिबान का गढ़ था। इससे उसे बेदखल करने के लिए अमेरिकी सेना ने काफी मशक्कत की थी और अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान छोड़ने के क्रम में अफगानिस्तान के निशाने पर प्रमुखता से यह शहर था। सामरिक और रणनीति के जानकार कहते हैं कि तालिबान का कुंदुज पर कब्जा किसी बड़े सपने को पाने से कम नहीं है। इसके लिए उसने पहले ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकार जमाया और फिर शहर पर कब्जा कर लिया है। यहां से काबुल समेत अफगानिस्तान के अन्य क्षेत्रों के लिए हाईवे गुजरते हैं। इसे अफगानिस्तान की सरकार और वहां की सेना के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय के सूत्र भी मानते हैं कि अब अफगानिस्तान के हालात काफी चिंता जनक होते जा रहे हैं।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए रणनीतिकारों और सामरिक विशेषज्ञों की सलाह पर भारत ने भी अपने नागरिकों को सतर्क रहने तथा समय पर भारत लौटने के लिए आगाह करना शुरू कर दिया है।
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काबुल ज्यादा दूर नहीं

कुंदुज के साथ तालिबान के कब्जे में बदख्शां प्रांत, सार-ए-पुल प्रांत की राजधानी, तखार प्रांत की राजधानी तोलोकान, निमरोज, जरांज और शबेरखान पर है। अफगानिस्तान के 60 फीसदी से अधिक हिस्से में अब तालिबान के लड़ाके बड़ी संख्या में देखे जा रहे हैं। इस तरह से पूर्वोत्तर क्षेत्र में दबदबा बनाने के साथ तालिबान की कोशिश हेरात और कंधार को कब्जे में लेने की है। 
विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी भी मानते हैं कि अफगानिस्तान की सेना तालिबानियों से निबटने में सक्षम नहीं हो पा रही है। इसके कई कारण बताए जा रहे हैं। बताते हैं अफगान सेना के पास हथियार और संसाधन की गुणवत्ता कमजोर है। अफगानिस्तान से लौटकर आए सूत्र का कहना है कि यदि इसी तरह से तालिबान ने हिंसा के जरिए कब्जे का अभियान चलाए रखा तो तीन महीने से भी कम समय में काबुल तक पहुंच सकता है। वह कहते हैं कि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अब्दुल घनी के दावे कमजोर साबित हो रही हैं। मुझे तो इसकी पूरी संभावना दिखाई दे रही है कि जल्द ही अमेरिका जैसे देशों को राष्ट्रपति घनी, पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजाई जैसे तमाम लोगों को अफगानिस्तान से सुरक्षित बाहर निकालने की जरूरत पड़ सकती है। विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार का भी कहना है कि हालात बहुत जटिल हो रहे हैं।  
 

भारत नागरिकों को जारी कर रहा है एडवाइजरी

बताते हैं कुंदुज में तालिबान की गतिविधियों को देखते हुए भारत ने अफगानिस्तान के अपने नागरिकों को लगातार सतर्क रहने, सावधान करने की कोशिश शुरू कर दी है। लोगों को संपर्क, सलाह और सहयोग के लिए विशेष फोन नंबर जारी किए जा रहे हैं और उन्हें सुरक्षा को महत्व देकर निर्णय लेने की सलाह दी जा रही है। इस बारे में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची कहते हैं कि हम वहां के हालात पर लगातार नजर बनाए हैं। भारत अपने नागरिकों और हितों की रक्षा के लिए जो भी जरूरी कदम होगा, उठाएगा। रहा सवाल सहयोग का तो भारत अफगानिस्तान में अफगानिस्तान के लोगों के हित को देखते हुए राष्ट्रपति अब्दुल घनी की सरकार का समर्थन कर रहा है। विदेश सेवा के एक अन्य सूत्र ने कहा कि हम हमेशा से व्यवस्था का सम्मान करते हैं। इसे जारी रखने की भारत की नीति रही है।

 
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पाकिस्तान, रूस, चीन, ईरान लगातार सक्रिय

अफगानिस्तान में तालिबान की सक्रियता और उसे सहयोग देने के लिए पाकिस्तान फारवर्ड प्वाइंट पर खेल रहा है। भारतीय सुरक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि जिस तरह के वीडियो फुटेज मिल रहे हैं, उससे साफ जाहिर है कि तालिबान को किसी प्रोफेशनल आर्मी या विशेषज्ञ की मदद मिल रही है। अभी कुछ सप्ताह पहले ही तालिबान के नेता चीन की राजधानी बीजिंग गए थे। दूसरी तरह ताजकिस्तान की सीमा पर मंडरा रहे खतरे को देखते हुए रूस भी लगातार सतर्क है। रूस ने चीन, पाकिस्तान, ईरान को साथ लेकर क्षेत्र में शांति और स्थिरता के प्रयास तेज कर दिए हैं। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के प्रयासों से तालिबान के नेता काफी उत्साहित लग रहे हैं। जिस तरह से प्रयासों में तेजी आ रही है, उसी तरह से तालिबान के लड़ाकों ने हमले भी तेज कर दिए हैं।

तस्वीर तो सीरिया जैसी ही दिखाई दे रही 
अफगानिस्तान में गृहयुद्ध जैसी स्थिति है। एसके शर्मा कहते हैं कि तालिबान वहां के सैन्य बलों से लड़ रहा है। अमेरिका ने बी-52 बम वर्षक विमानों से बमबारी की है, लेकिन इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। शर्मा कहते हैं कि चरमपंथी तालिबानियों को अमेरिका निशाना बनाएगा। जबकि तालिबानियों को पाकिस्तान की सेना प्रोफेशनल तरीके से मदद करती रहेगी। इस तरह की स्थिति तो जटिलता ही बढ़ाएगी।
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