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कानों देखी: तृणमूल के उम्मीदवारों में सुष्मिता देव का नाम नहीं; आखिर ममता बनर्जी के मोहभंग की वजह क्या?

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Mamata Banerjee - फोटो : Social Media
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तृणमूल कांग्रेस ने राज्यसभा के छह उम्मीदवारों की सूची जारी की है। इस सूची में कांग्रेस से तृणमूल में गई राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव का नाम नहीं था। इसने कई लोगों को चौंकाया। हालांकि, सुष्मिता देव के साथ-साथ प्रदीप भट्टाचार्य और शांता क्षेत्री को भी टिकट नहीं दिया। सुष्मिता देव कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के टीम की नेता के रूप में गिनी जाती थीं। वह असम में बराक घाटी क्षेत्र में प्रभुत्व रखती हैं। 

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जब उन्होंने कांग्रेस को छोड़ी थी, तब उनके पास पंजाब का प्रभार था। पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन अधर में लटकी राजनीति को देखकर सुष्मिता ने तृणमूल का दामन थाम लिया था। इसके बाद ममता बनर्जी ने उन्हें गोवा विधानसभा चुनाव में बड़ी जिम्मेदारी दी थी। 

बताते हैं कि सुष्मिता को तृणमूल से राज्यसभा का टिकट फिर मिलने की उम्मीद थी, लेकिन सूची जारी होने के बाद उनके पाले में निराशा आई है। कहा यह भी जा रहा है कि एक बार फिर सुष्मिता को अपनी पुरानी पार्टी अच्छी लगने लगी है। वह राजस्थान, म.प्र., छत्तीसगढ़ के हालात पर नजर रख रही हैं।  
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प्रधानमंत्री के हनुमान का भगवान महावीर करें कल्याण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को भले राम न मानते हों, लेकिन लोजपा (राम विलास) के नेता चिराग पासवान खुद को उनका हनुमान बताते हैं। चिराग को एक बार फिर अपने स्वामी पर भरोसा हो चला है। यह भरोसा तब और मजबूत दिखाई दिया, जब नित्यानंद राय ने भेंट के दौरान कुछ उम्मीदों के पंख लगाए। कुछ सलाह भी दी है। 

चिराग पासवान के लिए कहा जा रहा है कि वह केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हो सकते हैं। हालांकि चिराग के लिए केन्द्रीय मंत्री की कुर्सी मिलने और बिहार में राजनीतिक वजूद बनाए रखने में एक पेंच हैं। यह पेंच उनके चाचा पशुपति पारस हैं। पशुपति पारस लोजपा की ड्राइविंग सीट को नहीं छोड़ना चाहते। भाजपा चाहती है कि जीतन राम मांझी के एनडीए में आने के बाद अब दलित और महादलित वोटों में बंटवारा नहीं होना चाहिए। जल्द ही इस खेमे में वीआईपी के मुकेश साहनी भी शामिल होंगे। 

उधर, आरसीपी सिंह जैसे नेता भी महागठबंधन की नींव हिलाने के लिए तैयार बैठे हैं। इसके लिए जरूरी है कि चिराग अपने चाचा पशुपति से बात करके सबकुछ पहले जैसा कर लें। यह बात चिराग और पुशपति दोनों को पता है कि बिना भाजपा का साथ मिले या आपसी एकता के खिचड़ी नहीं पकने वाली है। लेकिन कहते हैं न कि ऐंठी हुई रस्सी का बल भी यू ही नहीं जाता।  

देश में जारी है चाचा-भतीजा की लड़ाई और उ.प्र. में बढ़ रहा है प्रेम
यही तो समय का पहिया है। कब घूम जाए पता नहीं। हालांकि, इसमें समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान का भी कमाल माना जा रहा है। पूरे देश में चाचा बनाम भतीजा चल रहा है। महाराष्ट्र में चाचा शरद पवार और भतीजे अजीत पवार में तलवार खिंची है। बिहार में चाचा पपशुपति पारस और भतीजे चिराग पासवान भी अभी छत्तीस के नंबर पर अटके हैं, लेकिन उप्र. में हवा ने रुख बदला है। चाचा शिवपाल भतीजे अखिलेश को केंद्र में रखकर कम कटाक्ष कर रहे हैं। 

अंदरखाने की खबर रखने वालों का कहना है कि प्रो. राम गोपाल यादव संतुलित चल रहे हैं और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को भी अपने चाचा की कीमत का एहसास हो रहा है। वह जल्द ही चाचा की जिम्मेदारी बढ़ा सकते हैं। ताकि चाचा शिवपाल यादव 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को मजबूत बना सकें। समाजवादी पार्टी के एक रणनीतिकार कहते हैं कि स्थिति 2004 वाले लोकसभा चुनाव जैसी बन रही है। हम पूरी ताकत से लड़े तो लोकसभा की 25 सीटों की संख्या पार कर सकते हैं।

सब जानना चाहते हैं कि कैसे मान गए सचिन पायलट?
कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव से पहले अशोक गहलोत पार्टी की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिले थे। तब उन्होंने बाहर आकर अपने करीबी से कहा था कि वह अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे और सचिन पायलट को सीएम नहीं बनने देंगे। सूत्र बताते हैं कि गहलोत अब अपनी इस राजनीतिक क्षमता पर मुस्करा रहे हैं। फिलहाल सचिन पायलट और अशोक गहलोत में जारी तकरार एक बार खत्म होने की सूचना दी जा रही है। सचिन पायलट भी मिलकर चुनाव लड़ने और कांग्रेस की सरकार फिर सत्ता में लाने का दावा कर रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि आखिर सचिन पायलट कैसे मान गए?

24, अकबर रोड के अंदरखाने से पता चला है कि सचिन पायलट ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का बड़ा भरोसा पाया है। मल्लिकार्जुन खडग़े और केसी वेणुगोपाल ने भी बड़ी सहानुभूति दिखाई। सचिन पायलट ने आगामी विधानसभा चुनाव में अपने 50 से अधिक करीबी उम्मीदवारों को टिकट दिलाने और इस पर गंभीरता से विचार का भरोसा पाया है। बताते हैं कि यह तय हुआ है कि विधानसभा चुनाव के बाद अशोक गहलोत को राष्ट्रीय राजनीति में आना होगा। एक भरोसा यह भी है कि कांग्रेस राजस्थान में अपने नेताओं के चेहरे पर चुनाव लड़ेगी। सचिन पायलट का चेहरा भी प्रमुखता से रहेगा। जयपुर वाले भविष्यवाणी नहीं करना चाहते। जबकि जोधपुर वाले कहते हैं कि इंतजार कीजिए। आगे बात तो अक्तूबर में करेंगे।

कब होगी विपक्षी एकता की बैठक?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुस्करा रहे हैं। उनके मुस्कराने की सबसे बड़ी वजह विपक्षी एकता की अगली बैठक का फैसला कांग्रेस की मनमर्जी से लेना रहा है। इधर कांग्रेस ने यह जिम्मेदारी ओढ़ी और उधर विपक्ष में राजनीतिक हलचल तेज हो गई। महाराष्ट्र में एनसीपी ही टूट गई। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बिहार के नेताओं को आश्वस्त किया है कि यह बैठक होगी। 

माना जा रहा है कि विपक्षी एकता की एक बैठक अब संसद के मानसून सत्र के दौरान होगी। इस बार यह बैठक दिल्ली में होने की उम्मीद बन रही है। लेकिन इसके लिए कांग्रेस के रणनीतिकार जरा संभलकर चल रहे हैं। केन्द्र सरकार ने संसद का मानसून सत्र आरंभ होने से पहले 19 जुलाई को सर्वदलीय बैठक बुलाई है। इसी बैठक के बाद संसदीय कामकाज को लेकर मल्लिकार्जुन खरगे की अध्यक्षता में विपक्षी नेताओं की भी बैठक होगी।  

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