सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि वह कोरोना महामारी के नाम पर अस्पतालों द्वारा भवन उपयोग नियम के उल्लंघन को माफ नहीं करेगा। यह कहते हुए शीर्ष अदालत ने गुजरात सरकार द्वारा इसी साल जुलाई में जारी उस अधिसूचना पर रोक लगा दी, जिसके जरिए राज्य के उन अस्पतालों और प्रतिष्ठानों को सीलिंग आदि कार्रवाई से मार्च 2022 तक के लिए संरक्षण दिया गया था, जिनके पास 'भवन उपयोग' का परमिट नहीं था।
गुजरात सरकार के वकील का तर्क था कि कोविड-19 की तीसरी लहर आने की आशंका को ध्यान में रखते हुए सात जुलाई को अधिसूचना जारी की गई थी। इसके पीछे व्यावहारिक दृष्टिकोण था। इस तर्क को नामंजूर करते हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने कहा कि नियमों के इस तरह से उल्लंघन को राज्य द्वारा माफ नहीं किया जा सकता है, क्योंकि राज्य को अपने नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
अस्पतालों में आग की घटना का किया उल्लेख
पीठ ने भरूच, अहमदाबाद, सूरत और राजकोट के कोविड अस्पतालों में आग की घटनाओं का उदाहरण भी दिया, जिनमें कई लोगों की जान चली गई थी। भवन उपयोग की अनुमति को आवश्यकता को अग्नि सुरक्षा के समान बताते हुए पीठ ने कहा, 'भवन उपयोग की अनुमति यह सुनिश्चित करने के लिए है कि ढांचा कानून के तहत तय किए गए मानदंडों को पूरा करता हो।'
डेवलपरों, योजना प्राधिकरणों व अधिकारियों में माफिया संबंध
पीठ ने कहा, 'आप भवन की पांचवीं मंजिल से बिना लिफ्ट के नर्सिंग होम संचालित नहीं कर सकते।' पीठ ने कहा कि पिछले दो दशकों से गुजरात हाईकोर्ट ने कई आदेश पारित कर राज्य में भवन प्रतिष्ठानों को भवन उपयोग की अनुमति का पालन करने को कहा है। यहां तक कि शीर्ष अदालत ने भी इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया और सभी राज्यों को अस्पतालों का अग्नि सुरक्षा ऑडिट करने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि एक के बाद एक कई मामलों में हम देखते हैं कि डेवलपरों, योजना प्राधिकरणों और कानून का अमल कराने वाले अधिकारियों के बीच माफिया संबंध हैं।
अहमदाबाद मेडिकल एसोसिएशन की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कड़ा रुख अपनाया। पीठ ने कहा कि लोगों को महामारी से बचाने के प्रयास में हम उन्हें आग से मार रहे हैं। यदि दो कमरों को अस्पताल में परिवर्तित किया जाता है, तो अनुमति आवश्यक है। हम उन लोगों की जान जोखिम में नहीं डाल सकते जिन्हें सुरक्षा की जरूरत है।