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Supreme Court: 'डॉक्टरों पर हर हमले की निगरानी नहीं कर सकते', सुप्रीम कोर्ट का याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार

Wed, 23 Apr 2025 04:56 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों पर हमलों से बचाव के लिए नए दिशानिर्देश बनाने की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार किया और कहा कि हर मामले की निगरानी करना कोर्ट का काम नहीं है। कोर्ट ने बताया कि पहले ही इस विषय पर दिशानिर्देश दिए जा चुके हैं और अगर उनका पालन नहीं हो रहा है, तो याचिकाकर्ता अन्य कानूनी रास्ता अपनाएं।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को डॉक्टरों पर बढ़ते हमलों से रक्षा के लिए दिशानिर्देश बनाने की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार कर दिया। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि हर चीज की निगरानी करना कोर्ट का काम नहीं है। जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला दिया और कहा कि ऐसे मामलों से संबंधित दिशानिर्देश पहले ही बनाए जा चुके हैं और याचिकाकर्ता अगर चाहें तो उचित कानूनी प्रक्रिया अपना सकते हैं।

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बेंच ने कहा, आप सुप्रीम कोर्ट से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह हर काम और गतिविधि पर नजर रखे। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने जब डॉक्टरों पर हो रहे हमलों का जिक्र किया, तो बेंच ने कहा, ये सभी घटनाएं बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट यहां बैठकर हर एक घटना की निगरानी नहीं कर सकता। 

याचिकाएं 2022 में दायर की गई थीं, जिनमें डॉक्टरों पर बढ़ते हमलों का जिक्र करते हुए उनकी सुरक्षा के लिए व्यापाक दिशानिर्देश बनाने की मांग की गई थी। 
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एक याचिका में राजस्थान के दौसा में एक महिला डॉक्टर (गाइनोकॉलजिस्ट) की आत्महत्या की घटना की सीबीआई जांच की मांग की गई थी। महिला डॉक्टर ने उस समय आत्महत्या कर ली थी, जब डिलीवरी के दौरान ज्यादा खून बहने से एक मरीज की मौत हो गई और उसके बाद उन्हें  भीड़ ने परेशान किया।

याचिकाकर्ताओं की तरफ से बुधवार को पेश एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट के 21 अक्टूबर 2022 के आदेश का जिक्र किया, जिसमें कोर्ट ने केंद्र सरकार और अन्य को नोटिस भेजकर जवाब मांगा था। एक वकील ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने चाहे कोई फैसला भी दिया हो, लेकिन जमीनी हालात नहीं बदले।

इस पर बेंच ने पूछा, तो फिर दोबारा दिशानिर्देश बनाने से क्या फायदा? जब वकील ने कहा कि संसद ने भी इस मुद्दे पर विचार किया है, तो बेंच ने कहा,यह काम संसद का है।

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जब वकील ने दलील दी कि पुलिस को डॉक्टरों पर हमलों के मामलों से निपटने की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए, तो कोर्ट ने कहा, ये सब नीति से जुड़े मामले हैं। याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणनने कहा कि चिंता इस बात की है कि देशभर में कई थाने मरीज के उपचार के दौरान मौत होने पर डॉक्टरों के खिलाफ मामला दर्ज कर लेते हैं।

इस पर बेंच ने पूछा, ऐसा आम आरोप सभी थानों पर कैसे लगाया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपने पुराने फैसले में दिशानिर्देश जारी कर चुका है और अगर उनका पालन नहीं किया जाता तो वह अवमानना मानी जाएगी। कोर्ट ने कहा, ऐसे आम निर्देश कैसे दिए जा सकते हैं? 

उम्रकैद की सजा काट रहे चार दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका
उम्रकैद की सजा काट रहे चार दोषियों ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने दावा किया झारखंड हाईकोर्ट ने 2022 में उनकी सजा के खिलाफ अपीलों पर आदेश सुरक्षित रखे थे, लेकिन फैसला नहीं सुनाया। जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने उनकी याचिका पर विचार करने पर सहमति दी और हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से उन सभी मामलों पर सील बंद रिपोर्ट मांगी, जिनमें फैसला सुरक्षित रखा गया था, लेकिन दो महीने से अधिक समय तक फैसला नहीं सुनाया गया। 

चारों दोषियों की ओर से वकील फौजिया शकील ने यह कहते हुए जमानत की मांग की कि उनमें से एक दोषी पिछले 16 साल से जेल में है। बेंच ने जमानत याचिका पर नोटिस जारी किया और सरकार से प्रतिक्रिया मांगी। याचिका में कहा गया, याचिकाकर्ता वर्तमान में रांची के हटवार स्थित बिरसा मुंडा केंद्रीय जेल में बंद हैं। उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट में अपनी सजा को चुनौती देते हुए आपराधिक अपीलें दायर की थीं, और जबकि उनकी अपीलें सुनी गईं और 2022 में फैसले सुरक्षित रखे गए थे, हाई कोर्ट ने अब तक फैसले नहीं सुनाए हैं, जबकि 2 से 3 साल का समय बीत चुका है।

सेंथिल बालाजी को सुप्रीम चेतावनी, मंत्री पद नहीं छोड़ा तो जमानत कर देंगे रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने डीएमके नेता वी सेंथिल बालाजी से बुधवार को कहा कि उन्हें पद और आजादी में से किसी एक को चुनना होगा। शीर्ष अदालत ने उन्हें चेतावनी दी कि यदि उन्होंने तमिलनाडु में मंत्री पद नहीं छोड़ा तो उनकी जमानत रद्द कर दी जाएगी। जस्टिस अभय एस ओका व जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने इस तथ्य पर आपत्ति जताई कि नौकरी के लिए नकदी घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जमानत के कुछ दिनों बाद ही बालाजी को तमिलनाडु के कैबिनेट मंत्री के रूप में बहाल कर दिया गया था। पीठ ने कहा, इस बात की गंभीर आशंका है कि आप हस्तक्षेप करेंगे और गवाहों को प्रभावित करेंगे। आपको पद (मंत्री) और स्वतंत्रता के बीच चुनाव करना होगा। आप क्या चुनाव करना चाहते हैं, हमें बताएं। पीठ ने पिछले फैसले का हवाला दिया जिसमें दर्ज किया गया था कि उन्होंने लोगों को अपने खिलाफ शिकायतें वापस लेने के लिए मजबूर किया।

जमानत का मतलब लोगों को प्रभावित करने की शक्ति नहीं...
पीठ ने कहा, जमानत देने का मतलब गवाहों को प्रभावित करने की शक्ति नहीं है। अतीत में, आपने गवाहों को प्रभावित किया है। जब आप मंत्री थे, मंत्री के रूप में आपके खिलाफ ऐसे कठोर निष्कर्ष दर्ज किए गए हैं तो आपके खिलाफ जिस तरह से समझौता किया गया था, उसके बारे में स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज किए गए थे और कार्यवाही रद्द कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने बालाजी के पिछले आचरण के आधार पर उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला पाया, जिससे पता चलता है कि उन्होंने गवाहों के काम में हस्तक्षेप किया और उन्हें प्रभावित किया। अब आप उसी स्थिति में वापस चले गए हैं, जहां मंत्री के तौर पर आप प्रभाव डाल पाएंगे। हमने आपको बिल्कुल अलग आधार पर जमानत दी है।

याद रखिए आपको योग्यता के आधार पर जमानत नहीं मिली
पीठ ने सेंथिल के वकील मुकुल रोहतगी से कहा, आपको एक बात याद रखनी चाहिए। उन्हें योग्यता के आधार पर जमानत नहीं दी गई थी। उन्हें संविधान के अनुच्छेद 21 के संभावित उल्लंघन के आधार पर जमानत दी गई थी। रोहतगी ने कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष निष्कर्ष नहीं है। तमिलनाडु सरकार की ओर से कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर गवाहों को प्रभावित करने की कोई संभावना है तो मुकदमे को राज्य से बाहर स्थानांतरित किया जा सकता है। हालांकि पीठ ने इससे असहमति जताई और कहा कि इससे कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

हमसे गलती हुई, आपके खिलाफ फैसलों को नजरअंदाज किया : जस्टिस ओका
जस्टिस ओका ने कहा, हम आदेश में यह लिखेंगे कि हमने आपके खिलाफ फैसलों को नजरअंदाज करके गलती की है, क्योंकि पूरी सुनवाई इस आधार पर हुई कि वह अब मंत्री नहीं हैं। हम अपनी गलती स्वीकार करेंगे। ईडी की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपने हलफनामे का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि बालाजी ने गवाहों को प्रभावित किया। सिब्बल ने जब कहा कि बालाजी के गवाहों को प्रभावित करने की कोई संभावना नहीं है, तो पीठ ने कहा, आप (बालाजी) गवाहों को आने से रोक रहे हैं।

नामांकन रद्द होने को चुनौती वाली छात्रा की याचिका खारिज; जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में अधिक उम्र का मामला
सुप्रीम कोर्ट ने 25 अप्रैल को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव लड़ने के लिए उसके नामांकन की अस्वीकृति को चुनौती वाली एक छात्रा की याचिका खारिज कर दी। जस्टिस विक्रम नाथ व जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने उस नियमन में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया, जो 25 वर्ष से अधिक    आयु के उम्मीदवारों को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) चुनाव लड़ने से रोकता है।

पीठ ने शुरू में छात्रा के वकील से दिल्ली हाईकोर्ट जाने को कहा था, लेकिन बाद में याचिका पर सुनवाई की और उसे खारिज कर दिया। प्रथम वर्ष की स्नातकोत्तर छात्रा रितु अनुभा सी ने जेएम लिंगदोह समिति के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए दावा किया कि जेएनयू का शैक्षणिक सत्र शुरू होने के छह से सात सप्ताह के भीतर छात्र संघ चुनाव कराना दायित्व है।

छात्रा के वकील ने कहा, अगर जेएनयू प्रशासन ने सितंबर में चुनाव कराए होते, जैसा कि आमतौर पर होता है तो वह चुनाव लड़ने के योग्य होती। वकील ने कहा, अब वह 25 साल से थोड़ी अधिक उम्र की हो गई है, उसके नामांकन पत्र को उसकी कोई गलती न होने पर भी खारिज कर दिया गया।

क्या अधिक उम्र वाले अब लड़ने का अधिकार मांगें
पीठ ने कहा, कई विश्वविद्यालयों ने कोविड-19 के दौरान चुनाव नहीं कराए। क्या इसका मतलब यह है कि अधिक उम्र वाले बाद में चुनाव लड़ने का अधिकार मांग सकते हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं और यह याचिका खारिज की जाती है। जेएनयूएसयू चुनाव 25 अप्रैल को होने हैं और जेएनयू को स्कूल काउंसलर के पद के लिए 250 और जेएनयूएसयू के चार केंद्रीय पैनल पदों के लिए 165     नामांकन प्राप्त हुए हैं।

एफआईआर के बाद सीबीआई जांच के निर्देश को नहीं दे सकते चुनौती : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने और उसके बाद की जांच के बाद सीबीआई जांच के निर्देश को संभावित संदिग्धों या आरोपियों की ओर से चुनौती नहीं दी जा सकती है। शीर्ष अदालत ने एक फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं, जिसमें उसने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें सीबीआई को 2019 में बंगलूरू स्थित रियल एस्टेट कारोबारी के रघुनाथ की कथित हत्या की गहन जांच करने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस दीपांकर दत्ता व जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली कई आरोपी पक्षों की आपराधिक अपीलों को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा, हमारा मानना है कि एक बार एफआईआर दर्ज होने और जांच हो जाने के बाद, सीबीआई की ओर से जांच के निर्देश को आरोपी की ओर से चुनौती नहीं दी जा सकती। किसी विशेष एजेंसी को जांच सौंपने का मामला मूल रूप से न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है। 

दहेज उत्पीड़न में पति के रिश्तेदारों पर आरोप लगाने का चलन बढ़ा
दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि पत्नी की ओर से पति के रिश्तेदारों पर आरोप लगाने का चलन बढ़ रहा है। एक महिला की ओर से अपने सास-ससुर के खिलाफ दर्ज कराए दहेज उत्पीड़न के मामले को शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि ऐसा लगता है कि महिला की ननद, पति और ससुर के खिलाफ सर्वव्यापी थे। हालांकि, महिला ने शारीरिक यातना का कोई आरोप नहीं लगाया गया। 

बंगाल विजयवर्गीय व अन्य के खिलाफ जांच रिपोर्ट पेश करे  
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को राज्य में उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों में भाजपा नेताओं कैलाश विजयवर्गीय, अर्जुन सिंह और अन्य के खिलाफ जांच की स्थिति पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। जस्टिस अभय एस ओका व जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि अपील 2020 में दायर की गई थी और राज्य को एक महीने के भीतर एक व्यापक हलफनामा दायर कर मामले में जांच के चरण के बारे में सूचित करना होगा। शीर्ष अदालत ने उनकी अंतरिम सुरक्षा की सुनवाई की अगली तारीख 23 जुलाई तक बढ़ा दी।

विकास यादव की मां को कुछ हुआ तो क्या दिल्ली सरकार जिम्मेदारी लेगी : सुप्रीम कोर्ट
नीतीश कटारा हत्याकांड के दोषी विकास यादव की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से पूछा, अगर विकास यादव की मां को कुछ हो जाता है तो क्या आप इसकी जिम्मेदारी लेंगे? 2002 में हुई हत्या के मामले में 25 साल कैद की सजा काट रहे विकास यादव ने बीमार मां की देखभाल के लिए अंतरिम जमानत मांगी है। जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने अंतरिम जमानत देने के संकेत देते हुए दिल्ली सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी से कहा कि वह यादव पर सख्त प्रतिबंध लगाएगी। पीठ ने भाटी से कहा कि यादव ने 23 साल जेल में काटे हैं। क्या हमें उसकी मां की हालत को ध्यान में रखते हुए उसे अस्थायी जमानत देने का अधिकार नहीं है। मां का क्या दोष है। अगर उसकी मां को कुछ हो जाता है तो क्या आप इसकी जिम्मेदारी लेंगे। जमानत का विरोध करते हुए भाटी ने कहा कि सजायाफ्ता प्रभावशाली व्यक्ति है और उसने मेडिकल आधार पर मिली अपनी जमानत का दुरुपयोग किया है। अब इस मामले में अगली सुनवाई 24 अप्रैल को होगी।

बीपीएससी मेन्स परीक्षा पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने 25 अप्रैल को होने वाली बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) की मुख्य परीक्षा पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया। पिछले साल 13 दिसंबर को प्रारंभिक परीक्षा के दौरान प्रश्नपत्र लीक होने का आरोप लगाने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने 70वींबीपीएससी संयुक्त प्रतियोगी प्रारंभिक परीक्षा को रद्द करने की मांग करने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अंजना प्रकाश ने तर्क दिया कि व्हाट्सएप मैसेज और वीडियो क्लिप सहित डिजिटल साक्ष्यों से पता चलता है कि परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र लीक हो गए थे। उन्होंने कहा कि ऐसे ही एक वीडियो में कथित तौर पर एक परीक्षा केंद्र पर लाउडस्पीकर के जरिये उत्तरों की घोषणा की जा रही थी। बिहार सरकार और बीपीएससी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने परीक्षा प्रणाली की अखंडता का बचाव किया।

52 छात्राओं के यौन उत्पीड़न के आरोपी शिक्षक के खिलाफ पॉक्सो केस बहाल
सुप्रीम कोर्ट ने केरल के एक शिक्षक के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत बुधवार को मुकदमा बहाल कर दिया। शीर्ष अदालत ने उसके खिलाफ मामला रद्द करने के केरल हाईकोर्ट की दलील को ‘असंवेदनशील’ करार दिया। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्कूल प्रशासन को आदेश दिया कि वह 52 छात्राओं के यौन उत्पीड़न के आरोपी निलंबित शिक्षक को मामले की सुनवाई पूरी होने तक बहाल न करे। इसके परिणामस्वरूप शीर्ष अदालत ने आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी रद्द करने के हाईकोर्ट के 13 जुलाई, 2022 के फैसले को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह मामला पॉक्सो और संभवतः आईपीसी के कुछ प्रावधानों के तहत प्रथम दृष्टया अपराध के पीड़ितों के उत्पीड़न का एक ज्वलंत उदाहरण है। हाईकोर्ट प्रारंभिक चरण में पीड़ितों की ओर से कथित रूप से दिए गए बयानों की सामग्री को नोट करने सहित एक मिनी ट्रायल करने के बाद, इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ‘यह अनुमान लगाना संभव नहीं है कि उक्त कार्य याचिकाकर्ता के किसी भी यौन इरादे से किया गया है।

आदेश में कहा गया कि हम इस बात से निराश हैं कि हाईकोर्ट ने असंवेदनशील तरीके से काम किया है, इस तथ्य की अनदेखी करते हुए कि प्रतिवादी नंबर-1 शिक्षक था और पीड़ित उसके छात्र थे। शीर्ष अदालत ने कहा कि पीड़ितों की ओर से पुलिस के समक्ष दर्ज कराए गए प्रारंभिक बयानों से प्रथम दृष्टया पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराध का पता चलता है। शीर्ष अदालत इस बात से आश्चर्यचकित थी कि शिक्षक ने एक पीड़ित के साथ कथित रूप से समझौता करने के बाद एफआईआर को रद्द करने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

ड्रग्स बिक्री की रकम लश्कर-ए-ताइबा के काम आई, कारोबारी को न मिले जमानत
सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने 21 हजार करोड़ रुपये के मुंद्रा बंदरगाह ड्रग बरामदगी मामले में गिरफ्तार दिल्ली के कारोबारी की जमानत याचिका का विरोध किया। एनआईए ने कहा, बिक्री से प्राप्त राशि का इस्तेमाल लश्कर-ए-ताइबा की आतंकी गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए किया गया था। जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हरप्रीत सिंह तलवार उर्फ कबीर तलवार की जमानत याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। तलवार नई दिल्ली में एक लोकप्रिय क्लब चलाता था और उसे एजेंसी ने अगस्त, 2022 में देश में सबसे बड़ी ड्रग बरामदगी के मामले में गिरफ्तार किया था। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा, ये संगठन के मुखौटा लोग हैं लेकिन आतंकवादी हमलों में जान गंवाने वाले निर्दोष लोगों का खून भी इनके हाथों पर है। यह अर्ध-प्रसंस्कृत टैल्क स्टोन (एक कच्चा माल जिसका व्यापक उपयोग होता है) के रूप में वैध आयात के रूप में भारत में नार्को कंसाइनमेंट (हेरोइन) भेजने का एक परीक्षण मामला था। एनआईए ने एक हलफनामे में कहा, उक्त अर्ध-प्रसंस्कृत टैल्क स्टोन हेरोइन से लदे स्टोन थे, जिन्हें नई खुली प्रोपराइटर फर्मों और शेल कंपनियों के नाम पर भारत में आयात किया गया था, जिन्होंने इस हेरोइन से लदे अर्ध-प्रसंस्कृत टैल्क स्टोन को एक व्यापारिक वस्तु के रूप में दिखाया। इस खेप की बिक्री से हुई कमाई का इस्तेमाल लश्कर-ए-तैयबा के वित्तपोषण में किया गया।

1984 सिख विरोधी दंगे : ड्यूटी में लापरवाही के आरोपी पुलिसकर्मी को सुप्रीम राहत, मिलेंगे सभी पेंशन लाभ
सुप्रीम कोर्ट ने एक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी जिन पर 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान कर्तव्य का परित्याग करने व कदाचार का आरेाप लगा था, को राहत प्रदान की। शीर्ष अदालत ने पूर्व पुलिस अधिकारी को पेंशन में संशोधन समेत सभी परिणामी लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया। जस्टिस पीएस नरसिम्हा व जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने किंग्सवे कैंप पुलिस स्टेशन के तत्कालीन स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) दुर्गा प्रसाद की अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि गिरफ्तारियां की गईं, लाठीचार्ज किया गया और गोलीबारी की गई। प्रसाद ने अपनी याचिका में दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अनुशासनात्मक प्राधिकारी को उनके खिलाफ सजा का नया आदेश जारी करने का निर्देश दिया गया था। प्रसाद पर उनके विभाग ने एसएचओ के रूप में उनके अधीन आने वाले क्षेत्र में दंगों को नियंत्रित करने में कर्तव्य की उपेक्षा या लापरवाही का आरोप लगाया गया था। पीठ ने इस बात पर गौर किया कि सीमित संख्या में उपलब्ध बल को देखते हुए, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों और संभावित लक्ष्यों को बचाने पर ध्यान केंद्रित किया गया। पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता के तत्काल वरिष्ठ, जो बचाव पक्ष के गवाह के रूप में पेश हुए, ने कहा कि अपीलकर्ता ने उपलब्ध संसाधनों के साथ सराहनीय काम किया।
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सुप्रीम कोर्ट ने 250 छात्रों का कॅरिअर बचाने के लिए अनुच्छेद 142 का किया इस्तेमाल
सुप्रीम कोर्ट ने 250 छात्रों के शैक्षणिक कॅरिअर को बचाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किया। छात्र अपने संस्थान के परिसर को स्थानांतरित करने के कारण बाधाओं का सामना कर रहे थे। संविधान का अनुच्छेद 142 शीर्ष अदालत को उसके समक्ष लंबित किसी भी मामले में ‘संपूर्ण न्याय’ के लिए आवश्यक कोई भी आदेश या डिक्री पारित करने का अधिकार देता है। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ मंगलूरू स्थिति एक ऐसी संपत्ति से जुड़े मामले में सुनवाई कर रही थी, जिसमें होटल प्रबंधन संस्थान संचालित होता है।

पीठ ने कहा, एक ओर जहां अपीलकर्ता को वर्तमान परिसर खाली करना है, वहीं दूसरी ओर जहां उसे अपने संस्थान परिसर स्थानांतरित करना है, वह जगह तैयार नहीं है। इसलिए अपीलकर्ता को अपना संस्थान किसी अस्थायी जगह पर स्थानांतरित करना होगा। फैसले में कहा गया, हमें लगता है कि यह एक उचित मामला है, जिसमें इस अदालत को न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने असाधारण अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करना चाहिए। यदि हम इस शक्ति का उपयोग नहीं करते, तो लगभग 250 छात्रों का कॅरिआर खतरे में पड़ जाएगा। ब्यूरो

शीर्ष अदालत ने एआईसीटीई और मैंगलोर विश्वविद्यालय को दिया निर्देश
प्रबंधन संस्थान के वकील ने कहा कि संस्थान को स्थायी रूप से एक नए स्थान पर स्थानांतरित किया जाना था, लेकिन नए परिसर के अधूरे निर्माण के कारण संस्थान को किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित करने की व्यवस्था की गई। अपीलकर्ता ने अदालत से एआईसीटीई और मैंगलोर विश्वविद्यालय को उचित निर्देश जारी करने की मांग की, ताकि उन्हें अस्थायी स्थान पर स्थानांतरित करने और दो साल से अधिक की अवधि के लिए वहां पाठ्यक्रम संचालित करने की अनुमति दी जा सके।

परिणामस्वरूप, पीठ ने एआईसीटीई और मैंगलोर विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि वे अब से दो वर्ष की अवधि तक अपीलकर्ता को अपने संस्थान को ऐसे स्थान पर स्थानांतरित करने की आवश्यकता के अनुपालन पर जोर न दें, जो या तो उसके स्वामित्व में हो या जिसके संबंध में 30 वर्ष से अधिक की अवधि के लिए पट्टा मौजूद हो।
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