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सुप्रीम कोर्ट: केवल रिक्तियां होने से पदोन्नति का अधिकार नहीं मिल जाता

Wed, 09 Mar 2022 02:48 AM IST
Jeet Kumar अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।

सार

शीर्ष अदालत ने कहा है कि पदोन्नति का अधिकार और उसके बाद के लाभ व वरिष्ठता केवल उक्त पदोन्नति को नियंत्रित करने वाले नियमों से तय होगी न कि अलग नियम से।
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सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : PTI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि जब किसी पदोन्नति से भरे जाने वाले पद से संबंधित रिक्तियां विशेष नियमों के तहत निर्धारित हों तो केवल रिक्तियां उपलब्ध होने मात्र से किसी कर्मचारी को पूर्व प्रभाव से पदोन्नति का अधिकार नहीं मिल जाता। संबंधित विशेष नियमों में चयन प्रक्रिया के माध्यम से दी गई मंजूरी भी शामिल है। 

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जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने कहा, पदोन्नति के मामले में दो अलग-अलग नियमों के बीच कभी समानता नहीं हो सकती। शीर्ष अदालत ने कहा है कि पदोन्नति का अधिकार और उसके बाद के लाभ व वरिष्ठता केवल उक्त पदोन्नति को नियंत्रित करने वाले नियमों से तय होगी न कि अलग नियम से।

पीठ ने केंद्र द्वारा दायर उस अपील को स्वीकार कर लिया जिसमें हाईकोर्ट के एक फैसले पर सवाल उठाया गया था। केंद्र का कहना था कि हाईकोर्ट ने एक अधिकारी के पक्ष में राहत देने में एक मौलिक त्रुटि की है, जो वर्ष 2010 में स्वेच्छा से सेवानिवृत्त हुए जबकि पदोन्नति वर्ष 2011 में उत्पन्न रिक्तियों के लिए वर्ष 2012 में चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रदान की गई थी।
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यह मामला जूनियर प्रशासनिक ग्रेड-1 अधिकारियों की आईएएस के रूप में पदोन्नति से संबंधित था। केंद्र सरकार की याचिका पर सहमति जताते हुए पीठ ने कहा, एक बार जब कोई अधिकारी स्वेच्छा से सेवानिवृत्त हो जाता है तो नियोक्ता और कर्मचारी के बीच ‘गोल्डन हैंडशेक’ वाले न्यायिक संबंध समाप्त हो जाते हैं। ऐसे पूर्व कर्मचारी अपने अतीत और भविष्य के अधिकारों को लेकर वाद- विवाद नहीं कर सकते।

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न्यायिक विस्टा स्थापित करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को शीर्ष अदालत के मौजूदा परिसर के आसपास एक ‘न्यायिक विस्टा’ बनाने और देश भर की अदालतों में न्यायिक बुनियादी ढांचे को वित्त पोषित करने के लिए एक केंद्रीय प्राधिकरण के गठन को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है।

जस्टिस विनीत शरण और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सचिव व वकील अर्धेंदुमौली कुमार प्रसाद द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार के कानून एवं न्याय मंत्रालय, आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालयों और सुप्रीम कोर्ट के महासचिव से जवाब मांगा है। 

याचिका में कहा गया है कि न्यायिक विस्टा का निर्माण न्यायाधीशों, बार के सदस्यों, शीर्ष अदालत के अधिकारियों और अदालत परिसर में आने वाले वादियों के लिए बेहतर और सम्मानजनक कामकाजी परिस्थितियों तक पहुंच प्रदान करेगा। 

याचिका में केंद्र को न्यायिक बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण के लिए एक स्वतंत्र केंद्रीय प्राधिकरण का गठन करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। याचिका में आने वाले कई दशकों के लिए बार और बेंच की जरूरतों को पूरा करने के लिए न्यायपालिका के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने की मांग की गई है। 

याचिकाकर्ता ने वीडियो कान्फ्रेंसिंग सुविधा के साथ 45-50 कोर्ट रूम, वकीलों के लिए 5000 चैंबर, लगभग 10000 कारों के लिए भूमिगत मल्टी-लेवल पार्किंग समेत अन्य सुविधाओं के साथ एक बहु-स्तरीय परिसर की मांग की है।
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