बाल विवाह को गंभीर सामाजिक बुराई बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसे रोकने और नियंत्रित करने के लिए कई निर्देश जारी किए हैं। शीर्ष अदालत ने जिला स्तर पर बाल विवाह निधेष अधिकारी (सीएमपीओ) को नियुक्त करने को कहा है, जो सिर्फ बाल विवाह को रोकने के लिए काम करेगा। कोर्ट ने यह भी कहा है कि देशभर में जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक अपने जिले में बाल विवाह को रोकने के लिए जिम्मेदार होंगे। लेकिन यह कहने से परहेज किया कि यह कानून पर्सनल लॉ पर हावी होगा। पर्सनल लॉ बाल विवाह को अनुमति देते हैं।
पीसीएमए की सफलता के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
कोर्ट ने कहा है कि पीसीएमए एक सामाजिक कानून है, जिसकी सफलता के लिए सभी हितधारकों के सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है। कोर्ट ने समुदाय-संचालित रणनीतियों की आवश्यकता पर बल दिया और अभियोजन की तुलना में रोकथाम पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। पीठ ने कहा कि इसलिए निवारक रणनीतियों को बाल विवाह के मूल कारणों, जैसे गरीबी, लैंगिक असमानता, शिक्षा की कमी को दूर करने के लिए तैयार किया जाना चाहिए।
क्या कहता है मुस्लिम पर्सनल लॉ
मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 से संचालित होने वाला मुस्लिम पर्सनल लॉ नाबालिग के साथ शादी की अनुमति देता है। इस कानून में साफ तौर पर कहा गया है कि प्यूबर्टी की उम्र ( जिसे 15 साल मानी जाती है) और वयस्कता की उम्र समान है। 1937 के कानून की धारा 2 में प्रावधान है कि सभी विवाह शरीयत के तहत आएंगे, भले ही इसमें कोई भी रीति-रिवाज और परंपरा अपनाई गई हो। यह कानून विवाह, तलाक, विरासत और रखरखाव के मामलों में इस्लामी कानून को लागू करने को मान्यता देता है।
बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006
यह अधिनियम दूल्हे और दुल्हन में किसी एक की भी उम्र विवाह योग्य न होने पर इसे बाल विवाह के रूप में परिभाषित करता है। इसके तहत 18 वर्ष या उससे कम उम्र की बच्चियों और 21 साल या उससे कम उम्र के लड़के को बच्चे के तौर पर संदर्भित किया गया है। बाल विवाह को किसी भी एक पक्ष की ओर से कोर्ट में चुनौती दिए जाने पर यह कानून उसे रद्द करने का अधिकार देता है।