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किसान आंदोलन: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मामला विचाराधीन होने पर भी विरोध का अधिकार, पर सड़कों को अनिश्चितकाल तक अवरुद्ध नहीं कर सकते

Thu, 21 Oct 2021 12:43 PM IST
प्रशांत कुमार झा राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मुद्दा एक लेकिन सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग पीठ की अलग-अलग राय सामने आई है। शीर्ष कोर्ट ने गुरुवार को यह टिप्पणी नोएडा निवासी मोनिका अग्रवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। इससे पहले हरियाणा सरकार की याचिका पर एक अन्य पीठ ने कहा था कि जब शीर्ष अदालत में कृषि कानूनों को चुनौती दी गई है तो किसान संघों को विरोध नहीं करना चाहिए।
 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ani
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विस्तार
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किसान आंदोलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा कि जो मामले अदालत में विचाराधीन हैं, उनमें भी वह विरोध करने के अधिकार के खिलाफ नहीं है, लेकिन इस तरह के विरोध में सार्वजनिक सड़कों को अनिश्चित काल तक अवरुद्ध नहीं किया जा सकता।  इससे पहले एक अन्य पीठ ने कहा था कि जब शीर्ष अदालत में कृषि कानूनों को चुनौती दी गई है तो किसान संघों को विरोध नहीं करना चाहिए।

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जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने कहा है कि तीन कृषि सुधार कानूनों का विरोध करने वाले किसानों को विरोध करने का अधिकार है, भले ही मामला अदालत में विचाराधीन है। इसके साथ ही पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में भी सड़कों को लंबे समय तक बाधित नहीं किया जा सकता है।

पीठ ने यह टिप्पणी नोएडा निवासी मोनिका अग्रवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। अग्रवाल की याचिका में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों द्वारा सड़कों को अवरुद्ध करने के खिलाफ राहत की मांग की गई है। पीठ ने कहा, 'कोई न कोई समाधान निकालना होगा। कानूनी चुनौती लंबित होने पर भी हम विरोध के अधिकार के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन सड़कों को इस तरह अवरुद्ध नहीं किया जा सकता है।'
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जस्टिस खानविलकर की पीठ ने यह बात कही थी
कुछ हफ्ते पहले सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली एक अन्य पीठ ने किसानों के विरोध प्रदर्शन से संबंधित एक अन्य याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि चूंकि कृषि कानूनों को शीर्ष अदालत के समक्ष कानूनी रूप से चुनौती दी गई है इसलिए किसान संघों को विरोध नहीं करना चाहिए। एक बार जब पक्ष अधिनियम की वैधता को चुनौती देने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाती है तो उसके बाद विरोध का क्या सवाल है? पीठ ने उस दिन आदेश पारित किया था कि वह इस मुद्दे की जांच करेगी कि क्या विरोध करने का अधिकार एक पूर्ण अधिकार है? क्या न्यायालय के समक्ष इस विषय पर याचिका दायर करने के बाद भी इसका प्रयोग किया जा सकता है?

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नोएड़ा से दिल्ली जाना बुरे सपने जैसा

जस्टिस कौल की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मोनिका अग्रवाल की याचिका में कहा गया है कि शीर्ष अदालत द्वारा सार्वजनिक सड़कों को साफ रखने के लिए विभिन्न निर्देशों के बावजूद उनका पालन नहीं किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि नोएडा से दिल्ली की यात्रा करना 'एक बुरे सपने' जैसा है।

पुलिस कर रही सड़कें अवरुद्ध, किसान नहीं
इस याचिका पर जस्टिस कौल के समक्ष वृहस्पतिवार को सुनवाई शुरू हुई तो कुछ किसान संघों का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने कहा कि सड़कें पुलिस द्वारा अवरुद्ध की जा रही हैं न कि किसानों द्वारा। दवे ने कहा, 'उन्हें पुलिस ने रोक दिया है। हमें रोकने के बाद भाजपा ने रामलीला मैदान में एक रैली की। आखिर इस तरह का अलग व्यवहार क्यों?'

रामलीला मैदान में प्रदर्शन की अनुमति दें
दवे ने कहा कि किसानों को रामलीला मैदान में अपना विरोध प्रदर्शन आयोजित करने की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने तीन-न्यायाधीशों की पीठ के 12 जनवरी के आदेश का भी हवाला दिया जिसमें तीन कृषि कानूनों के कार्यान्वयन पर रोक लगाते हुए कहा गया था कि किसान अपना विरोध शांतिपूर्ण तरीके से जारी रख सकते हैं। दवे ने यह भी कहा कि इस मामले को तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष भेजा जाना चाहिए।
 
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पीठ ने कहा- मामले को सुलझाना होगा

इस पर पीठ ने कहा, 'कानून स्पष्ट है। आपको आंदोलन करने का अधिकार है लेकिन सड़कों को इस तरह अवरुद्ध नहीं किया जा सकता है। अवरोध क्यों हुआ है? यह कैसे हुआ है? मामले को सुलझाना होगा।'

वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि गणतंत्र दिवस की घटना किसान संघों द्वारा यह वचन देने के बावजूद हुई थी कि 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली के दौरान कोई हिंसा नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा कि केवल कुछ किसान संघ अदालत के समक्ष पेश हुए हैं। पीठ ने कहा, 'कानून पहले ही निर्धारित किया जा चुका है। अब और कुछ निर्धारित नहीं किया जाना है। आप उन्हें (आंदोलनकारी किसानों को) बता सकते हैं कि उनके सहयोग से इस मुद्दे को सुलझाने में मदद मिलेगी।'

सात दिसंबर को होगी आगे सुनवाई
बहरहाल, शीर्षअदालत ने संयुक्त किशन मोर्चा (एसकेएम) सहित किसान संघों से अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया दाखिल करने को कहा है। अगली सुनवाई सात दिसंबर को होगी। गत चार अक्तूबर को शीर्ष अदालत ने राकेश टिकैत और योगेंद्र यादव सहित विभिन्न किसान संगठनों के 43 नेताओं को नोटिस जारी किया था, जो नवंबर, 2020 से दिल्ली-एनसीआर सीमा पर तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। अदालत ने हरियाणा सरकार की एक अर्जी पर इन नेताओं से जवाब मांगा था।
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