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Supreme Court: आर्थिक और शैक्षिक रूप से समान नहीं हो सकतीं एससी-एसटी की जातियां, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

Wed, 07 Feb 2024 08:15 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

शीर्ष अदालत 'ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य' मामले में 2004 के पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले पर फिर से विचार करने के संदर्भ में सुनवाई कर रही है। इस फैसले में कहा गया था कि एससी और एसटी एक समान है ऐसे में राज्य आरक्षण के मुद्दे पर आगे नहीं बढ़ सकते हैं।  
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी अनुसूचित जाति-जनजातियां अपनी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति के मामले में एकसमान नहीं हो सकती हैं। वे किसी निश्चित मकसद के लिए एक वर्ग हो सकती हैं, लेकिन सभी उद्देश्यों के लिए एक वर्ग नहीं हो सकतीं। सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की सात सदस्यीय संविधान पीठ इस प्रश्न की जांच कर रही है कि क्या राज्य के पास एससी-एसटी कोटे के अंदर कोटा देने की वर्गीकृत शक्ति है। पीठ पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 2010 में आए एक फैसले के खिलाफ 23 याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।

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दूसरे दिन की सुनवाई की शुरुआत में बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने वंचित वर्गों के बीच वास्तविक समानता सुनिश्चित करने के लिए राज्यों को एससी-एसटी को उप-वर्गीकृत करने का हक दिए जाने के पक्ष में तर्क दिया। उन्होंने कहा, 21वीं सदी में हम उनके लिए समानता की बात कर रहे हैं, जो सदियों से अपमानित व वंचित रहे हैं। 2004 के फैसले की आलोचना करते हुए सिब्बल ने कहा, इसमें अनुसूचित जाति को गलत तरीके से समरूप समूह माना गया है। तब शीर्ष कोर्ट की धारणा तथ्यात्मक डाटा व विश्लेषण पर आधारित नहीं थी। इस पर पीठ ने कहा-हां, एकरूपता यह है कि सभी अनुसूचित जाति के हैं। पर आपका तर्क है, समाजशास्त्रीय प्रोफाइल, आर्थिक विकास, सामाजिक व शैक्षिक उन्नति के संदर्भ में कोई एकरूपता नहीं है।

पीठ ने कहा, इनमें पिछले व्यवसाय के संदर्भ में विविधता है। अनुसूचित जाति के अंदर विभिन्न जातियों के लिए सामाजिक स्थिति और अन्य संकेतक भिन्न हो सकते हैं। लिहाजा, सामाजिक व आर्थिक पिछड़ेपन का स्तर एक व्यक्ति या जाति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न हो सकता है। सिब्बल ने कहा, पंजाब में करीब 32 फीसदी एससी आबादी है। राज्य को समाज के कमजोर वर्ग के अंदर सबसे कमजोर तबके के लिए विशेष व्यवस्था करने से नहीं रोका जा सकता। पीठ में जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मित्थल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीशचंद्र मिश्रा भी शामिल हैं। मामले की सुनवाई बृहस्पतिवार को जारी रहेगी।
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पिछड़ाें के आरक्षण के लिए प्रतिबद्ध पर उप-वर्गीकरण के भी पक्ष में: केंद्र
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह सकारात्मक कार्रवाई के उपाय के रूप में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की घोषित नीति के लिए प्रतिबद्ध है हालांकि वह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के भीतर उप-वर्गीकरण का समर्थन करती है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष बहस करते हुए केंद्र सरकार ने एससी-एसटी की आरक्षित श्रेणी के भीतर सबसे पिछड़े वर्गों को चिह्नित करने के विचार का समर्थन किया ताकि राज्यों को आरक्षित सीटों के उप-वर्गीकरण पर उचित नीतियां बनाने में सक्षम बनाया जा सके।

संविधान पीठ एससी-एसटी आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति पर कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। केंद्र ने यह स्पष्ट कर दिया कि उप-वर्गीकरण पर उसके तर्कों को हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए कोटा लाभ के विरोध के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल ने पीठ से कहा, ये प्रस्तुतियां केवल इस पीठ को संदर्भित प्रश्न यानी उप-वर्गीकरण की अनुमति तक ही सीमित हैं और इसे केंद्र सरकार की आरक्षण नीति में किसी भी तरह की कमजोर करने के रूप में नहीं माना जा सकता है। सरकार इस तरह के सकारात्मक कार्यों द्वारा समानता प्राप्त करने की मकसद से आरक्षण देने के अपने दायित्वों का पालन करना जारी रखेगी। मेहता ने कहा, आरक्षण उन लोगों के लिए समानता लाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई का एक उपाय है, जिन्होंने सैकड़ों वर्षों से भेदभाव झेला है। सॉलिसिटर जनरल ने पीठ से कहा, मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि एक नीति के रूप में आरक्षण के लिए केंद्र सरकार प्रतिबद्ध है। मेरी दलीलें केवल उप-वर्गीकरण के पहलू पर हैं।

मेहता की लिखित दलीलों में बताया गया है कि एससी-एसटी के भीतर उप-वर्गीकरण राज्य द्वारा लक्षित नीति बनाने में सक्षम होगा जो सकारात्मक कार्यों को तर्कसंगत बनाएगा और वांछित परिणामों के लिए इसके कार्यान्वयन को सक्षम करेगा। उन्होंने कहा, ’यह आरक्षण की आवश्यकता से समझौता किए बिना और केवल पिछड़ों में से अधिक पिछड़ों की ओर ध्यान केंद्रित करके और उप-वर्गीकरण करते समय भी संवैधानिक पद्धति को बदले बिना किया जाना चाहिए। मेहता ने ईवी चिन्नैया फैसले पर पुनर्विचार का समर्थन किया। उस फैसले में कहा गया था कि उप-वर्गीकरण की अनुमति नहीं है क्योंकि एससी-एसटी समरूप वर्ग बनाते हैं। सॉलिसिटर जनरल मेहता ने स्पष्ट किया कि यदि उप-वर्गीकरण की अनुमति दी जाती है तो राज्य केवल समूहों की पहचान कर सकते हैं और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद संसदीय कानून के माध्यम से ही इस तरह के उप-वर्गीकरण को प्रभावी बनाया जाना चाहिए।

2004 के फैसले पर पुनर्विचार
शीर्ष अदालत ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ के 2004 के फैसले पर पुनर्विचार कर रही है। शीर्ष कोर्ट ने तब कहा था, अनुसूचित जातियों का कोई भी उप-वर्गीकरण संविधान में समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा। सिर्फ संसद, न कि राज्य विधानसभाएं, संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत एससी समझी जाने वाली जातियों को राष्ट्रपति की सूची से बाहर कर सकती हैं। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने भी 2004 के फैसले पर पुनर्विचार करने के पक्ष में तर्क देते हुए कहा कि एससी-एसटी को एक समरूप वर्ग के रूप में नहीं माना जा सकता है और प्रत्येक उप-समूह एक विशिष्ट संवैधानिक उपचार का हकदार है। nपंजाब, तमिलनाडु और तेलंगाना की राज्य सरकारों ने भी मामले में उप-वर्गीकरण का समर्थन किया है। हालांकि आंध्र प्रदेश सरकार ने कहा कि वह 2004 के फैसले का समर्थन करती है।   

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