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Supreme Court: 'तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं की गरिमा सर्वोपरि', तलाक के बाद महिला अधिकारों पर कोर्ट की टिप्पणी

Tue, 02 Dec 2025 10:53 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Supreme Court Remark On Divorced Muslim Women: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम महिला (तलाक के बाद अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की व्याख्या करते समय महिलाओं की गरिमा, समानता और स्वायत्तता को प्राथमिकता देनी चाहिए। अदालत ने कोलकाता हाई कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए महिला के पक्ष में फैसला दिया।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि मुस्लिम महिला (तलाक के बाद अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की व्याख्या करते समय महिलाओं की गरिमा, समानता और स्वायत्तता को सबसे आगे रखना जरूरी है। अदालत ने कहा कि छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में आज भी पैतृक मानसिकता हावी रहती है, इसलिए कानून की व्याख्या महिलाओं के वास्तविक अनुभवों को ध्यान में रखकर होनी चाहिए।
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न्यायमूर्ति संजय करोल और एन कोटिस्वर सिंह की पीठ एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें सवाल उठाया गया कि शादी के समय महिला के पिता या परिवार द्वारा दिए गए सामान, या दूल्हे को दिए गए उपहार, तलाक के बाद महिला को कानून के तहत वापस मिल सकते हैं या नहीं। यह मामला धारा 3, मुस्लिम महिला (तलाक के बाद अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत दायर किया गया था और कुल 17.67 लाख रुपये से अधिक की वापसी की मांग की गई थी।

हाई कोर्ट का आदेश रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता हाई कोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें पूर्व पति को उन सामानों और रकम को लौटाने से राहत दी गई थी, जिन पर महिला का दावा था। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट ने इस मामले को केवल एक सिविल विवाद की तरह देखा, जबकि उसे कानून की भावना और उद्देश्य को समझना चाहिए था। अदालत के अनुसार, 1986 का कानून तलाक के बाद मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है।
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अदालत की सख्त टिप्पणी
बेंच ने कहा कि भारत का संविधान सभी के लिए समानता का लक्ष्य निर्धारित करता है, जो अभी पूरी तरह हासिल नहीं हो पाया है। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका को सामाजिक न्याय को ध्यान में रखकर अपने फैसले देने चाहिए। अदालत ने दो टूक कहा कि 1986 कानून का उद्देश्य महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करना है और इसी आधार पर इसकी व्याख्या की जानी चाहिए।

महिला के पक्ष में फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने महिला की अपील स्वीकार करते हुए उसे राहत दी और हाई कोर्ट के सभी आदेश रद्द कर दिए। अदालत ने आदेश दिया कि महिला अपने बैंक खाते का विवरण तीन दिनों के भीतर पूर्व पति के वकील को दे। पूर्व पति को निर्देश दिया गया कि वह रकम सीधे महिला के खाते में जमा करे और छह सप्ताह के भीतर अनुपालन का हलफनामा दाखिल करे। अदालत ने चेतावनी दी कि देरी होने पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।
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मामला कैसे शुरू हुआ?
यह मामला उस समय शुरू हुआ जब अगस्त 2005 में विवाह के बाद कुछ ही वर्षों में दंपति के बीच विवाद बढ़ गए और महिला मई 2009 में मायके लौट गई। बाद में उसने धारा 125 सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण के लिए आवेदन किया और आईपीसी की धारा 498A के तहत मामला भी दायर किया। 13 दिसंबर 2011 को तलाक हो गया, जिसके बाद महिला ने 1986 कानून के तहत 17.67 लाख रुपये की वापसी की मांग के लिए अदालत का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अब तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की व्याख्या को नई दिशा देता है।


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