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सुप्रीम कोर्ट: भू-उपयोग में बदलाव के बदले मुफ्त में जमीन देने की शर्त वैध, बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश खारिज

Fri, 29 Sep 2023 05:27 AM IST
जलज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने एक आंतरिक जांच रिपोर्ट पर ध्यान देने के बाद अदालत के रजिस्ट्रार को पुलिस में शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट में कहा गया कि एक लंबित याचिका के साथ संलग्न उसका आदेश, मनगढ़ंत था।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भूमि मालिक को भूमि के उपयोग की प्रकृति को बदलने के लिए दी गई अनुमति के बदले में भूमि का कुछ हिस्सा सार्वजनिक उपयोगिता उद्देश्यों के लिए मुफ्त में देने के लिए कहा जा सकता है। बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश को खारिज करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, सरकार की इस शर्त को अवैध नहीं माना जा सकता।
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जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एसवीएन भाटी की पीठ ने कहा, सुप्रीम कोर्ट ने नारायणराव जगोबाजी गोवांडे पब्लिक ट्रस्ट बनाम महाराष्ट्र सरकार व अन्य मामले में यह माना है कि कोई सरकार संबंधित भूमि के उपयोग को उप-विभाजित करने की अनुमति देते हुए उसे वाणिज्यिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने की मंजूरी देती है। इसके बदले में, भूमि मालिक को सार्वजनिक उपयोगिता के उद्देश्य के लिए जमीन का एक हिस्सा मुफ्त में सौंपने की शर्त लगाती है तो इसे अवैध नहीं माना जा सकता है। इस आदेश को ध्यान में रखें तो स्पष्ट होता है कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने रिट याचिकाओं को मंजूरी देने में जरूर कोई गलती की है। 

प्लॉट धारकों की रिट याचिका भी खारिज
पीठ ने कहा, उपयुक्त तथ्यों के मद्देनजर हम इस अपील की अनुमति देते हैं और हाईकोर्ट के 4 जुलाई 2019 के आक्षेपित सामान्य निर्णय और आदेश को रद्द करते हैं। प्लॉट धारकों की रिट याचिका भी खारिज की जाती है। शीर्ष अदालत 4 जुलाई, 2019 को औरंगाबाद में बॉम्बे हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच से पारित सामान्य निर्णय और आदेश को चुनौती देने वाली अपीलों पर सुनवाई कर रही थी। दोनों अपीलों में अपीलकर्ता शिरडी नगर पंचायत था। फैसले को गलत तरीके से पेश करने पर पुलिस में शिकायत दर्ज करने का शीर्ष अदालत का आदेश
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सुप्रीम कोर्ट ने एक आंतरिक जांच रिपोर्ट पर ध्यान देने के बाद अदालत के रजिस्ट्रार को पुलिस में शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट में कहा गया कि एक लंबित याचिका के साथ संलग्न उसका आदेश, मनगढ़ंत था। जस्टिस एएस ओका और जस्टिस पंकज मिथल की पीठ ने मंगलवार को रजिस्ट्रार (न्यायिक सूची) की रिपोर्ट का अवलोकन किया और कहा कि यह स्पष्ट था कि इस अदालत के आदेश की प्रति बताया जाने वाला दस्तावेज ‘मनगढ़ंत’ था। इसलिए, रजिस्ट्रार (न्यायिक सूची) को क्षेत्राधिकार वाले पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करके आपराधिक कानून को लागू करना चाहिए। पीठ ने संबंधित पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी को दो महीने के भीतर जांच के बारे में अदालत को रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा, हालांकि उनकी भूमिका की जांच करने के लिए वकील प्रीति मिश्रा को नोटिस जारी किया गया था, लेकिन उन्होंने आज इस अदालत के सामने पेश नहीं होने का फैसला किया है। अब वकील की भूमिका की जांच करना पुलिस का काम है। पीठ ने रजिस्ट्रार को आदेश की एक प्रति पुलिस को सौंपने का भी निर्देश दिया। इस मामले में अगली सुनवाई 1 दिसंबर को होगी। 

इससे पहले, शीर्ष अदालत ने यह देखने के बाद आंतरिक जांच का आदेश दिया था कि एक मामले में एक ही पीठ के दो अलग-अलग आदेशों के साथ एक याचिका दायर की गई थी। पहला आदेश बर्खास्तगी का है और दूसरा आदेश एसएलपी की अनुमति देने का है। पीठ ने 22 अगस्त को रजिस्ट्रार (न्यायिक) को इस पहलू की जांच करने और 20 सितंबर, 2023 तक इस रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया था। संबंधित वकीलों मिश्रा व आफताब अली खान और शिकायतकर्ता लोकेश मदनमोहन अग्रवाल को भी नोटिस जारी किया गया था।
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