आंध्र प्रदेश के कानून में घी है पशुधन उत्पाद
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आंध्र प्रदेश के कानून के तहत ‘घी’ एक पशुधन उत्पाद है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की 1994 की उस अधिसूचना को बरकरार रखा है, जिसमें बाजार समितियों को इसकी बिक्री और खरीद पर शुल्क लगाने का अधिकार दिया गया है। घी की बिक्री और खरीद पर बाजार शुल्क लगाने से जुड़े प्रश्न के अलावा, शीर्ष अदालत को यह तय करना था कि क्या यह आंध्र प्रदेश (कृषि उपज और पशुधन) बाजार अधिनियम के प्रावधानों के तहत पशुधन का उत्पाद है।जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस एसवीएन भाटी की पीठ ने कहा, यह तर्क कि घी पशुधन का उत्पाद नहीं है, निराधार और किसी भी तर्क से रहित है। इसके विपरीत यह तर्क कि घी वास्तव में पशुधन का एक उत्पाद है, तार्किक रूप से सही है। अधिनियम की धारा 2(5) के तहत पशुधन को परिभाषित किया गया है, जहां गाय और भैंस पशुधन हैं। निर्विवाद रूप से घी पशुधन के उत्पाद दूध से निकला उत्पाद है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि घी पशुधन का उत्पाद नहीं है क्योंकि गाय और भैंस इसका सीधे उत्पादन नहीं करती हैं। शीर्ष अदालत ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ संगम मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड की याचिका को खारिज कर दिया। इससे राज्य में बाजार समितियों के माध्यम से इसकी बिक्री और खरीद पर शुल्क लगाने का रास्ता साफ हो गया। पीठ के लिए फैसला लिखते हुए जस्टिस धूलिया ने हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया और कहा कि पशुधन उत्पाद के रूप में घी को शामिल करने को सिर्फ इसलिए गलत नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यह किसी अन्य डेयरी उत्पाद से प्राप्त हुआ है।
संविधान संसद को खनिज विकास का पूरा अधिकार नहीं देता: शीर्ष अदालत
सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि संविधान संसद को खनिज विकास का पूरा अधिकार नहीं देता है और राज्यों के पास खानों और खनिजों के नियमन व विकास करने का अधिकार है। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे की इस दलील पर सुनवाई कर रही थी कि खनिजों पर कर (टैक्स) लगाने की संसद की शक्ति से राज्यों के अधिकार खत्म हो सकते हैं।