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Supreme Court: 'नीतियां लागू करना कार्यपालिका का अधिकार, अदालतें निर्देश नहीं दे सकतीं', SC की अहम टिप्पणी

Fri, 23 Feb 2024 12:57 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

याचिका में दावा किया गया है कि देश में हर दिन पांच साल से कम उम्र के कई बच्चों की भुखमरी और कुपोषण से मौत हो जाती है और यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। साथ ही ये भोजन के अधिकार का भी उल्लंघन है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकार की नीतियों और योजनाओं की न्यायिक समीक्षा का दायरा बहुत सीमित होता है और अदालतें सरकार को कोई नीति या योजना लागू करने का निर्देश नहीं दे सकती। सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम टिप्पणी एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की। दरअसल सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर मांग की गई थी कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को निर्देश दे कि देशभर में भुखमरी और कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए जगह-जगह सामुदायिक रसोई बनाई जाएं। 
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सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश देने से किया इनकार
याचिका में दावा किया गया है कि देश में हर दिन पांच साल से कम उम्र के कई बच्चों की भुखमरी और कुपोषण से मौत हो जाती है और यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। साथ ही ये भोजन के अधिकार का भी उल्लंघन है। याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस पंकज मित्तल की पीठ ने ऐसा कोई भी निर्देश देने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि भुखमरी और कुपोषण से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें पहले ही राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून और अन्य कल्याणकारी योजनाएं लागू कर चुकी हैं। पीठ ने कहा कि 'यह सर्वविदित है कि नीतिगत मामलों की न्यायिक समीक्षा का दायरा बहुत सीमित है। अदालतें किसी नीति या योजना की उपयुक्तता की जांच नहीं करती हैं और न ही कर सकती हैं। न ही अदालतें नीति के मामलों में कार्यपालिका की सलाहकार हैं।' पीठ ने कहा कि 'नीतियां लागू करने का अधिकार कार्यपालिका के पास है।'  


 

यूपी सरकार को जवाब दाखिल करने का कोर्ट ने दिया समय
रामचरितमानस के बारे में कथित टिप्पणियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य की याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को 10 दिन समय दिया है। स्वामी प्रसाद मौर्य पर अवधी भाषा के पवित्र ग्रंथ 'रामचरितमानस' के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया है। यह कार्यवाही राज्य की प्रतापगढ़ अदालत में लंबित है। गौरतलब है कि स्वामी प्रसाद मौर्य ने समाजवादी पार्टी छोड़ने के बाद गुरुवार को अपनी नई राजनीतिक पार्टी- राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी (आरएसएसपी) लॉन्च की। पीठ ने सरकारी वकील द्वारा जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगने के बाद सुनवाई को स्थगित कर दिया।गौरतलब है कि शीर्ष अदालत ने 25 जनवरी को मामले में स्वामी प्रसाद मौर्य के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा दी थी और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया था।
 

कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई
कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़े मामले पर दो मई को सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा, जिसमें जजों ने किशोरियों को यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखने की सलाह दी थी। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कथित यौन उत्पीड़न के एक मामले में हाईकोर्ट की एक खंडपीठ द्वारा की गई कुछ टिप्पणियों पर संज्ञान लिया था। पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय के 18 अक्तूबर, 2023 के फैसले के खिलाफ पश्चिम बंगाल द्वारा दायर अपील पर सुनवाई की जाएगी। शीर्ष अदालत ने पिछले साल आठ दिसंबर को फैसले की आलोचना की थी और हाई कोर्ट द्वारा की गई कुछ टिप्पणियों को अत्यधिक आपत्तिजनक और पूरी तरह से अनुचित करार दिया था।

इंटरनेट प्रतिबंध के समीक्षा आदेश प्रकाशित करे जम्मू-कश्मीर प्रशासन
सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन को केंद्र शासित प्रदेश में इंटरनेट सेवाओं की बहाली पर केंद्रीय गृह सचिव के अधीन विशेष समिति के समीक्षा आदेशों को प्रकाशित करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि समीक्षा एक खाली औपचारिकता नहीं हो सकती। जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा, समीक्षा आदेश के परिणामस्वरूप पार्टियों के अधिकार प्रभावित होंगे। लेकिन प्रथमदृष्टया हमारी राय है कि समीक्षा में पारित आदेशों को प्रकाशित करने की जरूरत है। हालांकि समीक्षा विचार-विमर्श को प्रकाशित करना आवश्यक नहीं हो सकता है।  

केंद्र से पूछा-क्या कोई जमानत कानून विचाराधीन है
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह बताने को कहा है कि क्या 2022 में सतेंदर कुमार अंतिल के मामले में जमानत देने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए कोई जमानत कानून विचाराधीन है। देश की जेलों में बाढ़ आ गई है। इनमें से दो-तिहाई से अधिक कैदी विचाराधीन हैं। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने केंद्र से अदालत को यह भी बताने को कहा कि क्या अधिक लंबित मामलों वाले जिलों में अतिरिक्त विशेष अदालतें (सीबीआई) बनाने की आवश्यकता का पता लगाने के लिए कोई मूल्यांकन किया गया है। 

अदालतें राज्यों को विशेष योजनाएं लागू करने का निर्देश नहीं दे सकतीं....
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार के नीतिगत मामलों की जांच में न्यायिक समीक्षा का दायरा बहुत सीमित है। अदालतें राज्यों को इस आधार पर किसी विशेष नीति या योजना को लागू करने का निर्देश नहीं दे सकती हैं कि बेहतर, निष्पक्ष या तार्किक विकल्प उपलब्ध है। जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस पंकज मिथल की पीठ ने एक जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने यह कहते हुए कोई भी निर्देश पारित करने से इनकार कर दिया कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) और अन्य कल्याणकारी योजनाएं केंद्र और राज्यों की ओर से लागू की जा रही हैं। याचिका में भूख और कुपोषण से निपटने को लेकर सामुदायिक रसोई के लिए एक योजना तैयार करने के उद्देश्य से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश देने की अपील की गई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि नीति की विवेकशीलता या सुदृढ़ता के बजाय नीति की वैधता न्यायिक समीक्षा का विषय होगी। 

हथियार लाइसेंस मामले में अब्बास अंसारी की जमानत याचिका पर सुनवाई स्थगित
सुप्रीम कोर्ट ने गैंगस्टर से नेता बने मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी की याचिका पर सुनवाई शुक्रवार को स्थगित कर दी। याचिका में हथियार लाइसेंस मामले में उसकी जमानत याचिका खारिज करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी है। अंसारी के वकील के उत्तर प्रदेश सरकार के हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगने के बाद जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने सुनवाई स्थगित कर दी। अब इस मामले में मार्च में सुनवाई होगी। अंसारी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के 20 नवंबर, 2022 के आदेश को चुनौती दी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हथियार लाइसेंस मामले में नेता अब्बास अंसारी को जमानत देने से इन्कार कर दिया है। इस मामले में 12 अक्टूबर 2019 को एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें अब्बास अंसारी पर खुद को एक प्रसिद्ध शूटर होने का दावा करते हुए लाइसेंस पर कई आग्नेयास्त्र खरीदने का आरोप लगाया गया था।
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दिल्ली में प्रदर्शन की अनुमति के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे किसान
किसानों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर राष्ट्रीय राजधानी में शांतिपूर्ण तरीके से मार्च और सभा करने की अनुमति देने के लिए केंद्र को निर्देश देने की अपील की गई है। याचिका में केंद्र और कुछ राज्यों की तरफ से किसानों के अधिकारों के उल्लंघन का आरोप भी लगाया गया है। याचिका में सोशल मीडिया खातों को अनब्लॉक करने और किसानों के विरोध के बारे में जानकारी साझा करने वाले लोगों के स्वतंत्र भाषण के अधिकार का सम्मान करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। याचिका में केंद्र, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब और दिल्ली सरकारों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पक्षकार बनाया गया है। याचिका में दावा किया गया है कि राज्य सरकारों की ओर से शांतिपूर्वक विरोध कर रहे किसानों के खिलाफ आंसू गैस, रबर की गोलियों का इस्तेमाल किया गया है जिससे किसानों को गंभीर चोटें आई हैं। 
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