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सेरोगेसी: क्या सेरोगेट मां से अनुवांशिक रूप से जुड़े होते हैं बच्चे? केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में दी यह दलील

Wed, 08 Feb 2023 10:43 PM IST
संजीव कुमार झा पीटीआई, नई दिल्ली

सार

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में  सरोगेसी से जन्म लेने वाले बच्चे और सेरोगेट मां के बीच अनुवांशिक संबंध को लेकर जवाब दिया है।
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नवजात सांकेतिक - फोटो : Istock
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विस्तार
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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट किया है कि सरोगेसी कानून के मुताबिक सेरोगेट मां बच्चे के जन्म की प्रक्रिया में आनुवंशिक रूप से नहीं जुड़ सकती। सरकार ने इस कानून का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अपनी युग्मक कोशिका देने वाली ऐसी कोई महिला सरोगेट मां के तौर पर कार्य नहीं करेगी। युग्मक कोशिका वह नर या मादा कोशिका होती है, जो विपरीत लिंग की कोशिका के साथ मिलकर शिशु का निर्माण करती है।

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सरकार ने अदालत को अपने जवाब में कहा है कि सेरोगेट मां इससे अलग रहेगी, लेकिन सरोगेसी से जन्म लेने वाला बच्चा निश्चित रूप से संतान की इच्छा रखने वाले दंपती, विधवा या तलाकशुदा से आनुवंशिक तौर पर संबद्ध होगा। इसका अर्थ यह है कि संतान चाहने वाले दंपती पिता शुक्राणु और मां अंडाणु देंगे। जस्टिस अजय रस्तोगी की पीठ ने कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिसमें एक याचिका में सरोगेसी कानून-2021 और सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी कानून-2021 के प्रावधानों को चुनौती दी गई है। इसमें कहा गया है कि इन कानून के प्रावधान निजता के अधिकार और महिलाओं के मां बनने के अधिकार का सीधे-सीधे उल्लंघन है।

सरकार ने कहा है कि पिछले साल मई में सरोगेसी कानून की धारा 3 के तहत एक अधिसूचना जारी कर राष्ट्रीय सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी और सरोगेसी बोर्ड की स्थाना की गई थी। जवाब में सरकार ने कहा है कि इस मामले में राष्ट्रीय बोर्ड के सदस्यों से व्यापक विचार-विमर्श के बाद स्पष्ट किया गया कि कानून सरोगेट मां को बच्चे के जन्म से आनुवंशिक रूप से जुड़ने की अनुमति नहीं देता। एक याचिका में कहा गया था कि दोनों कानून सरोगेसी कानून के नियमन के उद्देश्य को पूरा करने में नाकाम है। सरोगेसी कानून के तहत व्यावसायिक सरोगेसी पर पूरी तरह प्रतिबंध है।

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सिक्किमी-नेपाली लोगों को विदेशी मूल का बताने वाली अपनी टिप्पणी को सुप्रीम कोर्ट ने हटाया

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपने फैसले से उस टिप्पणी को हटा दिया जिसमें सिक्किमी-नेपाली व्यक्तियों को ‘विदेशी मूल के लोग’ के रूप में वर्णित किया गया था। एसोसिएशन ऑफ ओल्ड सेटलर्स ऑफ सिक्किम बनाम भारत सरकार के मामले में आए फैसले में की गई इस टिप्पणी ने सिक्किम में विरोध को तेज कर दिया था। सिक्किमी-नेपाली समुदाय ने टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई थी। लिहाजा केंद्र सरकार, सिक्किम राज्य और तीसरे पक्ष ने संशोधनों की मांग करते हुए आवेदन दायर किए थे। जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने 13 जनवरी को यह फैसला सुनाया था। विवादास्पद हिस्सा जस्टिस नागरत्ना के लिखे गए फैसले में था। उन्होंने नेपाल के कुछ लोगों को सिक्किम में बसे विदेशी मूल का व्यक्ति बताया था। पीठ ने बुधवार को कहा, यह गलती इसलिए हुई है क्योंकि मूल रिट याचिकाकर्ताओं ने याचिका में 25 से अधिक संशोधन किए हैं लेकिन इस तथ्य को अदालत के संज्ञान में नहीं लाया गया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से यह स्पष्ट करने का अनुरोध किया कि निर्णय ने संविधान के अनुच्छेद 371एफ के पहलू को नहीं छुआ है जो सिक्किम के संबंध में विशेष प्रावधानों से जुड़ा है। पीठ ने, हालांकि, कहा कि इस तरह का स्पष्टीकरण अनावश्यक है क्योंकि अनुच्छेद 371एफ मामले का विषय नहीं था। पीठ ने 13 जनवरी के अपने फैसले में कहा था, ‘इसलिए, सिक्किम के मूल निवासियों, अर्थात भूटिया-लेप्चा और सिक्किम में बसे विदेशी मूल के व्यक्ति जैसे नेपाली या भारतीय मूल के व्यक्तियों के बीच कोई अंतर नहीं था। जो कई पीढ़ियों पहले सिक्किम में बस गए थे।

टाइगर रिजर्व, नेशनल पार्क के मुख्य क्षेत्रों में निर्माण पर रोक लगाई 

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अथॉरिटी को टाइगर रिजर्व, नेशनल पार्क और वन्यजीव अभ्यारण्यों के मुख्य क्षेत्रों में निर्माण करने से रोक दिया है। शीरा अदालत ने कहा है टाइगर रिजर्व, नेशनल पार्क के भीतर चिड़ियाघरों और सफारी की स्थापना की सराहना नहीं की जा सकती।
जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) से पूछा है कि राष्ट्रीय उद्यानों में सफारी की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए। शीर्ष अदालत उत्तराखंड में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के बफर एरिया में टाइगर रिजर्व में कथित अवैध निर्माण और टाइगर सफारी की निर्माण जैसे मुद्दों को उठाने वाले मामले पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने अपने आदेश में कहा, अगले आदेश तक अथॉरिटी द्वारा टाइगर रिजर्व, नेशनल पार्क और वन्यजीव अभ्यारण्यों में किसी तरह के निर्माण पर रोक रहेगी।' पीठ को सूचित किया गया था शीर्ष अदालत द्वारा गठित पैनल, केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से बाघ अभयारण्यों और वन्यजीव अभ्यारण्यों के उपयोग को हतोत्साहित करने के लिए चिड़ियाघर और सफारी स्थापित करने से संबंधित दिशानिर्देशों में संशोधन करने या वापस लेने के लिए कहा गया है। सीईसी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि टाइगर रिजर्व और संरक्षित क्षेत्रों के भीतर चिड़ियाघर और सफारी स्थापित करने के लिए दी गई मंजूरी को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।

खराब बाल काटने पर दो करोड़ के मुआवजे का आदेश खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के उस फैसले को खारिज कर दिया है, जिसमें 2018 में एक होटल के सैलून में खराब तरह से बाल काटने पर हुई तकलीफ और आय के नुकसान पर एक मॉडल को दो करोड़ रुपये मुआवजा देने को कहा गया था।
जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने कहा कि आईटीसी मौर्य में सैलून की तरफ से ‘सेवा में कमी’के संबंध में आयोग के निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने की कोई इच्छा नहीं है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने महिला को मुआवजे के अपने दावे के संबंध में सबूत पेश करने का मौका देने के लिए मामले को वापस एनसीडीआरसी को भेज दिया। आईटीसी लिमिटेड ने आयोग के सितंबर, 2021 के आदेश को चुनौती दी थी। पीठ ने कहा, मॉडल बाल की खराब कटिंग से हुए नुकसान या होने वाले नुकसान को लेकर कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर सकी। उसके लिए बाल कटिंग के दौरान हुए दर्द, पीड़ा और आघात को लेकर मुआवजा बन सकता था, लेकिन तब भी दो करोड़ रुपये की राशि बहुत ज्यादा और अनुपातहीन होगी।

पटना हाईकोर्ट का आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने बीमा पॉलिसी की शर्तों की ‘सख्ती से व्याख्या’ करने की नसीहत के साथ पटना हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को एक फर्म को कांस्टेबल की विधवा के दावे को पूरा करने को कहा था जिसकी 2000 में बिहार चुनाव ड्यूटी के दौरान गर्मी के कारण मौत हो गई थी।
जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एएस ओका की पीठ ने अक्टूबर 2017 के हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील पर फैसला सुनाया, जिसमें कंपनी पर देनदारी तय की गई थी। पीठ ने कहा, सनस्ट्रोक से उत्पन्न होने वाले कारण को बीमा पॉलिसी में कवर नहीं किया जा सकता है। क्योंकि इसमें बाहरी हिंसक और किसी अन्य दृश्य माध्यम से हुई दुर्घटनाओं में मौत को ही कवर करने का प्रावधान है। 
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डीडीए संरक्षित क्षेत्रों में जमीन आवंटित न करे : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि दिल्ली रिज क्षेत्र फेफड़ों की तरह काम करता है जो शहरवासियों को ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को निर्देश दिया कि वह संरक्षित क्षेत्र के रूप में अधिसूचित इलाकों में कोई जमीन आवंटित नहीं करे। अदालत ने कहा कि रिज के उन क्षेत्रों की पहचान करने में कुछ कठिनाई हुई है जो अधिसूचित नहीं हैं, लेकिन उनमें भी रिज जैसी विशेषताएं हैं।
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