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SC Updates: शीर्ष अदालत ने दस्तावेज पेश करने के लिए जेल में बंद TMC विधायक को दिया समय; पढ़ें कोर्ट की खबरें

Thu, 18 Apr 2024 01:06 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ईडी ने पश्चिम बंगाल प्राथमिक शिक्षा बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष माणिक भट्टाचार्य को साल 2022 में 11 अक्तूबर के दिन कथित तौर पर जांच में सहयोग नहीं करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। वह नादिया जिले की पलाशीपारा सीट से सत्तारूढ़ टीएमसी विधायक हैं।
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Supreme Court - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट से जेल में बंद टीएमसी विधायक माणिक भट्टाचार्य को एक राहत मिली है। अदालत ने गुरुवार को भट्टाचार्य को जमानत याचिका के समर्थन में कुछ दस्तावेज दाखिल करने के लिए समय दिया है। बता दें, भट्टाचार्य पश्चिम बंगाल में प्राथमिक स्कूल शिक्षकों की भर्ती में कथित अनियमितताओं से संबंधित मामले में जेल में बंद हैं। 

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भट्टाचार्य के वकील ने दी यह दलील
न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल की पीठ ने भट्टाचार्य की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा की इस दलील पर विचार किया कि वह कुछ दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाना चाहते हैं। वहीं उनके वकील ने यह भी दलील दी कि वह सीबीआई के मुख्य मामले में भी आरोपी नहीं हैं।

पीठ ने कहा, 'वरिष्ठ अधिवक्ता कुछ दस्तावेजों को दाखिल करने के लिए समय चाहते हैं। इसलिए दो सप्ताह का समय दिया जाता है।'

साल 2022 में किया था गिरफ्तार
ईडी ने पश्चिम बंगाल प्राथमिक शिक्षा बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष माणिक भट्टाचार्य को साल 2022 में 11 अक्तूबर के दिन कथित तौर पर जांच में सहयोग नहीं करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। वह नादिया जिले की पलाशीपारा सीट से सत्तारूढ़ टीएमसी विधायक हैं। शीर्ष अदालत ने पहले पश्चिम बंगाल में प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों की भर्ती में कथित अनियमितताओं के संबंध में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ भट्टाचार्य की याचिका को खारिज कर दिया था, यह देखते हुए कि ईडी की कार्रवाई अवैध नहीं थी। 
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शीर्ष अदालत ने 15 दिसंबर, 2023 को भट्टाचार्य की जमानत याचिका खारिज करने के कलकत्ता हाईकोर्ट के 16 नवंबर के आदेश के खिलाफ उनकी अपील पर ईडी को नोटिस जारी किया था।
 
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति का आदेश
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति तीर्थंकर घोष ने अपने आदेश में कहा था कि जिस मुद्दे से संबंधित मामले की जांच जारी है, उसमें शामिल पीड़ितों की संख्या और आरोपी एक प्रभावशाली व्यक्ति है, जिसके साधन, स्थिति राज्य प्रशासनिक स्तर के साथ-साथ शिक्षा पर भी सवाल से परे हैं। विभाग, उनकी रिहाई, जांच के इस चरण पर प्रभाव डालेगी जब जांच को समाप्त करने के लिए माननीय डिवीजन बेंच द्वारा 31 दिसंबर 2023 की बाहरी सीमा तय की गई है, जो कि ईडी द्वारा की जा रही है। 

अदालत ने कहा था कि इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, विशेष रूप से साधनों, स्थिति, वर्तमान याचिकाकर्ता की स्थिति, अपराध की गंभीरता के साथ-साथ जांच के चरण के संबंध में जो अंतिम चरण में है, मेरा विचार है कि यह है याचिकाकर्ता के लिए इस स्तर पर जमानत पर रिहा किया जाना उपयुक्त मामला नहीं है।  

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले ईडी द्वारा गिरफ्तारी के खिलाफ भट्टाचार्य की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि एजेंसी की कार्रवाई अवैध नहीं थी। शीर्ष अदालत ने पश्चिम बंगाल शिक्षक भर्ती घोटाले से संबंधित धनशोधन के एक मामले में भट्टाचार्य के बेटे सौविक को 16 फरवरी को जमानत दे दी थी।


मूक-बधिर मगर दुष्कर्म आरोपी पर मुकदमा चलाने के दिशा-निर्देशों पर होगा सुप्रीम विचार
सुप्रीम कोर्ट सुनने व बोलने में अक्षम लेकिन दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध के लिए चिकित्सीय रूप से फिट आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने के दिशा-निर्देश तय करने के मुद्दे पर विचार करने को सहमत हो गया। शीर्ष अदालत ने कहा कि उसके ध्यान में लाया गया है कि शीर्ष अदालत ने अब तक ऐसे कोई दिशा-निर्देश नहीं बनाए हैं। यह मुद्दा पीठ के समक्ष उठा जब उसने एक ऐसे व्यक्ति को जमानत देने से मना कर दिया जो सुनने और बोलने में अक्षम है और दो नाबालिग लड़कियों से दुष्कर्म का दोषी है।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने 16 अप्रैल के आदेश में अटॉर्नी जनरल के जरिये केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी किया और 26 जुलाई तक इस कानूनी सवाल पर जवाब मांगा। मामले का निपटारा करते हुए पीठ ने कहा, याचिकाकर्ता के वकील को सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखने के बाद, वह प्रथम दृष्टया संतुष्ट है कि ट्रायल कोर्ट के साथ-साथ हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को सात और आठ साल की दो नाबालिग लड़कियों के साथ दुष्कर्म का दोषी ठहराया है। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता की दोषसिद्धि और सजा उचित है। उसे जमानत नहीं दी जा सकती।




 

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एक्साइज मामले में कारोबारी बोइनपल्ली की अंतरिम जमानत बढ़ाई 
उच्चतम न्यायालय ने कथित दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति घोटाले से संबंधित धन शोधन मामले में आरोपी हैदराबाद के व्यवसायी अभिषेक बोइनपल्ली को दी गई अंतरिम जमानत की अवधि गुरुवार को आठ मई तक बढ़ा दी। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने उन्हें यह राहत दी। व्यवसायी का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि उनके मुवक्किल को दी गई पांच सप्ताह की अंतरिम जमानत समाप्त हो रही है, जबकि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा उनकी गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली उनकी मुख्य याचिका पर मई में सुनवाई होनी है।
 
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उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा, औद्योगिक अल्कोहल को विनियमित करने की शक्ति राज्यों की
सुप्रीम कोर्ट ने औद्योगिक अल्कोहल के उत्पादन, विनिर्माण, आपूर्ति और विनियमन के संबंध में केंद्र और राज्यों की शक्तियों के परस्पर व्याप्त होने के मुद्दे पर बृहस्पतिवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। औद्योगिक अल्कोहल मानवीय खपत के लिए नहीं है। इस अल्कोहल का इस्तेमाल औद्योगिक गतिविधियों के लिए ही किया जाता है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि औद्योगिक शराब को विनियमित करने की राज्यों की पूर्ण शक्ति को केंद्र की ओर से कुचला नहीं जा सकता है। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ वकील दिनेश द्विवेदी ने मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ को बताया कि शराब युक्त सभी तरल पदार्थ 'नशीली शराब' के दायरे में आते हैं। विधायी इतिहास स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि 'नशीली शराब' शब्द इतने व्यापक हैं कि इसमें औद्योगिक अल्कोहल और अल्कोहल से बने सभी तरल पदार्थ शामिल हैं। विभिन्न राज्यों की तरफ से पेश हुए वकीलों की दलीलें सुनने के बाद संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया।

राज्य सूची की आठवीं प्रविष्ट राज्यों को विनियमन की शक्ति देती है
संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्य सूची की आठवीं प्रविष्टि राज्यों को ‘नशीली शराब’ के उत्पादन, कब्जे, परिवहन, खरीद और बिक्री पर कानून बनाने की शक्ति देती है। वहीं संघ सूची की प्रविष्टि 52 और समवर्ती सूची की प्रविष्टि 33 में उन उद्योगों का उल्लेख है जिनका नियंत्रण संसद के कानून द्वारा सार्वजनिक हित में सामयिक घोषित किया गया है। संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक समवर्ती सूची में उल्लेखित विषयों पर संसद और राज्यों के विधानमंडल दोनों ही कानून बना सकते हैं, लेकिन उसी विषय पर अगर कोई केंद्रीय कानून आता है तो उसे राज्यों के कानून पर प्रधानता मिलेगी। सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ 1997 में इस मसले पर राज्यों के खिलाफ फैसला सुना चुकी है। उसके बाद केंद्र के पास औद्योगिक अल्कोहल के उत्पादन पर नियामक शक्ति होने का मामला 2010 में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष भेजा गया था।


 
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