सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों की गलती के कारण लंबे समय से जेल में बंद लोगों को जमानत नहीं देने को न्याय का मजाक बताया है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकीलों की तैयारी न होने के कारण जमानत देने से इनकार करने पर खेद जताया है।
जस्टिस कौल ने कहा, हमारे पास हाईकोर्ट के ऐसे आदेश आते हैं, जहां जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी जाती है कि अपराध जघन्य है। क्या सुधार संभव नहीं है? हमें देखना होगा कि वह समाज में कैसा व्यवहार करता है? जस्टिस सुंदरेश ने कहा, अपील सफल हुई तो उन्होंने जो साल जेल में गंवाए, उन्हें कौन लौटाएगा? हम इसे केवल दंडात्मक नजरिए से देखते हैं। यही समस्या है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी दोषी ने जेल में 14 साल पूरे कर लिए हैं तो राज्य खुद एक उपयुक्त रुख अपना सकता है। हाईकोर्ट के न्यायाधीश रिहाई के लिए मामले की जांच करने के आदेश पारित कर सकते हैं। वकील की अनुपस्थिति इसके आड़े नहीं आ सकती। शीर्ष अदालत ने सुझाव दिया कि 10-14 और 10 साल तक की हिरासत में रहने वालों की अलग सूची तैयार की जानी चाहिए। जस्टिस कौल ने कहा, कैदी 14 या 17 वर्षों से जेल में हों और वकील बहस करने के लिए तैयार नहीं हों तो क्या उन्हें अधिवक्ता की तैयारी न होने का खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
17 साल जेल में काटने वाले को दी जमानत
पीठ के समक्ष ऐसा भी उदाहरण था, जिसमें दोषी 17 साल से जेल में था और हाईकोर्ट ने उसकी जमानत याचिका इसलिए खारिज कर दी, क्योंकि वकील दलीलों के साथ तैयार नहीं था। उसके बाद, वकील के तैयार होने पर भी चार बार याचिका पर सुनवाई नहीं हुई। शीर्ष अदालत ने उस दोषी को जमानत दे दे। नाराज जस्टिस कौल ने कहा, हमें जमानत देने में कितना समय लगा? 15 मिनट। हम चाहते थे कि हाईकोर्ट एक खाका ढूंढे, लेकिन आज हम बहुत परेशान हैं।