फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Supreme Court: 'जब AMU राष्ट्रीय महत्व का संस्थान, तो अल्पसंख्यक दर्जे के क्या मायने?' सुप्रीम कोर्ट का सवाल

Thu, 11 Jan 2024 09:09 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) को अल्पसंख्यक दर्जा दिए जाने के कानून से जुड़ा मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में है। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में सात जजों की संविधान पीठ ने लगातार तीसरे दिन सुनवाई की। अदालत ने पूछा, 'जब AMU राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है, तो अल्पसंख्यक दर्जे के क्या मायने हैं?
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) को 1981 में संसद से पारित कानून के तहत अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा मिला है। एएमयू को अल्पसंख्यक दर्जा और 1981 के कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है। सात जजों की संविधान पीठ इस पेचीदा मुकदमे की सुनवाई कर रही है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात जजों की पीठ ने गुरुवार को लगातार तीसरे दिन की सुनवाई में पूछा कि जब एएमयू राष्ट्रीय महत्व का संस्थान बना हुआ है, तो अल्पसंख्यक दर्जा कैसे मायने रखता है?
विज्ञापन


अदालत ने साफ किया कि संविधान के अनुच्छेद 30 का इरादा 'अल्पसंख्यकों को खास इलाके में बसाना' (ghettoise the minority) नहीं है। अनुच्छेद 30 देश में शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और इनके प्रशासन के लिए अल्पसंख्यकों के अधिकार से संबंधित है। शीर्ष अदालत ने 2006 में पारित इलाहाबाद उच्च न्यायालय की पीठ के फैसले पर भी विचार किया। इस बात पर भी गौर किया गया कि एस अजीज बाशा बनाम भारत सरकार मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट के 1967 में पारित फैसले को गलत मानने पर हाईकोर्ट के आदेश पर क्या असर पड़ेगा?

1967 में सुप्रीम कोर्ट का पहला फैसला, 14 साल बाद सरकार ने लौटाया दर्जा
बता दें कि एएमयू के माइनॉरिटी स्टेटस के संबंध में इससे पहले साल 1967 में एस अज़ीज़ बाशा बनाम भारत संघ मुकदमे में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने फैसला पारित किया था। इस फैसले में कहा गया था कि एएमयू एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। ऐसे में इसे अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना जा सकता है। 1875 में स्थापित AMU को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 14 साल बाद अल्पसंख्यक दर्जा वापस मिला था। 1981 में संसद से पारित कानून के माध्यम से तत्कालीन सरकार ने एएमयू को माइनॉरिटी स्टेटस दिया।
विज्ञापन


सुप्रीम कोर्ट ने पूछे अहम सवाल
सात जजों की पीठ ने कहा, अल्पसंख्यक टैग के बिना भी संस्थान राष्ट्रीय महत्व का संस्थान बना हुआ है। लोगों को इससे क्या फर्क पड़ता है कि यह अल्पसंख्यक संस्थान है या नहीं? यह केवल ब्रांड का नाम- एएमयू है। अल्पसंख्यक दर्जा देने का समर्थन करने वाले याचिकाकर्ताओं की तरफ से पैरवी कर रहे वकील शादान फरासत ने कहा, बाशा केस में 1967 में फैसला पारित होने तक विश्वविद्यालय को 'अल्पसंख्यक संस्थान' माना जाता था। उन्होंने कहा कि एक अल्पसंख्यक संस्थान को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी उम्मीदवारों के लिए अलग कोटा नहीं देने की आजादी मिलती है।

उन्होंने कहा कि अगर शीर्ष अदालत बाशा मामले में दिए गए 56 साल पुराने फैसले को बरकरार रखती है तो एएमयू पहली बार गैर-अल्पसंख्यक संस्थान बनेगा। उन्होंने कहा, जब महिलाओं की शिक्षा की बात आती है, तो एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा बहुत प्रासंगिक है। अगर एएमयू मुस्लिम अल्पसंख्यक संस्थान नहीं रहेगा, तो मुस्लिम महिलाओं की उच्च शिक्षा में बाधा आ सकती है। इस पर सरकार की तरफ से दलीलें पेश कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, 'मुस्लिम महिलाएं हर जगह पढ़ रही हैं। उन्हें कमतर न आंकें।'

माइनॉरिटी स्टेटस का समर्थन कर रहे वकील फरासत ने कहा कि एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा और महिला शिक्षा एक साथ चले हैं। इससे विशेषकर मुस्लिम महिलाओं में शिक्षा को बढ़ावा मिला है। उन्होंने कहा कि 'अल्पसंख्यक संस्थान' राष्ट्रीय महत्व का संस्थान भी हो सकता है। ऐसा नहीं है कि केवल बहुसंख्यक ही राष्ट्रीय महत्व के संस्थान स्थापित कर सकते हैं।

संविधान के अनुच्छेद 30 पर चीफ जस्टिस की टिप्पणी
दिन भर चली बहस के दौरान, सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा, अनुच्छेद 30 में यह प्रावधान नहीं हैं कि संस्थान का प्रशासन केवल अल्पसंख्यक समुदाय के हाथों में होना चाहिए। प्रशासनिक पदों पर काबिज लोगों का अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित होना जरूरी नहीं है। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने साफ किया, अनुच्छेद 30 के तहत पसंद का अधिकार मिलता है। इसके तहत अल्पसंख्यक अपनी पसंद और विवेक के आधार पर प्रशासन चला सकते हैं, जिसे वे उचित मानते हैं। इसलिए अगर संस्था में केवल आपके समुदाय के लोग नहीं हैं, तो 'अल्पसंख्यक दर्जा' खोने का जोखिम है, ऐसा नहीं लगता; क्योंकि विकल्प आपके पास है।

इससे पहले अदालत ने बुधवार की सुनवाई के दौरान हैरानी जताते हुए पूछा था कि 180 सदस्यीय गवर्निंग काउंसिल में केवल 37 मुस्लिम सदस्य हैं। ऐसे में एएमयू को 'अल्पसंख्यक दर्जे' वाला संस्थान क्यों माना गया? चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जेबी पारदीवाला, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, जस्टिस मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा भी शामिल हैं। अब मामले की सुनवाई 23 जनवरी को होगी।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें