खनिजों की खनन प्रक्रिया के बाद जो अवशेष बचा रहता है वह पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा पैदा कर रहा है। एक अध्ययन के अनुसार, इन अवशेषों के उचित भंडारण में विफल रहने के कारण कई बड़ी पर्यावरणीय आपदाएं हुई हैं, जिन्होंने इन्सानी जीवन के साथ-साथ पारिस्थितिकी तंत्र पर भी गहरा प्रभाव डाला है।
क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के सस्टेनेबल मिनरल्स इंस्टीट्यूट और स्कूल ऑफ द एनवायरमेंट से जुड़ीं शोधकर्ता बोरा अस्का के नेतृत्व में इस पर किए अध्ययन से पता चला है कि दुनिया की एक तिहाई खनन अवशेष और कचरा भंडारण सुविधाएं संरक्षित क्षेत्रों के भीतर या उसके करीब स्थित हैं। यह पर्यावरण और जैवविविधता के लिहाज से बड़ा खतरा हैं।
खदान बंद होने के वर्षों बाद तक नुकसान
खनन एक स्वाभाविक रूप से आक्रामक प्रक्रिया है जो खनन स्थल से कहीं अधिक बड़े क्षेत्र के परिदृश्य को नुकसान पहुंचा सकती है। इस क्षति का प्रभाव खदान बंद होने के वर्षों बाद भी जारी रह सकता है, जिसमें ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ना, वनस्पतियों तथा जीवों का अवसान और भूमि व आवास का क्षरण शामिल है। इसके बावजूद खनन संबंधी यह अवशेष और कचरा वैश्विक स्तर पर जैवविविधता को किस हद तक प्रभावित कर रहा है इस बारे में बेहद कम जानकारी उपलब्ध है।
मिट्टी के कण, पौधे कर लेते हैं अवशोषित
अध्ययन के अनुसार, खदान के अवशेषों के डंप में मौजूद धातुएं और मेटलॉइड्स विभिन्न पारिस्थितिक रिसेप्टर्स (जीव और वनस्पति), जल संसाधनों और वायुमंडल में फैल जाते हैं। इन धातुओं और उपधातुओं को मिट्टी के कण व पौधे अवशोषित कर लेते हैं। खनन खनिज अवशेषों के प्रमुख पर्यावरणीय प्रभाव वन्य जीवन और मत्स्य आवास, जल संतुलन, स्थानीय जलवायु और वर्षा के पैटर्न, अवसादन, जंगलों की कमी और पारिस्थितिकी में व्यवधान डालता है। अंततः इनका असर पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है।
दुनियाभर में चिंता
पर्यावरण में भारी धातुओं और मेटलॉइड्स से होने वाला प्रदूषण दुनियाभर में चिंता का विषय बना हुआ है, क्योंकि इनके संपर्क में आने से विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र और मानव रिसेप्टर्स पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। भारी धातुओं और मेटलॉइड्स को भूगर्भिक अपक्षय और मानवजनित स्रोतों से पर्यावरण में लाया जाता है। इस प्रक्रिया में अपशिष्ट निपटान, कृषि गतिविधियां, वाहन यातायात, पेट्रोलियम रिफाइनरियां, पेंट उद्योग, फोटोग्राफी और खनन शामिल हैं।